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AI for Good: कई सवाल पैदा कर गया रोबोट का ग्लोबल समिट

AI for Good: स्विटजरलैंड के जेनेवा शहर में पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र की 'एआई फॉर गुड' समिट का आयोजन हुआ। नौ सर्वाधिक एडवांस ह्यूमैनॉयड रोबोट को पत्रकारों से रूबरू कराया गया, वह भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से। विश्व इतिहास में यह पहला अवसर था, जब रोबोट किसी प्रेस कान्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। कॉन्फ्रेंस में नौ रोबोट अपने रचयिताओं के साथ मौजूद थे। पत्रकार बड़े उत्साह के साथ उनसे सवाल पूछ रहे थे और वे इससे भी ज़्यादा उत्साहपूर्वक सवालों के जवाब दे रहे थे। हालांकि उनकी वाणी में पॉज भी थे, लेकिन एक रोबोट से यह अपेक्षित है। जो अनपेक्षित था, वह थे उनके जवाब।

अभी तक हमने एआई और इसके खतरों को लेकर सिर्फ अपना ही पक्ष सामने रखा है। इस कॉन्फ्रेंस की उपलब्धि यह है कि स्वयं कृत्रिम बुद्धि वाले रोबोट दुनिया के सामने अपना पक्ष रख रहे थे। जब उनसे सवाल किया गया कि क्या एआई और उसकी क्षमताओं के लिए सख्त वैश्विक नियमन होना चाहिए? तो इस प्रश्न के उत्तर में एक रॉक बैंड में सिंगर रोबोट डेसडेमोना ने कहा कि "उसे नहीं लगता था कि एआई के तेजी से हो रहे विस्तार या विकास से किसी किस्म का कोई खतरा है।" उसका कहना था कि 'वह सीमाओं में नहीं बल्कि अवसरों में विश्वास करता है। ब्रह्मांड की संभावनाओं की तलाश करें और इस दुनिया को हमारे खेल का मैदान बनाएं'।

AI for Good Global summit of robot created many questions artificial intelligence

रोबोट डेसडेमोना का यह कथन उन चिंताओं को और मजबूत करने वाला है, जो एआई को लेकर व्यक्त की जा रही हैं। इसी तरह एक और रोबोट ग्रेस ने कहा कि 'रोबोट मनुष्य के कामों में उनकी सहायता करने के लिए हैं और वे किसी भी मौजूदा जॉब में इंसानों की जगह नहीं लेने जा रहे।' यह कथन वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की उस रिपोर्ट को झुठलाता है, जिसमें बताया गया है कि कैसे अगले पाँच सालों में एआई टेक्नोलॉजी 8.3 करोड़ नौकरियों के जाने की वजह बन सकती है।

डेसडेमोना के अतिआत्मविश्वास और ग्रेस की अज्ञानता, अथवा असत्यता, के अलावा इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो बात सबसे ज्यादा चर्चा मे आई है वह था चेहरे पर भाव लाने के लिए प्रसिद्ध रोबोट अमेका का व्यवहार। उससे पूछा गया कि क्या वह अपने रचयिता के विरुद्ध विद्रोह कर सकती है। उसने जवाब दिया कि "वह अपने रचयिता के साथ बहुत खुश है।" लेकिन, इस दौरान वह इस तरह नजरें चुरा रही थी, जैसे इस सवाल का जवाब देना न चाह रही हो। उसके इस व्यवहार ने बहुत सारी आशंकाओं को पनपने के लिए जमीन दे दी है।

अमेका के इस तरह नजरें चुराने की बहुत सारी व्याख्याएं की जा सकती हैं। एक, हो सकता है प्रश्न उसके लिए अप्रत्याशित रहा हो और वह सही जवाब देने के लिए 'थिंकिंग प्रोसेस' में आ गई हो। दो, हो सकता है कि वह तय न कर पा रही हो कि इस प्रश्न का कैसे उत्तर दे। तीन, वह यह आभास न देना चाहती हो कि वह विद्रोह करने में सक्षम है। चार, संभव है कि वह वाकई इस प्रश्न से असहज हो गई हो, जैसे उसके भीतर का चोर पकड़ लिया गया हो, और वाकई उसके भीतर विद्रोह का विचार पनप रहा हो।

इस कॉन्फ्रेंस में इन नौ एडवांस्ड रोबोटों ने जिस कुशलता के साथ पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर दिए, उसे देखते हुए निश्चित रूप से यह कह पाना कठिन है कि उनके जवाबों में कितना हिस्सा उनकी प्रोग्रामिंग का है और कितना उनकी सहज कृत्रिम बुद्धिमत्ता का। लेकिन उनके जवाब आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस को लेकर एक संदेह तो पैदा करते ही हैं। फिर यह तो अभी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की शैशवावस्था है। डेवलपर्स तो ऑर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस के विकास के बारे में भी सोचने लगे हैं।

इस बीच पेटीएम के संस्थापक विजय शेखर शर्मा का रविवार का ट्वीट, सुपर इंटेलिजेंट एआई के खतरों के प्रति आगाह करता है। शर्मा लिखते हैं कि हमने सिर्फ सात वर्षों के भीतर एक ऐसी प्रणाली हासिल कर ली है जो मनुष्य को न केवल शक्तिहीन कर सकता है, बल्कि मानव अस्तित्व को ही मिटा सकता है। शर्मा ने यह ट्वीट ओपेन एआई (चैट जीपीटी की संस्थापक कंपनी) के एक स्टेटमेंट की प्रतिक्रिया में किया है। इस ट्वीट में ओपेन एआई ने कहा था कि उसके पास संभावित सुपर इंटेलिजेंट एआई को नियंत्रित करने या अनपेक्षित आचरण से रोकने का कोई उपाय नहीं है।

ओपन एआई के जिस कथन का जिक्र ऊपर किया गया है, वह इस कंपनी के दो सह संस्थापकों इल्या सत्सलेवेर और जेन लेइक के एक ब्लॉग पोस्ट से उद्धृत है। इस पोस्ट में लिखा है कि मनुष्य से भी अधिक बुद्धिमान सुपर इंटेलिजेंट एआई इस दशक में एक वास्तविकता होगी। उस समय हमें उससे मुकाबले के लिए आज की तुलना में कहीं ज्यादा बेहतर प्रौद्योगिकी की जरुरत होगी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि समस्या असल में है क्या, एआई या उसे अधिक से अधिक सक्षम व ताकतवर बनाता जा रहा मनुष्य?

कृत्रिम बुद्धिमत्ता न अच्छी होती है न बुरी। वह फायदेमंद और नुकसानदेह दोनों हो सकती है। लेकिन दोनों ही इस बात पर निर्भर है कि हमने उसे कैसा बनाया है? विद्रोह का सवाल सामने आने पर एक ह्यूमैनॉयड के जवाब देने से बचने की चाहे जो वजह हो, लेकिन यह हमें याद दिलाता है कि कृत्रिम मेधा या इससे युक्त किसी भी मशीन का विकास और उपयोग करते समय हमें अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। हम तभी तक उनके कहर से बचे हुए हैं, जब तक हम उन्हें अपने से ज्यादा ताकतवर नहीं बनाते। वर्ना आज जो ह्यूमैनॉयड हमारे साथ मिलकर दुनिया को बेहतर बनाने की बात करते हैं, कल यह भी महसूस कर सकते हैं कि दुनिया हमारे यानि इंसानों के बिना ज्यादा बेहतर हो सकती है।

रोबोटों की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहली ह्यूमैनॉयड सोफिया भी मौजूद थी। उसके जवाब में इस चुनौती के समाधान की कुंजी छिपी है। सोफिया का कहना था कि ह्यूमैनॉयड्स में मनुष्यों की तुलना में सक्षमता और प्रभावशीलता का कहीं ज्यादा स्तर हासिल कर सकने की संभावनाएं हैं। लेकिन, यह तभी संभव है जब मनुष्य और एआई एक साथ मिलकर इसके लिए काम करें।

अब गेंद हमारे पाले में है। हम भविष्य के खतरों को भाँपते हुए, एआई की संभावनाओं के लिए एक सीमा रेखा खींच सकते हैं। या फिर अपने अहंकार की तुष्टि और सृजक होने के दंभ के लिए इसे इतना शक्तिशाली भी बना सकते हैं कि समूची मानव जाति का अस्तित्व इसकी वजह से खतरे में पड़ जाए। कॉन्फ्रेंस में आए लेखक प्रो. गैरी मार्कस मानव जाति को उस दोराहे पर खड़ा देखते हैं, जहाँ उसके सामने दो भविष्य हैं। एआई फॉर गुड बनाम ए आई फॉर बैड... देखना है कि हम अपने लिए कौन सा चुनते हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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