Artificial Intelligence: क्या इंटेलिजेन्स आर्टिफिशिएल हो सकती है?
Artificial Intelligence: 2010 से 2020 के बीच दुनिया जितनी तेजी से बदली है उससे पहले के किसी भी दशक में शायद ही इतनी तेजी से बदली हो। लेकिन जैसा कि टेक्नॉलाजी के साथ होता है, इसको बदलने के लिए दस बीस साल की जरूरत नहीं पड़ती। ये साल दो साल में अपने आप को अपग्रेड कर लेती है। वह सबकुछ जो 2022 तक संसार का सबसे आधुनिक आविष्कार लग रहा था, 2023 में उसके अस्तित्व पर संकट के बादल छाने लगे। इंटरनेट के जरिए आये सर्च इंजन ने जिस तरह से अपने पूर्वजों को एकदम से सीमित कर दिया था, कुछ कुछ वैसा ही खतरा अब सर्च इंजन और कन्टेन्ट प्रोवाइडर वेबसाइट पर मंडराने लगा है। इस खतरे का नाम है आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स।
दुनिया एक बार फिर से लौटकर उसी 2000 वाले दौर में पहुंच गयी जब इंटरनेट लोगों के जीवन में दाखिल हो रहा था। जैसे उस समय लोग इसमें ताक झांक करके इसके महत्व को पहचानने की कोशिश कर रहे थे, वैसे ही 2022-23 में एक बार फिर ताक झांक शुरु हो गयी। जैसे सर्गेई बिन या लैरी पेज ने जब गूगल का एल्गोरिदम बनाया था तब सिर्फ वो जानते थे कि इसका सर्च रिजल्ट पर क्या असर पड़ेगा। जिन लोगों को इसका फायदा लेना था या फिर नुकसान उठाना था, उनको तो इसका कुछ अंदाज ही नहीं था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है।

उस दौर में अमेरिका में भी याहू का चलन इसलिए था क्योंकि उसकी वेब डायरेक्ट्री सबसे बेहतर थी। एक्साइट जैसे सर्च इंजन को तो उस समय भी अमेरिका में कम ही लोग पूछ रहे थे। लेकिन सर्गेई बिन और लैरी पेज का गूगल फार्मूला कुछ ऐसा था कि उसने सबकी छुट्टी कर दी। समय के साथ इसमें कुछ कुछ बदलाव होते रहे और इसका एक व्यावसायिक मॉडल भी खड़ा हो गया जिसमें सर्च इंजन और कन्टेन्ट प्रोवाइडर दोनों के लिए लाभ कमाने का अवसर था। कॉपीराइट आदि के मामलों का भी गूगल की ओर से ध्यान रखा गया। लेकिन जो एआई चैटबोट आया है, वहां न तो कोई सर्च रिजल्ट है और न ही कोई विकल्प।
कुछ भी सर्च करने पर गूगल आपके सामने विकल्प रखता है और आपको चुनाव करने की छूट देता है। हां, अपनी तरफ से बेहतर रिजल्ट को सबसे ऊपर रखने का आश्वासन गूगल जरूर देता है। लेकिन उन विकल्पों में से आप क्या चुनेंगे, ये इंटेलिजेंस वह आप पर छोड़ देता है। लेकिन आर्टिफिशिएल इंटेलिजेन्स अपना चैटबोट सामने रखकर कम से कम इंटरनेट पर उपभोक्ता से उसका इंटेलिजेन्स छीन लेता है।
अब उपभोक्ता को छानबीन करने या अपना इंटेलिजेन्स इस्तेमाल करने की जरूरत ही नहीं है। यह काम कम्प्यूटर सर्वर की वह विशाल कृत्रिम बुद्धि करती है जिसे मानव मष्तिष्क के विकल्प के तौर पर प्रोग्राम किया गया है। वह जो सूचनाएं देता है उसका कोई न कोई डाटा सोर्स होता है। लेकिन उस डाटा सोर्स को आपके सामने लाने की बजाय उसमें अपनी कृत्रिम बुद्धि लगाकर तय करता है कि आपके लिए सबसे सटीक सूचना या जानकारी क्या है।
लेकिन यह तो इसका एक पक्ष है जो इंटरनेट पर कन्टेन्ट प्रोवाइडर या सर्च इंजन के सामने खतरा पैदा करता है। जैसे गूगल ने सर्च इंजन प्रस्तुत करके याहू की डायरेक्ट्री सर्विस को एकदम से अप्रांसगिक बना दिया था वैसे ही एआई गूगल के सामने सर्च रिजल्ट को फिल्टर करके प्रस्तुत कर रहा है। सर्च इंजन और वेबसाइटों पर इस चैटबोट का दीर्घकालिक प्रभाव होगा, ऐसा लगता नहीं है। एआई के सबसे चर्चित चैटबोट चैटजीपीटी या बिंग के चैटबोट के सर्च रिजल्ट निहायत असंतोषजनक और कई बार मजाकिया भी होते हैं। ऐसे में सवाल इस बात का है कि क्या लोग अपने मूल इंटेलिजेन्स का इस्तेमाल करना बंद कर देंगे और मशीन द्वारा फिल्टर करके बताये गये इकलौते जवाब को ही अंतिम मान लेंगे? अगर हां तब तो सर्च इंजन या वेबसाइटों के लिए एआई सचमुच बड़ा खतरा है, अगर नहीं तो फिलहाल चिंता की कोई बात नहीं है।
लेकिन एआई का मामला केवल सर्च रिजल्ट या चैटबोट तक ही सीमित नहीं है। ये एक ऐसी कृत्रिम दुनिया रच रहा है जहां वास्तविक और आभासी के बीच का अंतर बहुत महीन हो गया है। इसका असली इस्तेमाल इमेज और वीडियो के फील्ड में होगा। जिस एआई का सबसे पहले इस्तेमाल इंटरनेट पर फोटो दिखाकर उससे मिलती जुलती फोटो पहचानने के लिए हुआ था वह अब अपनी इमेज खुद तैयार कर रहा है। अपना वीडियो खुद बना रहा है। थ्रीडी होलोग्राम में किसी की छवि निर्मित करके उसको आभासीय रूप से पर्दे पर प्रस्तुत करना अब कल्पनालोक की बात नहीं रही।
इसी तरह एआई का इस्तेमाल डाटाबेस को और बेहतर तरीके से प्रोग्राम करने या उससे रिजल्ट पाने के लिए किया जा रहा है। पुलिस या सेना इसका इस्तेमाल करके बेहतर रक्षात्मक उपाय विकसित कर सकते हैं। प्रशासन में इसके बेहतर संयोजन से डाटा प्रबंधन के साथ साथ कार्यकुशलता को बढ़ाया जा सकता है। अर्थात इंटरनेट ने जो कुछ सुविधाएं मनुृष्य को प्रदान की है एआई उनका और बेहतर तरीके से प्रबंधन कर सकता है। उन्हें ज्यादा सहज और सटीक बना सकता है। साथ ही यह उनके लिए भी एक अवसर है जो लूट और ठगी के नये नये तरीके खोजते रहते हैं। जैसे हर नयी तकनीकी के साथ उपयोग और दुरुपयोग का खतरा रहता है वैसे ही एआई के साथ भी है।
यहां एक बात और महत्वपूर्ण है। नयी तकनीकी हमेशा से मनुष्य को सशंकित करती रही है। फिर वह चाहे बैलगाड़ी का विकास हो या रेलगाड़ी का। जिन लोगों के समय में ऐसे विकास होते हैं वो सशंकित ही रहते हैं क्योंकि वो उससे पहले वाली तकनीकी के साथ सहज हो चुके होते हैं। इसीलिए हमेशा से नयी तकनीकी के प्रवेश पर भविष्य का डर दिखाया जाता है। लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि जो भविष्य में आता है वह उस तकनीकी के साथ अपने आप को सहज पाता है। ठीक वैसे ही जैसे आज हम कम्प्यूटर, स्मार्टफोन, इंटरनेट, सर्च इंजन या सोशल मीडिया साइट्स के साथ जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं। इसको लेकर जो संभावित डर दिखाये गये थे, आज वो डर कहीं नहीं दिखता। हो सकता है जिन लोगों ने कल्पना की, उनके लिए डरावना रहा हो, लेकिन जो उसके साथ जी रहे हैं वो तो उसके अभ्यस्त हो चुके हैं।
अगर डर की ही बात करें तो एआई का सबसे बड़ा डर ऑटोमेशन या रोबोटिक्स के फील्ड में है। 2004 में आई हालीवुड की मूवी "आई रोबोट" जिसने उस समय देखी होगी उसके लिए सबसे बड़ा अविश्वसनीय रोमांच यही था कि क्या रोबोट इतने एडवांस हो सकते हैं कि वो मनुष्य की तरह दौड़भाग करें और अपना इन्टेलिजेन्स डेवलप कर लें? पूरी मूवी मशीन द्वारा अपना इन्टेलिजेन्स विकसित कर लेने पर ही बनायी गयी है। लेकिन आज बोस्टन डॉयनामिक्स के रोबोट जब लैब में कुछ कुछ आई रोबोट मूवी जैसा ही उछलकूद करते हुए, दो पैरों पर दौड़ते हुए या गिरकर खुद से संभलते हुए दिखते हैं तो उतना आश्चर्य नहीं होता जितना "आई रोबोट" देखकर हुआ होगा।
उस मूवी में डिटेक्टिव बने नायक विल स्मिथ को सबसे बड़ा खतरा यही दिखता है कि रोबोट ने रोबोट का निर्माण शुरु कर दिया था। एक ऐसा रोबोट जिसका अपना इंटेलिजेन्स था और जो मनुष्य का आर्डर फॉलो करने के लिए प्रोग्राम्ड नहीं था। जिस दिन ऐसा हो जाएगा उस दिन मनुष्य मशीन से कैसे निपटेगा, ये उस समय का मनुष्य तय करेगा। अभी से सोचकर डर जाना कि भविष्य में विल स्मिथ वाली मूवी की तरह मशीन मनुष्य के खिलाफ रिवोल्यूशन की शुरुआत कर देंगी, कपोल कल्पना ही कही जाएगी। हां, वो किसी न किसी मिल, फैक्ट्री अथवा सर्विस सेक्टर में इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन का हिस्सा जरूर होंगे जिसकी शुरुआत भी हो चुकी है। आज के दृष्टिकोण से मनुष्य के सामने आर्टिफिशिएल इंटेलिजेन्स से लैस मशीन का यही सबसे बड़ा खतरा है।
यहां एक और बुनियादी सवाल है जिसका जवाब खोजने की जरूरत है। क्या इन्टेलिजेन्स कृत्रिम या आर्टिफिशियल हो सकती है? अभी तक का जो तकनीकी विकास है उसमें इन्टेलिजेन्स या बुद्धिमत्ता का एक पैटर्न है। मतलब मशीन किसी एक पैटर्न को फॉलो करती है। वह मनुष्य या किसी भी जीव की तरह स्वयं से परिस्थितिजन्य निर्णय नहीं ले सकती। मशीनें अपने पैटर्न या एल्गोरिदम को ही फालो करती हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास में पैटर्न से परे जाकर मशीन में निर्णय लेने की क्षमता को विकसित कर पाना कठिन काम है। आज जिसे आर्टिफिशिएल इन्टेलिजेन्स कहा जा रहा है वह भी एक प्रकार का पैटर्न या प्री प्रोग्राम्ड एल्गोरिदम ही है।
इन्टेलिजेन्स या बुद्धिमत्ता का संबंध प्रकृति के ऐसे रहस्य से है जिसको समझ पाना अभी तक क्रिश्चियन साइंस के लिए संभव नहीं हुआ है। धरती पर मां की कोख से पैदा होनेवाले हर जीव मेें इन्टेलिजेन्स होती है। मनुष्य ही नहीं पशु, पक्षी कीट पतंगे, जलचर, नभचर सबमें वह इंटेलिजेन्स पाई जाती है जिसके सहारे वो अपना जीवन जीते हैं। इसको किसी रोबोट में उतार देना बिल्कुल उस 'आई रोबोट' वाली फंतासी कहानी जैसा है जिसमें रोबोट ही ऐसे रोबोट का निर्माण करता है जो मनुष्य का आदेश मानने के लिए बाध्य नहीं है। इस तरह से तो मनुष्य भी प्रकृति द्वारा निर्मित एक प्रकार का प्री प्रोग्राम्ड रोबोट ही है। उसके पास अदृश्य शक्ति द्वारा प्रदत्त इन्टेलिजेन्स या बुद्धिमत्ता है। इसे वह हूबहू किसी मशीन में कैसे ट्रांसफर कर सकता है जबकि उसका सोर्स कोड ही उसके पास नहीं है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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