National Unity: हम पास हुए या फेल?

National Unity: आजादी की आज 77वीं सालगिरह मनाई जा रही है। यह दिवस विदेशी दासता से हमारी मुक्ति की ही याद नहीं दिलाता, बल्कि यह पीछे मुड़कर स्वाधीन भारत की यात्रा को देखने का अवसर भी देता है। अतीत की यात्रा हमें जहां अपनी जमीनी वास्तविकता का दर्शन कराती है, वहीं हमें चेताती भी है कि किन मुद्दों पर हम पास हुए और किन बिंदुओं पर हम पूरी तरह नाकाम हुए हैं। स्वाधीनता की सालगिरह हमारा ध्यान उस ओर भी दिलाती है, जहां अभी हमें बहुत कुछ करना बाकी है।

भारत की ऐतिहासिक यात्रा को कुछ लोग आए दिन गंग-जमुनी तहजीब और संस्कृति से लबरेज बताने से नहीं थकते। लेकिन क्या सचमुच हमारी ऐतिहासिक यात्रा गंग-जमुनी या सहधर्मिता की यात्रा रही है? इस स्वाधीनता दिवस पर हमें इस धारणा पर ईमानदारी से विचार करना चाहिए। भारत में इस्लाम से आगमन के बाद से अब तक की यात्रा को देखते हैं तो पाते हैं कि गांवों में हिंदू और मुसलमान के नाम पर सामान्य दूरी ना रही हो,लेकिन यह भी सच है कि सांस्कृतिक रूप से भारतीय नागरिकता कभी एक नहीं हो पाई।

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प्रखर समाजवादी राममनोहर लोहिया के समाजवादी चेले अक्सर इस गंग-जमुनी तहजीब की बड़ाई करते हुए अल्पसंख्यकवाद को तरजीह देते रहते हैं। लेकिन लोहिया ने ही अपनी पुस्तक भारत विभाजन के गुनहगार में स्वीकार किया है कि भारत में हिंदू और मुसलमान कभी भी खुद को सांस्कृतिक रूप से एक नहीं कर पाए।

लोहिया यहां तक लिखते हैं कि शायद ही कोई हिंदू होगा, जिसे मुस्लिम पुरखों में अपनी छाया दिखती होगी और इसी तरह शायद ही कोई मुसलमान होगा, जो हिंदुओं के पुरखों में अपनी छाया देखते हुए उन्हें अपना प्रतीक पुरूष मानता होगा। लोहिया मानते रहे कि भारत विभाजन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि विभाजन की इसी सांस्कृतिक सोच ने रखी, जिसे सैयद अहमद, इकबाल, जिन्ना या दूसरे लोगों ने हवा दी।

भारत में स्वाधीनता के बाद भले ही लोकतंत्र की जड़ें गहराई तक पहुंच गई हैं। लेकिन यह भी सच है कि इस लोकतंत्र रूपी वृक्ष की कई टहनियां अब भी बेडौल हैं और वह खुद को अलग इकाई के रूप में स्थापित करने की कोशिश करती रहती हैं। वोटों की राजनीति इस सोच को खाद-पानी देती रहती है। इसलिए जाति और धर्म की दीवारें दकियानूसी अंदाज में बढ़ती जा रही है।

निश्चित तौर पर इसकी बुनियाद भी इस्लामी विद्वानों की वैचारिकी में कहीं ज्यादा गहराई से दिखती है। रिकॉर्ड पर सर सैयद अहमद का इस संदर्भ में पहला विचार मिलता है। 16 मार्च, 1888 को मेरठ में सर सैयद अहमद ने एक भाषण दिया था, उस भाषण में उन्होंने जिस तरह मजहब आधारित बंटवारे की जो वैचारिकी प्रस्तुत की थी, आगे जाकर उसी ने देश के विभाजन की नींव रख दी।

इस भाषण में सैयद अहमद ने कहा था, 'सोचिए यदि अंग्रेज भारत में नहीं हों तो कौन शासक होगा? क्या दो राष्ट्र, हिंदू और मुसलमान, एक ही सिंहासन पर बराबर के अधिकार से बैठ सकेंगे? निश्चित रूप से नहीं। आवश्यक है कि उनमें से एक-दूसरे को पराजित करें। जब तक एक कौम दूसरे को जीत न ले तब तक देश में कभी शांति स्थापित नहीं हो सकती। मुस्लिम आबादी हिंदुओं से कम है और अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त मुस्लिम तो और भी कम, किंतु उन्हें कमजोर नहीं समझा जाए। वे अपने दम पर मुकाम पाने में सक्षम हैं।'

लोहिया जिसे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अलगाव कहते हैं, सैयद अहमद का भाषण उसका उदाहरण है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान बाद के दिनों में खिलाफत आंदोलन को कांग्रेस और गांधी की ओर मिले सहयोग की वजह चाहे अनजानी भूल क्यों ना रही हो, उसने भारत के बंटवारे की इसी सोच को ही बढ़ावा दिया। हालांकि गांधीजी की अगुआई में चले स्वाधीनता आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम की ऐतिहासिक दूरी को पाटने और धार्मिक बराबरी एवं सद्भाव की कोशिश हुई, लेकिन वह जमीन पर उतर नहीं पाई।

इसकी वजह ढूंढ़ने के लिए मुस्लिम समाज की सदियों से चली आ रही सोच की ओर देखा जाना चाहिए, जिसका अक्स सैयद अहमद के मेरठ के उसी भाषण में ही मिलता है। इस तकरीर में सैय्यद अहमद ने कहा था, "मुसलमान अपने दम पर मुकाम पाने में सक्षम हैं। संभवत: वे अपने हालात स्वयं संभाल लेंगे। यदि नहीं, तो हमारे मुसलमान भाई, पठान, पहाड़ों से असंख्य संख्या में टूट पड़ेंगे और उत्तरी सीमा-प्रांत से बंगाल के आखिरी छोर तक खून की नदी बहा देंगे। ....सात सौ वर्षों तक हमने जिन पर शासन किया, उनके अधीन रहना हमें अस्वीकार्य है। अल्लाह ने कहा है कि मुसलमानों का सच्चा मित्र केवल ईसाई ही हो सकता है, अन्य समुदाय के लोगों से दोस्ती संभव नहीं है। हमें ऐसी व्यवस्था को अपनाना चाहिए जिससे वे हमेशा के लिए भारत में राज कर सकें।"

भारत में अंग्रेजी राज से पहले देश की केंद्रीय सत्ता पर मुगलों का अधिकार था। इस नाते स्वाधीनता आंदोलन के दौरान मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा तबका यह मानता रहा कि अगर आजादी मिली तो उसके प्रतिनिधि ही स्वाभाविक शासक होंगे। सैयद अहमद के भाषण ने उसी भावना का इजहार किया था। शायद यही सोच ही रही कि राम को इमाम ए हिंद बताने वाले अल्लामा इकबाल बंटवारे की सैद्धांतिकी प्रस्तुत करने लगे। फिर भी भारतीय स्वाधीनता सेनानियों ने सोचा था कि उनकी रचनात्मक कोशिशों के बाद आजाद भारत में ऐसा समाज बनेगा, जहां धर्म और जाति की दीवारें नहीं रहेंगी। लेकिन उसके लिए जो सामाजिक और संवैधानिक उपचार हो सकते थे, वह नहीं किए गए।

संविधान के तौर पर अल्पसंख्यकों और कमजोर समझे जाने वाले जातीय समूहों को संवैधानिक तौर पर ताकतवर बनाने की जो व्यवस्था की गई, उसका उद्देश्य भले ही समानतावाद को बढ़ावा देना हो, कमजोर तबके को ताकतवर बनाना हो, लेकिन हकीकत यह है कि उसका असर उलटा पड़ा। कमजोर जातीय समूह और धार्मिक अल्पसंख्यक इसे अपने सशक्तीकरण का हथियार तो मानते रहे, लेकिन समान अवसर और समान हालात में पहुंचने के बावजूद इसे अपना राजनीतिक अधिकार मानने लगे।

इसका असर यह हुआ कि स्वाधीनता के सत्तहत्तर साल में भी ना तो जातीय दीवारें टूटीं, ना ही धार्मिक समानता का भाव पनपा। निश्चित तौर पर इसे बढ़ावा देने में पश्चिम की कथित बौद्धिक कही जाने वाली विचारधारा ने अपना ज्यादा योगदान दिया। जिसकी सूत्रधार और वाहक, दोनों वोट की राजनीति ही रही।

जाति और धर्म स्वाधीन भारत में खांचे बनते गए, जिसके भीतर ही आगे बढ़ने और अपने अधिकार बनाए-बचाए रखने की कोशिश बढ़ती गई। राजनीति इसे हवा देती गई। सही मायने में ना तो यह सशक्तीकरण का विचार है और ना ही समानता लाने की कोशिश। अब तो लगता है कि जिन संवैधानिक उपचारों के जरिए बराबरी की कोशिश की गई, वे उपचार या तो कमजोर थे, या उनके दूरगामी नतीजों पर ध्यान नहीं दिया गया। इसकी वजह यह रही कि हमने अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक बुनियाद पर खड़ी वैचारिकी का ध्यान नहीं रखा, जिसकी चर्चा लोहिया करते हैं।

धर्म, मजहब और जाति भारतीय ही नहीं, दुनिया के हर समाज की सच्चाई है। हमें इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए उसके बाद समानता की राह तलाशनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, इसलिए सामाजिक स्तर पर बराबरी का भाव अभी तक स्थापित नहीं हो पाया है। आजादी की सतहत्तरवीं सालगिरह पर हमें इस नजरिए से सोचना और देखना होगा। तभी हम भविष्य का ऐसा भारत बना पाएंगे, जो वास्तविक धरातल पर समानता के भाव से ज्ञान आधारित दुनिया रचने की दिशा में आगे बढ़ता जाएगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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