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ओवैसी बंधुओं के गले की हड्डी बनी 'रजाकार' मूवी

Razakar Movie: आज 26 अप्रैल को देश के जिन लोकसभा क्षेत्रों में मतदान हो रहा है उसमें हैदराबाद भी है। यहां से असदुद्दीन ओवैसी चुनावी मैदान में हैं जबकि उनके सामने बीजेपी ने एक समाजसेवी माधवी लता को मैदान में उतारा है। असदुद्दीन ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन एक प्रकार से हैदाराबाद की उग्र पहचान बन गये हैं जो विवादित बयान देकर चर्चा में बने रहते हैं। ऐसे ही विवादित बयानों में एक बार अकबरूद्दीन औवैसी ने कहा था कि "हमारी मजलिस (AIMIM) हिंदुस्तान की तोपों के सामने अपने सीनों को पेश करने वाले रजाकारों की जमात है"।

जिनको रजाकारों का इतिहास पता था उन्होंने विरोध किया, लेकिन बाकी हिंदुस्तान या नई पीढ़ी को कोई लेना देना नहीं था। फिर बड़े भाई असदुद्दीन ओवैसी ने अमेरिका में जाकर ये बयान दिया कि "रजाकार तो पाकिस्तान चले गए, वफादार भारत में रह गए''। लेकिन जब 'रजाकार' मूवी का टीजर आया तो ना उनको पसंद आया और ना उनकी सहयोगी पार्टी बीआरएस की के. कविता को। औवैसी ने कहा, "आजकल कल्पना पर आधारित फिल्मों को बनाने का चलन है, तथ्यों पर आधारित नहीं। हिंदू मुस्लिम नफरत को फैलाने के लिए फिल्में बनाई जा रही हैं"।

Razakar Movie

आखिर 'रजाकार' मूवी ओवैसी के लिए गले की हड्डी क्यों बन गई है? क्यों एक तरफ उनके भाई उनकी पार्टी के कोर वोटर्स यानी मुस्लिमों को रिझाने, जोश दिलाने या कहें तो भड़काने के लिए खुद को, पार्टी को रजाकारों की जमात बताते हैं लेकिन यही लोग रजाकार मूवी देखने की अपील करने के बजाय उसका विरोध करते हैं। मतलब रजाकारों का इतिहास ओवैसी भाईयों से न निगलते बन रहा है और न उगलते।

जो नहीं जानते, उनके लिए इसके पीछे की वजह जानना वाकई में दिलचस्प होगा। जबकि इस मूवी में कहीं भी ओवैसी, उनके किसी खानदानी या उनकी पार्टी का जिक्र तक नहीं किया गया है, फिर क्यों वो नाराज हैं? दरअसल पांच भाषाओं तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, तमिल और हिंदी में रिलीज हुई मूवी 'रजाकार' ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के पितृ पुरुष की करतूतों की कहानी है। इस पितृ पुरुष का नाम है कासिम रिजवी, जो 'रजाकार' मूवी में मुख्य खलनायक है।

ये वो कासिम रिजवी ही था, जिसने अपनी राजनीतिक पार्टी को औवैसी भाइयों के दादा अब्दुल वाहिद ओवैसी को तब सौंपा था, जब भारत सरकार की शर्त के मुताबिक उसे हिंदुस्तान छोड़कर पाकिस्तान में बसना था। ओवैसी के दादा लातूर (महाराष्ट्र) से आए थे, वकील थे और तब लातूर निजाम के अधिकार क्षेत्र में ही था। उस वक्त उस पार्टी का नाम था मजलिस ए इत्तिहादुल मुसलमीन यानी एमआईएम। लेकिन ये पार्टी कासिम रिजवी की करतूतों की वजह से इतनी बदनाम हो चुकी थी कि औवैसी के दादा ने इसमें ऑल इंडिया जोड़कर नया नाम दे दिया और पार्टी का नाम हो गया एआईएमआईएम।

जब पार्टी आधुनिक दौर में आई और उसकी वेबसाइट बनी तो पार्टी के इतिहास से कासिम रिजवी का ही नहीं रजाकारों और उसके पूरे दौर का जिक्र ही गायब कर दिया गया। लिखा गया है कि 1944 के बाद से पार्टी निष्क्रिय पड़ी थी, जिसे अब्दुल वाहिद औवैसी ने 1958 में कमान संभाल कर फिर से खड़ा किया।

अब समझिए ये करने की जरुरत क्यों पड़ी? दरअसल एमआईएम को 1927 में खड़ी करने वाले थे नवाब महमूद नवाज खान किलेदार, जो आजादी के बाद हैदराबाद को अलग देश बनाने की हिमायत करते थे। 1938 में बहादुर यार जंग ने पार्टी की कमान संभाली लेकिन 1944 में बहादुर यार जंग की मौत अब भी संदेह के घेरे में है। लोग कहते हैं कि कासिम रिजवी ने ही बहादुर यार जंग को जहर दे दिया था। कासिम लखनऊ में पैदा हुआ था और अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से वकालत करने के बाद कासिम रिजवी लातूर चला गया था, जहां कभी उसके श्वसुर डिप्टी एसपी रहे थे।

वहां उसने एमआईएम की सदस्यता ले ली और कहा जाता है कि अपनी पूरी सम्पत्ति पार्टी के नाम करने का ऐलान करके मुस्लिमों के बीच अपनी जगह बना ली। पार्टी के अंदर ही उसने अपना एक नया संगठन खड़ा किया, अपने विरोधियों को अपने अतिवाद से परास्त किया और एक दिन पार्टी का मुखिया बन बैठा। फिर उसने निजाम की करीबी हासिल कर अपनी एक निजी आर्मी खड़ी की 'रजाकार'। इसका सामान्य सा अर्थ इस्लाम के लिए खड़ा रहनेवाला मुजाहिद होता है।

असल में कासिम रिजवी ने रजाकारों की यह फौज धर्म परिवर्तन के लिए तैयार की थी। वो हैदराबाद राज्य, जो उन दिनों आज के कई राज्यों के बराबर क्षेत्रफल वाला था, रिजवी उसको हिंदु बाहुल्य से मुस्लिम बाहुल्य बनाना चाहता था। ताकि हिंदुस्तानी सेना से लड़ने के लिए उसके पास लाखों हाथ हों। इन रजाकारों ने कर वसूली से लेकर सजा देने तक एक तरह से पूरे हैदराबाद पर अपना धीरे धीरे कब्जा कर लिया था। जो कोई खिलाफ खड़ा होता, उसे ये रजाकार बर्बाद कर देते, यहां तक कि कुछ मुसलमानों को भी।

फिर जो उसने वीभत्स कत्ले आम मचाया, उसकी कहानी है फिल्म 'रजाकार' में। कासिम रिजवी का किरदार निभाया है राज अर्जुन ने और जिस कदर खूंखार वह इस मूवी में नजर आए हैं, आपको फिल्मी परदे के कई किरदार छोटे दिखाई देंगे। कासिम रिजवी किस तरह से अमानुषिक अत्याचार करता था, पेट में पल रहे बच्चों तक को मार देता था, फूस के बिटौरे में छुपी नंगी औरतों को आग लगा देता था, उसके लोग ब्राह्मणों की शिखा काटकर, उनकी महिलाओं से बलात्कार कर धर्म परिवर्तन करने के मजबूर करते थे। फिर भी अगर कोई घर वापसी करता था तो इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों की तरह जिंदा तक जला देते थे। इस मूवी में यह सब दिखाया गया है।

शानदार रिसर्च के साथ इस मूवी में घटनाओं को इस तरह बनाया गया है कि डॉक्यूमेंट्री ना लगे, क्योंकि कासिम के खिलाफ कोई एक हीरो नहीं था, जिसने उसके अत्याचारों को खत्म किया हो। वो तो सरदार पटेल थे, जिन्होंने 'ऑपरेशन पोलो' के जरिए आर्मी भेजकर हैदराबाद की जनता को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। लेकिन कई नायक पूरे हैदराबाद में अलग अलग गावों में उठ खड़े हुए थे, एक बार तो तीन नौजवानों ने उसके संरक्षक निजाम पर ही बम फेंक दिया था। ऐसे सभी गुमनाम नायकों की कहानियों को इस मूवी में शामिल किया गया है, जिनमें से कई तो महिलाएं थीं।

फिल्म तकनीकी दृष्टि से 'कश्मीर फाइल्स' जैसी मूवी से कई गुना बेहतर बनी है। साउथ इंडिया की फिल्में जिन मसालों के लिए जानी जाती हैं, वो सभी आपको इसमें मिलेगा, यानी शानदार एक्शन, सिनेमेटोग्राफी, एडीटिंग, शानदार सैट्स, उम्दा संगीत, बढ़िया एनर्जेटिग कोरियोग्राफी और आंखों में आंसू लाने देने वाले कैलाश खेर के 'जिंदा है तू' जैसे गाने भी। डायरेक्टर याता सत्यनारायण ने प्रोडयूसर गुदूर नारायणा रेड्डी से मिले 'फ्री हैंड' का बढ़िया इस्तेमाल किया।

यही मूवी 'आरआरआर' की तरह बड़े सितारों से सजी होती तो घर घर की चर्चा बनती, लेकिन हिंदू मुस्लिम मुद्दा होने के चलते उन्हें साउथ और बॉलीवुड के थोड़े कम चर्चित चेहरों से काम चलाना पड़ा। तेज सप्रू सरदार पटेल के किरदार में हैं और मकरंद देशपांडे निजाम की भूमिका में, साउथ की इंडस्ट्री के बॉबी सिम्हा, वेदिका, तारक पोनप्पा, इंद्राजा आदि भी अहम भूमिकाओं में है।

लेकिन ये मूवी भारत के एक ऐसे खलनायक का इतिहास बताती है, जिसे उसकी ही पार्टी छुपाती आई है, लेकिन मौके बेमौके कट्टर मुस्लिमों का वोट लेने के लिए फायदा भी उठाती आई है। इस मूवी में उन मुस्लिमों के बारे में भी बताया गया है जो कासिम रिजवी के खिलाफ थे। उस मुस्लिम पत्रकार के बारे में भी बताया गया है जो रिजवी के खिलाफ लिखता था और रिजवी ने उसके हाथ काटकर मौत की सजा दी थी।

इसलिए हैदराबाद के इलेक्शन में इस बार रजाकार मूवी की भी भूमिका जरूर कुछ न कुछ रहेगी। भाजपा की माधवी लता जहां रजाकारों की कहानी बताकर उसका इतिहास याद दिला रही हैं, वही अकबरुद्दीन रजाकार मूवी को ही झूठ बताकर अपना दामन बचा रहे हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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