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Anand Mohan Release: क्या बिहार में दम तोड़ रही है सामाजिक न्याय की राजनीति?

बाहुबली नेता आनंद मोहन की रिहाई सही है या गलत, इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट को लेना है। लेकिन इस रिहाई से सिर्फ नैतिक और कानूनी नहीं बल्कि वह राजनीतिक सवाल भी उठ रहा है कि क्या सामाजिक न्याय की राजनीति दम तोड़ने लगी है?

Anand Mohan Release

Anand Mohan Release: पिछली सदी के आखिरी दशक में बिहार की राजनीति में जन्मा शब्द 'सामाजिक न्याय' देखते ही देखते भारतीय राजनीति की धुरी बन गया। पिछड़े और दलित वर्ग को सत्ता में भागीदारी के नाम पर आई तत्कालीन समाजवादी धारा की सरकारों ने जो नीतियां बनाईं, उनसे सवर्ण और पिछड़ों के बीच दूरियां बढ़ती चली गई। उसी दौर में सामाजिक न्याय के बड़े चेहरे के रूप में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव उभरे। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव दूसरे चेहरे रहे। दोनों ही राजनेताओं ने सामाजिक न्याय के नाम पर राजकाज का जो तरीका अख्तियार किया, उससे सवर्ण और पिछड़ों के बीच पैदा हुई खाई बढ़ती चली गई, जो मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद बननी शुरू हुई थी।

इसी दौर में बिहार के कोसी इलाके से राजनीति के दो चेहरे उभरे। एक चेहरा पिछड़ावाद का पहरूआ था तो दूसरा उसका विरोधी। बिहार के कोसी अंचल में आज के पिछड़े वर्ग की प्रमुख जाति यादव के कई परिवारों की समृद्धि सवर्ण जमींदारों को भी मात देती है। ऐसे ही एक परिवार से उभरे राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव बाहुबली के रूप में उभरे। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव का वरदहस्त उन पर था। तब उऩका नाम रंगदारी में भी आगे आया। उनके निशाने पर सवर्ण समाज के लोग रहते थे तो दूसरी तरफ आनंद मोहन सवर्णों के पक्ष में खड़े होते रहे। आनंद मोहन चूंकि राजपूत जमींदार परिवार से हैं, लिहाजा वे तत्कालीन सामाजिक न्याय की राजनीति की आंख की किरकिरी बन गये थे।

इसी दौर में आनंद मोहन की लालू यादव से अदावत बढ़ती गई। लालू के शासन काल पर जंगल राज का आरोप लगा। उस जंगलराज और सवर्ण विरोधी हालात में आनंद मोहन सवर्ण तबके की उम्मीद बनकर उभरे। इसी दौर में जी कृष्णैया हत्याकांड हुआ। जिसमें वे फंस गए। 1994 में कृष्णैया की हत्या के वक्त बिहार में कहा जाता था कि तत्कालीन सरकार ने जानबूझकर अपने विरोधियों को इस हत्याकांड में फंसाया।

उन्हीं दिनों बिहार में जनता दल से अलग होकर जार्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार ने समता पार्टी बनाई तो आनंद मोहन ने बिहार पीपुल्स पार्टी। दोनों में 1995 के विधानसभा चुनाव में समझौता हुआ। हालांकि सफलता नहीं मिली जिसके बाद दोनों पार्टियां अलग हो गईं। यह बात और है कि उसी दौर में आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद ने एक उपचुनाव में वैशाली सीट से कांग्रेसी दिग्गज ललित नारायण शाही की बहू वीणा शाही को हराकर देश को चौंका दिया था। तब आनंद मोहन खुलकर लालू यादव का विरोध करते थे।

मंडलवाद और राममंदिर आंदोलन के बाद उभरी राजनीति में लालू यादव करीब 14 प्रतिशत आबादी वाले यादव और करीब 17 प्रतिशत वोटिंग आबादी वाले मुसलमान तबके को साथ मिलाकर एमवाई यानी माई समीकरण बनाने में कामयाब रहे। माई समीकरण के सहारे वे 'भूराबाल' को ठेंगे पर रखते रहे। भूराबाल यानी भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला यानी कायस्थ समुदाय। वो भूराबाल का सार्वजनिक उपहास करते रहे। उसे नीचा दिखाते रहे। 'माई' समीकरण के साथ कुशवाहा, मुसहर और गैर पासवान दलित जातियों की गोलबंदी से वे सत्ता की सीढ़ियां नापते रहे।

बाद के दिनों में जब समता पार्टी उभरी तो उसने 'लवकुश' का समीकरण रचा। लव यानी कुर्मी और कुश यानी कोइरी-कुशवाहा का समीकरण। बिहार की राजनीति में यह समीकरण करीब आठ फीसद मतदाताओं पर पकड़ रखता है। हालांकि सवर्ण मतदाता इन दोनों ही राजनीतिक समूहों से अलग रहा। लेकिन 1996 में समता पार्टी ने जब भारतीय जनता पार्टी से समझौता किया तो समता पार्टी और भाजपा मिलकर लव-कुश और सवर्ण समुदायों को साधने में जुट गए।

इस गठबंधन को सफलता पहली बार 2005 के विधानसभा चुनावों में मिली। तब भाजपा और समता पार्टी ने मिलकर इतिहास रच दिया था। इसके सामने लालू यादव का एमवाई समीकरण खेत रहा। तब समूचा सवर्ण समुदाय, गैर यादव पिछड़ी जातियां और गैर पासवान दलित जातियां इस गठबंधन की गोलबंदी में शामिल हो गईं। तब से लेकर 2015 के विधानसभा चुनावों तक तकरीबन यही समीकरण काम करता रहा। बाद के दिनों में नीतीश कुमार ने दलितों में अति दलित और पिछड़ों में अति पिछड़े समुदायों को अलग कर दिया। फिर ये जातियां लालू यादव के गठबंधन से दूर होती चली गईं।

लेकिन इस बीच नीतीश कुमार ने दो बार पैंतरेबाजी की और भाजपा से इतर लालू का साथ ले लिया। भाजपा द्वारा नीतीश कुमार के साथ भविष्य में न जाने के ऐलान के बाद अब उनका दांवपेच काम आता नहीं दिख रहा है। लालू यादव का एमवाई समीकरण भले ही बरकरार हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार के बाद गैर यादव पिछड़ी जातियों में पार्टी की जबरदस्त पैठ बनी है। नीतीश कुमार की अपनी बिरादरी कुर्मी भी लालू यादव की पार्टी के साथ सहज महसूस नहीं कर रही है। इसलिए उऩके निर्वाचन क्षेत्र के अलावा तकरीबन हर जगह कुर्मी भी एमवाई समीकरण से अलग रुख दिखा रहा है।

इस बीच उपेंद्र कुशवाहा को भाजपा ने तोड़कर एक तरह से लवकुश समीकरण को भी कमजोर कर दिया है। गैर पासवान दलित जातियों में भी भाजपा ने कड़ी सेंधमारी की है। रामविलास पासवान के परिवार में फूट के बाद पासवान समुदाय में भी पुरानी एकता नजर नहीं आ रही। इस बीच एक बदलाव राष्ट्रीय जनता दल की राजनीति में भी हुआ है। लालू यादव के एमवाई समीकरण के बावजूद दो राजपूत नेताओं के साथ उनकी राजपूत समुदाय में पैठ की कोशिश जारी थी। रघुवंश प्रसाद सिंह और जगदानंद सिंह जैसे राजपूत नेता लालू यादव के साथ थे।

इन संदर्भों में माना जा रहा है कि अब बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति कमजोर होने लगी है। अति पिछड़ों और अति दलितों में भाजपा की बढ़ती पैठ के बाद सामाजिक न्याय के पुरोधाओं को अब उसी सवर्ण समाज से उम्मीदें बढ़ गई हैं, जिन्हें गाली देते हुए उनकी राजनीति परवान चढ़ी है। पिछले कुछ साल से लालू यादव के बेटे तेजस्वी भूमिहारों की प्रशंसा करते नहीं थक रहे। आनंद मोहन के बेटे उनकी ही पार्टी से विधायक भी हैं। ऐसे में आनंद मोहन की रिहाई के बाद लगता है अब सामाजिक न्याय वाली राजनीति की उम्मीद राजपूत समुदाय से बढ़ गई है।

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    बिहार में करीब आठ फीसदी राजपूत हैं, जो करीब नौ लोकसभा और 28 विधानसभा सीटों पर सीधे असर डालते हैं। बाकी शायद ही कोई विधानसभा सीट होगी, जहां राजपूत जनसंख्या न होगी। इसलिए अब नीतीश और तेजस्वी की जोड़ी आनंद मोहन के अतीत, उनके साथ अतीत में रही अदावत को भुलाकर उनकी रिहाई के बहाने राजपूत समुदाय को लुभाने की कोशिश में जुट गई है। उसे लगता है कि अगर सत्ता उनके गठबंधन की ओर खिसकती दिखी तो राजपूत समुदाय हाथ बढ़ाने में देर नहीं लगाएगा। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या लालू राज के दौरान राजपूतों और भूमिहारों के साथ जो अनाचार हुआ, क्या राजपूत समुदाय उसे सिर्फ आनंद मोहन के नाम पर भूल जाएगा?

    अगर इसका जवाब हां होगा तो निश्चित तौर पर नीतीश-तेजस्वी की जोड़ी कामयाब होगी, लेकिन इसका जवाब उलटा हुआ तो फिर आनंद मोहन की रिहाई उलटी भी पड़ सकती है। यह सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए दोहरे नुकसान की बात होगी। क्योंकि उनकी रिहाई को जिस तरह दलित स्वाभिमान और दलितों की उपेक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है, उससे तो ऐसा ही लगता है।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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