AAP Congress Alliance: गठबंधन में चतुर कौन रहा, केजरीवाल या कांग्रेस?
आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविन्द केजरीवाल से हाल ही में जब पूछा गया कि आप बाकी जगह तो कांग्रेस से चुनावी गठबंधन कर रहे हैं, लेकिन पंजाब में गठबंधन क्यों नहीं कर रहे, तो उन्होंने कहा था कि यह भाजपा और अकाली दल को हराने की रणनीति है।
उनके इस बयान के दो दिन बाद जब कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, गुजरात और गोवा में सीट शेयरिंग का एलान हो गया, तो पंजाब के बारे में न कांग्रेस ने कुछ बोला है, न आम आदमी पार्टी ने। केजरीवाल के गठबंधन नहीं करने का एक बड़ा कारण यह है कि वह पंजाब सरकार की मुफ्त वाली स्कीमों और किसान आन्दोलन से फायदा होते देख रहे हैं। कांग्रेस से गठबंधन करके वह उस फायदे को बांटना नहीं चाहते।

केजरीवाल यह भी मान कर चल रहे हैं कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन होने से अकाली दल और भाजपा का गठबंधन हो जाएगा, जिससे इंडी गठबंधन के दोनों दल नुकसान में रहेंगे। वैसे भी पंजाब प्रदेश कांग्रेस एकमत से आम आदमी पार्टी से गठबंधन का विरोध कर रही है।
पंजाब प्रदेश कांग्रेस का मानना है कि गठबंधन होने से आम आदमी पार्टी की पंजाब में जड़ें जम जाएगी और पंजाब में कांग्रेस की हालत यूपी और दक्षिण भारतीय राज्यों जैसी हो जाएगी, जहां वह प्रमुख विपक्षी दल की हैसियत में भी नहीं रहेगी। इसलिए दोनों पार्टियों में यह धारणा बन रही है कि अपने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अकेले ही लड़ना चाहिए। फिलहाल तो यही लग रहा है कि पंजाब में इंडी एलायंस के दोनों दल एक दूसरे के खिलाफ फ्रेंडली चुनाव लड़ेंगे।
आम आदमी पार्टी में अभी तक की धारणा यह बन रही है कि पांचकोणीय मुकाबले में उसे फायदा होगा। आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा, अकाली दल तो मैदान में हैं ही। बसपा का अकाली दल से गठबंधन टूट गया है, और वह भी लगभग सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना रही है।
पंजाब में सरकार बनने के बाद आम आदमी पार्टी का यह पहला लोकसभा चुनाव है। लोकसभा चुनाव विधानसभाओं की तरह नहीं होते, यह केजरीवाल खुद दिल्ली में दो बार देख चुके हैं। 2014 और 2019 में दोनों बार आम आदमी पार्टी दिल्ली में बुरी तरह हारी। 2015 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में 2014 के मुकाबले दिल्ली में उसका वोट 15 प्रतिशत घट गया था।
2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 33.1 प्रतिशत वोट मिला, जबकि 2019 के चुनाव में सिर्फ 18 प्रतिशत वोट मिले। इसी तरह 2022 में पंजाब विधानसभा में रिकार्ड तोड़ विजय के बाद आम आदमी पार्टी मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की ओर से खाली की गई लोकसभा सीट ही हार गई थी।
दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में हुए समझौते के मुताबिक़ कांग्रेस तीन और आम आदमी पार्टी चार सीटों पर चुनाव लड़ेगी। 2019 में कांग्रेस पांच सीटों पर दूसरे नंबर पर थी, जबकि आम आदमी पार्टी उत्तर पश्चिम और दक्षिण दिल्ली की सीट पर दूसरे नंबर पर थी, लेकिन वहां भी 2014 के मुकाबले उसके 9 प्रतिशत वोट घट गए थे। जबकि भाजपा के रमेश विधूड़ी के वोट 11 प्रतिशत बढ़ गए थे। समझौते में आम आदमी पार्टी ने दक्षिण दिल्ली के अलावा नई दिल्ली, पूर्वी दिल्ली और पश्चिमी दिल्ली सीटें रखी हैं।
नई दिल्ली सीट पर पिछली बार कांग्रेस के अजय माकन दूसरे नंबर पर थे। वह आम आदमी पार्टी से गठबंधन के घोर विरोधी थे। तो उन्हें कर्नाटक से राज्यसभा टिकट देकर कांग्रेस ने चुप करवा दिया। लेकिन क्या वह आम आदमी पार्टी को नई दिल्ली में जीतने देंगे। और क्या उत्तर पूर्वी सीट से संदीप दीक्षित आम आदमी पार्टी को जीतने देंगे, जहां पिछली बार उनकी मां शीला दीक्षित हारी थी। सच यह है कि कांग्रेस ने इस बार केजरीवाल को आईना दिखाने का मंसूबा बना कर गठजोड़ किया है। इन सभी सीटों पर 2019 में उसका वोट 15 से 21 प्रतिशत तक घटा था।
कांग्रेस ने जो तीन सीटें ली हैं, वे मुस्लिम प्रभाव वाली हैं। केजरीवाल ने खुद हिन्दू बहुल सीटें लेकर अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली है। हिन्दू बहुल सीटों पर उनकी दाल बिलकुल नहीं गलने वाली। दिल्ली को लेकर आम आदमी पार्टी सबसे बड़ी गलतफहमी में है। शराब घोटाले के बाद यह पहला चुनाव होगा। सिसोदिया का जेल में एक साल पूरा हो चुका है, जिससे दिल्ली की जनता में धारणा बन गई है कि घोटाला न हुआ होता, तो उन्हें जमानत मिल गई होती।
गुजरात में भी कांग्रेस की रणनीति आम आम आदमी पार्टी से बदला लेने की है। भरूच और भावनगर सीट पर कांग्रेस का आसानी से मान जाना, कई तरह के शक पैदा करता है। भरूच अहमद पटेल का घर है। अहमद पटेल 1977 से 1984 तक लगातार तीन बार भरूच से लोकसभा चुनाव जीते थे। 1989 में वह हार गए, तो उसके बाद से यह सीट कांग्रेस कभी नहीं जीत पाई। दस बार से लगातार कांग्रेस हार रही थी। पिछली छह बार से भाजपा के मनसुख भाई वसावा वहां से सांसद हैं। लेकिन अहमद पटेल राजीव गांधी और सोनिया गांधी के इंतना करीब आ गए थे कि 1993 से 2020 तक पांच बार राज्य सभा के सदस्य रहे। 2020 में कोविड से उनका देहांत हो गया।
अहमद पटेल की बेटी मुमताज पटेल वहां से लोकसभा चुनाव लड़ना चाहती थी। जबकि कांग्रेस सिर्फ एक ही परिवार की विरासत को मानती है। इसलिए कांग्रेस ने जब यह सीट आम आदमी पार्टी को दी, तो शुरू में वह बहुत परेशान हुई। लेकिन 24 घंटे में उन्हें समझा दिया गया कि कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को यह सीट हारने के लिए दी है, जीतने के लिए नहीं दी। क्योंकि केजरीवाल को यह भ्रम हो गया है कि भरूच लोकसभा क्षेत्र की सात विधानसभा सीटों में से एक सीट जीत कर वह लोकसभा सीट जीत लेंगे। जबकि बाकी छह विधान सभा सीटें भाजपा जीती थी।
इसी तरह भावनगर भी भाजपा की पक्की सीट है, पिछले 35 साल से कांग्रेस वहां नहीं जीती। पिछले लोकसभा चुनाव में वहां भाजपा को 63 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 31 प्रतिशत वोट मिले थे। आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार को नोटा से भी कम वोट मिले थे। 2014 में जरुर आम आदमी पार्टी को 50 हजार से थोड़ा कम वोट मिल गए थे।
भावनगर की सातों विधानसभा सीटें भी भाजपा के पास हैं। तो कांग्रेस ने गुजरात में केजरीवाल को दो सीटें देकर बाकी 24 सीटों को उनके कोप से बचा लिया है। 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को जो नुकसान पहुंचाया था, अब उसे गोदी में बिठा कर बदला लिया जाएगा।
इसी तरह हरियाणा की कुरुक्षेत्र सीट भी आम आदमी पार्टी का हरियाणा में भविष्य खराब करने के लिए दी गई है। पिछली दो बार से वहां भाजपा जीत रही है। पिछ्ला चुनाव तो वहां भाजपा 55 प्रतिशत वोट हासिल कर के जीती थी। कांग्रेस को भाजपा से आधे वोट भी नहीं मिले थे। आम आदमी पार्टी वहां न तीन में है, न तेरह में।
कांग्रेस ने हारने वाली ये तीन सीटें केजरीवाल को देकर गोवा और चंडीगढ़ को उनके कोप से बचा लिया है। पिछली बार गोवा की एक सीट और चंडीगढ़ सीट कांग्रेस केजरीवाल के कोप के कारण हारी थी।
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