इंडिया गेट से: केजरीवाल की राजनीति में सफेद झूठ की लगातार सफलता
अरविन्द केजरीवाल की खासियत यह है कि वह किसी भी चुनौती को स्वीकार करने में हिचकिचाते नहीं। वह चुनौती स्वीकार करने, चुनौती देने और बड़ी लड़ाई लड़ने में विश्वास रखते हैं।

जब उन्होंने राजनीति की शुरुआत की थी, तो उन्होंने पहले ही चुनाव में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ चुनाव लड़ा और उन्हें हराया। 2014 में दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद वह दिल्ली में इतने लोकप्रिय थे कि वह चाहते तो दिल्ली की किसी लोकसभा सीट से चुनाव जीत सकते थे, लेकिन उन्होंने वाराणसी में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ा।
अब फिर वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहे हैं। एक मोर्चे पर लड़ाई नरेंद्र मोदी ने शुरू की है, और दूसरा मोर्चा उन्होंने खुद खोला है। नरेंद्र मोदी सरकार ने दिल्ली सरकार पर भ्रष्टाचार के मामलों में सीबीआई और ईडी को उनके पीछे लगा कर उन्हें घेरने की कोशिश की है। जिस का मुकाबला करते हुए उन्होंने माहौल बना दिया कि मोदी उन की सरकार को गिराना चाहते हैं।
सीबीआई और ईडी के छापों पर ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे हमलावर हो कर अपने मंत्रियों और नेताओं का उस तरह बचाव नहीं कर पाए जैसे केजरीवाल ने किया। दिल्ली में मोदी-शाह को शुरुआती मात देने के बाद उन्होंने गुजरात में पलटवार शुरू कर दिया है। वह हर हफ्ते शनिवार और रविवार को गुजरात में होते हैं, और अपनी प्रेस कांफ्रेंसों और विभिन्न समुदाओं के प्रतिनिधि मंडलों से मुलाकातों के माध्यम से आम आदमी पार्टी की छवि बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
अगस्त के आख़िरी हफ्ते में वह अहमदाबाद में थे, तो सितंबर के पहले शनिवार को राजकोट में थे। जहां वह हर प्रेस कांफ्रेंस में बेहिचक मोदी-शाह और गुजरात के मुख्यमंत्री पर गुंडागर्दी करने का आरोप लगाते हैं। राजकोट में उन्होंने सूरत में आम आदमी पार्टी के एक कार्यकर्ता पर हुए हमले का जिक्र करते हुए कहा कि भाजपा के गुंडों ने हमला किया। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव को अभी तीन महीने बाकी हैं, भाजपा को अपनी हार दिख रही है, इसलिए वह अपने गुंडों के माध्यम से हमले करवा रही है और आने वाले दिनों में हमले और तेज होंगे।
क्योंकि सूरत में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता पर हमला गणपति के पंडाल में हुआ था, तो गणपति पूजा को भी अपना हथियार बनाया। शनिवार को उन्होंने सूरत में ही जा कर गणपति पंडाल में पूजा की। गुजरात में उनकी रणनीति भाजपा सरकार से विभिन्न कारणों से नाराज सरकारी कर्मचारियों से सीधे संपर्क करने की है। ट्रांसपोर्ट कर्मचारी हों या पुलिसकर्मी, वह सरकारी कर्मचारियों के संगठनों से संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं और उन्हें आश्वासन दे रहे हैं कि आम आदमी पार्टी की सरकार बनने पर उनकी हर समस्या का समाधान निकालेंगे।
दिल्ली हो या पंजाब, या फिर उत्तराखंड हो या गोवा, झूठे वादों और झूठे दावों में केजरीवाल का कोई सानी नहीं। वह हर चुनाव में हर जगह अपने चुनावी सर्वेक्षणों के हवाले से जीत का दावा करते रहे हैं, अब उन्होंने सूरत की 12 में से 7 सीटों का सर्वेक्षण आम आदमी पार्टी के पक्ष में बता कर वैसा ही झूठ बोला है, जैसे पहले बोलते रहे हैं। अपनी प्रेस कांफ्रेंसों में वह इस बात की कतई परवाह नहीं करते कि वह कोरा झूठ बोल रहे हैं।
पंजाब विधानसभा चुनावों के बाद वह भगवंत मान को अपने साथ गुजरात ले गए थे, जहां उन्होंने एलान किया कि भगवंत मान ने दस दिन के अंदर पंजाब में भ्रष्टाचार खत्म कर दिया। जबकि उसके बाद वहां के हेल्थ मिनिस्टर विजय सिंगला को रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ने के बाद बर्खास्त किया गया। दिल्ली के हेल्थ मिनिस्टर सत्येन्द्र जैन भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में है। दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच सीबीआई कर रही है।
पिछले हफ्ते ही वह दिल्ली में एक बार फिर झूठे साबित हुए। इस बार तो जम कर ट्रोल हो रहे हैं, क्योंकि उनके झूठ की पोल ऑनलाईन खुल गई है। दिल्ली सरकार के विज्ञापनों का पैसा दूसरे राज्यों में अपनी लोकप्रियता बढाने के लिए खर्च करने के नए नए उपाए केजरीवाल सोचते रहते हैं। पहले दिल्ली के स्कूली शिक्षा मॉडल का खूब ढिंढोरा पीटा था। तो गुजरात के शिक्षामंत्री ने दिल्ली के शिक्षा मॉडल को पूरी तरह झूठ पर आधारित फ्राड करार देकर उनका भांडा फोड़ा था।
अब उन्होंने देश के पहले वर्चुअल क्लासरूम का नया नाटक किया है। वह आजकल अपने दोनों तरफ राष्ट्रीय ध्वज लगा कर राष्ट्र के नाम संदेश देते रहते हैं। उनके पीछे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की फोटो नहीं होती। बल्कि दलित और युवा वोट बैंक को लुभाने के लिए डाक्टर अम्बेडकर और भगत सिंह की फोटो होती है। उन्होंने 31 अगस्त को राष्ट्र के नाम संदेश में कहा कि "आज हम भारत का पहला वर्चुअल स्कूल- दिल्ली मॉडल वर्चुअल स्कूल शुरू कर रहे हैं। हम आज से कक्षा 9 के लिए प्रवेश आवेदन आमंत्रित कर रहे हैं। देश भर के छात्र प्रवेश के लिए आवेदन कर सकते हैं।"
इस राष्ट्र के नाम संदेश के बाद उन्होंने अपने ट्विट में लिखा कि "आज देश में शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी क्रान्ति की शुरुआत हो रही है। देश का पहला वर्चुअल स्कूल दिल्ली में शुरू हो गया है।" अब पहली बात तो यह है कि दिल्ली स्कूल एजुकेशन बोर्ड दिल्ली के स्कूलों के लिए है, उस का ज्यूरिडिक्शन दिल्ली है। वह केन्द्रीय स्कूल शुरू नहीं कर सकते, इसके लिए उन्हें केंद्र सरकार की अनुमति लेनी होगी। दूसरा यह कि दिल्ली में खुलने वाला यह वर्च्युल स्कूल भारत का पहला वर्चुअल स्कूल नहीं है।
दो साल पहले 20 अक्टूबर 2020 को उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने देश के पहले वर्चुअल स्कूल का उद्घाटन किया था, वह खबर उस दिन के टाईम्स आफ इंडिया में उद्घाटन समारोह के फोटो के साथ छपी थी। जैसे ही केजरीवाल ने देश के पहले वर्चुअल स्कूल का झूठ बोला, उत्तराखंड की वह खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।
इसके बाद तो केजरीवाल के इस दावे की ओर भद्द पिट गई जब नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (एन आई ओ एस) ने भी उनके दावे को खारिज कर दिया है। एन आई ओ एस की अध्यक्ष प्रो. सरोज शर्मा ने केजरीवाल को बेनकाब करते हुए कहा कि केन्द्रीय संस्था ने 14 अगस्त 2021 को ही वर्चुअल स्कूल की शुरुआत कर दी थी और इसका उद्घाटन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने किया था। जिस का अभी तीसरा सत्र चल रहा है।
केंद्र सरकार ने एक बयान जारी कर केजरीवाल की पूरी हवा ही निकाल दी कि देश भर के 7,000 से अधिक केंद्रों के माध्यम से 2.25 लाख से अधिक बच्चे वर्चुअल शिक्षा ले रहे हैं। अहम सवाल यह है कि केजरीवाल की झूठ पर आधारित राजनीति क्या दिल्ली और पंजाब की तरह हिमाचल और गुजरात में भी चल निकलेगी या इन दोनों राज्यों के नागरिक उत्तराखंड और गोवा की तरह केजरीवाल को ठेंगा दिखा देंगें।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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