Congress Session: नेहरु परिवार का वर्चस्व बनाए रखने हेतु कांग्रेस संविधान में संशोधन

कांग्रेस महाधिवेशन में पार्टी के संविधान बदलने की जो कवायद हुई, वह बदलाव कम, नेहरू गांधी परिवार का नियंत्रण बनाए रखने की कवायद ज्यादा लग रही है।

Amendment in the Congress constitution for supremacy of the Nehru family

Congress Session: आम चुनावों के एक वर्ष पहले आयोजित अधिवेशन में कांग्रेस ने उन प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया है, जिसके जरिए कांग्रेस को बदलने की कोशिश हो रही है। अब तक पार्टी के संविधान के मुताबिक, पार्टी की सर्वोच्च नियामक इकाई कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के लिए चुनाव होता था। लेकिन पार्टी इस बार उससे भी आगे बढ़ गई है। अब कांग्रेस कार्यसमिति में 50 प्रतिशत दलित, पिछड़ों को आरक्षण दे दिया गया है। बाकी बचे पचास फीसदी सीटों पर भी कांग्रेस युवाओं और महिलाओं को तवज्जो देने की तैयारी में है।

कांग्रेस के संविधान संशोधन के मुताबिक, अब कार्यसमिति में लोकसभा और राज्यसभा में पार्टी के नेताओं के साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री भी स्थाई सदस्य होंगे। इसके लिए उन्हें अब अध्यक्ष की ओर से नामांकन की जरूरत नहीं रहेगी। दिलचस्प यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, लेकिन कांग्रेस अपने पार्टी स्तर पर इससे भी आगे बढ़ गई है। पार्टी ने तय किया है कि एक जनवरी 2025 से पार्टी में सिर्फ डिजिटल सदस्यता ही होगी।

कांग्रेस के नए संविधान संशोधन के मुताबिक कांग्रेस की सदस्यता फॉर्म में थर्ड जेंडर, ट्रांसजेंडर का भी कॉलम होगा। इसके साथ ही सदस्य की पत्नी और मां का भी नाम रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा। साफ है कि पार्टी थर्ड जेंडर और महिलाओं को यह संदेश देने की कोशिश में है कि उनके हितों का भी वह खयाल रखने जा रही है।

नए संविधान संशोधन के मुताबिक, अब प्रांतीय कांग्रेस समिति के आठ प्रतिनिधियों पर एक केंद्रीय सदस्य चुना जाएगा। इसके पहले तक छह प्रांतीय प्रतिनिधियों पर एक केंद्रीय सदस्य होता था। इसी तरह अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्यों की संख्या को 1240 से बढ़ाकर 1653 कर दिया गया है। इसके साथ ही कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों की संख्या को 24 से बढ़ाकर 35 किया गया है।

कांग्रेस के इस संविधान संशोधन पर चर्चा से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि इस पर विचार आठ साल से चल रहा था। आठ साल पहले हुए आम चुनावों में जब कांग्रेस को करारी हार मिली थी, पार्टी ने उसी समय पार्टी के संविधान को बदलने की तैयारी शुरू कर दी थी। हार के बाद हुई कार्यसमिति की बैठक में तीन बिंदुओं पर सहमति बनी थी, जिसमें कांग्रेस में सक्रिय सदस्यों के विचार को फिर से स्वीकार किया गया था।

इसके साथ ही पार्टी के चुने हुए पदाधिकारियों के कार्यकाल को पांच साल से घटाकर तीन साल करने की बात हुई थी। उस बैठक में पार्टी की जिला एवं राज्य समितियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ ही अल्पसंख्यकों को पार्टी के पदों में पचास फीसद आरक्षण देने पर भी चर्चा हुई थी। हालांकि यह चर्चा ही रह गई और इसे लागू नहीं किया जा सका। तब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से राहुल गांधी ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था, इसलिए उस बैठक के पहले चर्चा थी कि बैठक में राहुल गांधी को फिर से अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया जाएगा। हालांकि इस पर विचार नहीं हुआ।

कांग्रेस में संविधान समीक्षा का विचार पिछले साल 13 मई से 15 मई तक उदयपुर में हुई चिंतन बैठक में फिर से परवान चढ़ा। इसी चिंतन बैठक में सुझाव आया कि समयबद्ध संविधान समीक्षा समिति का गठन किया जाना चाहिए। यह भी तय हुआ कि कांग्रेस कार्यसमिति की मंजूरी से प्रांतीय समितियों को अपने अलग संविधान को भी मंजूरी दी जा सकती है। उस बैठक में यह भी सुझाव आया था कि पार्टी में 'एक परिवार एक टिकट' पॉलिसी होनी चाहिए। यानी एक व्यक्ति के पास कांग्रेस में सिर्फ एक ही संगठनात्मक पद होना चाहिए।

उदयपुर की चिंतन बैठक के बाद अंबिका सोनी की अध्यक्षता में संविधान समीक्षा समिति का गठन हुआ, जिसमें राहुल गांधी के नजदीकी रणदीप सुरजेवाला, केसी वेणुगोपाल और जितेंद्र सिंह, जबकि सोनिया गांधी के नजदीकी मुकुल वासनिक, मोहन प्रकाश, अभिषेक मनु सिंघवी और दीपादास मुंशी शामिल किए गए। इस समिति के एक सदस्य जी परमेश्वरन भी हैं। गांधी-नेहरू परिवार के प्रति अंबिका सोनी की प्रतिबद्धता भी छिपी हुई नहीं है।

जाहिर है कि जिस समिति में सिर्फ गांधी नेहरू परिवार के ही नजदीकी लोग शामिल होंगे, उनके समक्ष गांधी-नेहरू परिवार को ही समाहित करने का अदृश्य दबाव जरूर होगा। वैसे भी इस तथ्य की चाहे जितनी भी आलोचना की जाए, कांग्रेस के लिए गांधी-नेहरू परिवार अंतिम विकल्प है। कांग्रेस को छोड़कर पिछले कुछ दिनों में भले ही गुलाम नबी आजाद जैसे नेता बाहर जा चुके हों, लेकिन यह भारतीय राजनीति का कड़वा सच है कि कांग्रेस के लिए गांधी-नेहरू परिवार अपरिहार्य है। कांग्रेस के बुनियादी कार्यकर्ताओं तक को लगता है कि अगर गांधी-नेहरू परिवार की छाया पार्टी से हटी तो उसे बिखरने से कोई नहीं रोक सकता। शायद यही वजह है कि कांग्रेस के संविधान बदलने की जो कवायद हुई, वह बदलाव कम, गांधी-नेहरू परिवार का वर्चस्व बनाए रखने की कवायद ज्यादा लग रही है।

बदली हुई राजनीति परिस्थितियों में कांग्रेस पर भी दबाव है कि वह परिवारवाद से बाहर निकले। भारतीय जनता पार्टी ने परिवारवाद को भारतीय राजनीति का इतना बड़ा मुद्दा बना दिया कि सुविचारित लोकतांत्रिक सोच रखने वाला वोटर इसके विरोध में उठ खड़ा हुआ है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस के लोग इसे समझते नहीं है। लेकिन वे गांधी-नेहरू परिवार से दूर जा भी नहीं सकते। शायद यही वजह है कि कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों के मनोनयन का अधिकार कांग्रेस अध्यक्ष को दे दिया गया है।

जाहिर है कि इसमें पर्दे के पीछे से गांधी-नेहरू परिवार की ही चलेगी। कांग्रेस लाख संदेश देने की कोशिश करे कि उसके असली बॉस मल्लिकार्जुन खड़गे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि गांधी-नेहरू परिवार ही पार्टी का असली बॉस है। हालांकि पार्टी ने उदयपुर चिंतन शिविर में एक परिवार एक टिकट का सिद्धांत स्वीकार करने पर जो विचार किया था, उसके भी मूल में परिवारवाद को लेकर उठ रही व्यापक आवाजें ही रहीं।

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    भाजपा इस मुद्दे पर आम चुनावों में एक बार फिर कांग्रेस को घेरकर पटखनी देने की कोशिश करेगी। इन अर्थों में देखें तो कांग्रेस का संविधान संशोधन और उसके जरिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी को कार्यसमिति में स्थापित करने की कोशिश पार्टी के लिए दोधारी तलवार हो सकती है। अगर वह ऐसा नहीं करती है तो ऐन चुनावों के पहले पार्टी में बिखराव को रोकना पार्टी के लिए आसान नहीं था और अब उसने ऐसा कर दिया है तो वह भारतीय जनता पार्टी को बड़ा मौका देगी। भारतीय जनता पार्टी ने परिवारवाद विरोधी जो पिच मेहनत से तैयार की है, उस पर कांग्रेस को लाना और उस पर उसे शिकस्त देना भाजपा के लिए कहीं ज्यादा आसान होगा।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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