इंडिया गेट से: न्यायपालिका को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का मौका
नूपुर शर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की अवांछित टिप्पणी से देश में न्यायपालिका के प्रति नवचेतना का संचार हुआ है। यह पहली बार हुआ है कि देशभर के आम नागरिक ही नहीं, करीब करीब सभी अदालतों के वकीलों ने उन दोनों जजों पर बेहिचक टिप्पणी की है जिन्होंने नूपुर शर्मा को उदयपुर की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया है। जबकि आम तौर पर आम आदमी, मीडिया और वकील सुप्रीम कोर्ट के जजों की किसी टिप्पणी पर प्रतिक्रिया से डरते हैं। सोशल मीडिया के आगमन से पहले सुप्रीम कोर्ट की किसी टिप्पणी को गलत मानते हुए भी आम आदमी खून का घूँट पी कर चुप रह जाता था।

प्रशासन और चुनी हुई सरकारें संविधान के मुताबिक़ काम करें, इस पर नजर रखने की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट, राज्यपाल और राष्ट्रपति की होती है लेकिन सुप्रीम कोर्ट राज्यपाल और राष्ट्रपति संविधान के मुताबिक़ काम करें, इस पर निगाह रखने की जिम्मेदारी देश के आम नागरिकों की होती है। रिटायर्ड जज और ब्यूरोक्रेट्स इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन अभी तक अनेकों पूर्व जज और ब्यूरोक्रेट्स सब कुछ जान समझ कर भी इसलिए चुप रह जाते थे क्योंकि राजनीतिक विचारधारा से जुड़ी कुछ लॉबी न्यायपालिका और ब्यूरोक्रेसी में इतना प्रभावी हैं कि निष्पक्ष लोग चुप रहने में ही अपना भला समझते थे।
याद करिए कश्मीर में हिन्दुओं के पलायन का वह समय जब हस्तक्षेप के लिए सुप्रीम कोर्ट गये थे। उस सुप्रीम कोर्ट का रवैया नकारात्मक रहा। कोर्ट ने पलायन रोकने के लिए कोई हस्तक्षेप नहीं किया। जो भी याचिकाएं दाखिल हुई उन्हें बेरहमी से ठुकरा दिया गया। आम आदमी के साथ साथ अनेकों जज, पूर्व जज और ब्यूरोक्रेट्स सुप्रीम कोर्ट के इस रवैये से क्षुब्ध थे लेकिन वे इस डर से कुछ नहीं बोले कि उनकी आवाज़ अदालत की मानहानि न मान ली जाए। देश में हवा का रूख बदलने के बाद उनकी जुबान में भी जान आई है और वे भी आम आदमी के साथ मिल कर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।
अदालतों का काम संविधान और क़ानून के मुताबिक़ इन्साफ करना है, क़ानून व्यवस्था संभालने का काम सरकार और प्रशासन का होता है। यह बात सुप्रीम कोर्ट के जज से बेहतर भला कौन समझेगा? लेकिन इन दो जजों ने ऐसा न समझने की भूल की। इसकी प्रतिक्रिया बहुत व्यापक हुई। सोशल मीडिया के अलावा देश के दर्जन भर से ज्यादा रिटायर्ड जजों, दर्जनों रिटायर्ड आईएएस और आईपीएस अफसरों और जानी मानी हस्तियों ने सुप्रीमकोर्ट के उन दो जजों के खिलाफ चीफ जस्टिस को चिठ्ठी लिखते हुए कहा है कि किसी भी देश का लोकतंत्र और संविधान तब तक बरकरार रहेगा, जब तक उसके सभी घटक संविधान में तय दायरे में रह कर कर्तव्यों का पालन करेंगे। इन दो जजों ने अपनी लक्ष्मण रेखा पार की है जिससे सारा देश सदमे में है। इसलिए वे यह चिठ्ठी लिखने को मजबूर हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सीमारेखा
संविधान सभा में न्यायपालिका की स्वतन्त्रता और निष्पक्षता पर व्यापक बहस हुई थी। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों और न्यायिक समीक्षा की संभावनाओं पर भी व्यापक बहस हुई थी। इस बहस में यह तय हुआ था कि -" सुप्रीम कोर्ट संविधान की संरक्षक और निर्णायक व्याख्या करने वाली होगी। सुप्रीम कोर्ट नागरिकों के मौलिक अधिकारों की संरक्षक होगी। देश के सामान्य कानूनों की व्याख्या करने वाली सर्वोच्च संस्था होगी। यह दीवानी और फौजदारी मामलों में अपील का सर्वोच्च न्यायालय होगी। संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ही केंद्र और राज्यों के बीच विवाद का फैसला करने के लिए एक निष्पक्ष और स्वतंत्र प्राधिकरण होना चाहिए। एक संस्था के रूप में न्यायपालिका को मजबूत बनाए रखने के लिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यह किसी भी तरह के दबाव और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त हो।"
संविधान निर्माताओं ने सुप्रीम कोर्ट की जो सीमारेखा तय किया था उस पर खरा उतरते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसले भी दिये हैं। इसमें 1975 में इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द करनेवाला फैसला भी शामिल है। लेकिन कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं जब सुप्रीम कोर्ट ने बाहरी दबाव में काम किया। सबसे पहला उदाहरण 7 सितंबर 2014 का है, जब इंदिरा जयसिंह ने आधी रात तक सुनवाई करवाकर बच्चों का यौन शोषण और हत्या करने वाले सुरेन्द्र कोली की 12 सितंबर को होने वाली फांसी रुकवाई थी। दूसरा मामला 29 जुलाई 2015 का है, जब मुम्बई बम धमाकों के लिए जिम्मेदार याकूब मेमन की फांसी रुकवाने के लिए वकीलों की एक लॉबी ने चीफ जस्टिस पर दबाव बनाकर आधी रात के बाद कोर्ट खुलवाई। इसी तरह 16 मई 2018 को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस और जेडीएस ने राजनीतिक दबाव बनाकर आधी रात को कोर्ट के दरवाजे खुलवाए क्योंकि वे राज्यपाल की ओर से अगले दिन सुबह होने वाली येदुरप्पा की मुख्यमंत्री की शपथ रुकवाना चाहते थे।
ये तीन उदाहरण आपके सामने हैं जब सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के दबाव में और राजनीतिक प्रभाव में काम किया जबकि उससे इसकी अपेक्षा नहीं की जाती। संविधान सभा ने साफ़ साफ़ कहा था कि सुप्रीम कोर्ट किसी भी तरह के दबाव और प्रभाव के बिना काम करेगी। अब यह ज्वलंत उदाहरण है, जब सुप्रीम कोर्ट के दो जजों जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस सूर्यकांत ने राजनीतिक किस्म की टिप्पणी की है शायद इसीलिए देशभर में सुप्रीम कोर्ट से की इस अवांछित टिप्पणी का विरोध भी हुआ और शायद इसीलिए देश के पूर्व जजों, पूर्व आईएएस और आईपीएस समेत 117 गणमान्य लोगों ने ऐसी अवांछित टिप्पणी पर कड़ा एतराज भी किया है।
कोलिजियम सिस्टम पर सवाल
ऐसे में अब जो सवाल उठ रहे हैं, उनमें सबसे बड़ा सवाल न्यायपालिका को परिवारवाद और कोलिजियम से मुक्त करवाने का है। नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में 1993 के एक फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति का फैसला अपने हाथ में ले लिया था। 1998 में जब राष्ट्रपति ने जजों की नियुक्तियों के बारे में सुप्रीम कोर्ट से राय माँगी थी, तब सुप्रीमकोर्ट ने राष्ट्रपति के अधिकार भी समाप्त कर दिए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए न्यायपालिका और सरकार के बीच एमओपी (मेमोरंडम आफ प्रोसीजर) साईन हुआ। तब से जजों की नियुक्ति में सरकार और यहाँ तक कि राष्ट्रपति की भूमिका भी खत्म हो गई है।
नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने का क़ानून पास किया था लेकिन इस क़ानून को न्यायिक स्वायत्तता के लिए खतरा बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। संविधान पीठ ने 2015 में न्यायिक नियुक्तियों को न्यायपालिका की स्वायत्तता से जोड़ कर उसे संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा घोषित कर दिया और एनजेएसी कानून निरस्त कर दिया।
मोदी सरकार चाहती तो उस क़ानून को संविधान संशोधन के तौर पर संसद से पास करवा कर कोलिजियम के अधिकार खत्म कर सकती थी लेकिन 2014 में बिल का समर्थन करने वाली कांग्रेस ने 2015 में पलटी मार ली और दुबारा बिल पास करवाने से इनकार कर दिया। तबसे मोदी सरकार कुछ नहीं कर पाई। अब देश में वातावरण भी है, संसद में व्यापक समर्थन भी है। ऐसे माहौल में केन्द्र की मोदी सरकार के पास यह एक मौका है जब वह न्यायपालिका को राजनीतिक पूर्वाग्रहों के प्रभाव में आने से मुक्त रखने की पहल कर सकती है। मोदी सरकार को जजों की नियुक्तियों के लिए फिर से आयोग बनाने की पहल करनी चाहिए।
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