2024 Elections: वे चार राज्य जो भाजपा के लिए बने चुनौती
इंडी एलायंस चार राज्यों में भाजपा से सीधा मुकाबला चुनौती देने के मंसूबे बना रहा है। कहा यह जा रहा है कि इन चारों राज्यों में भाजपा को बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा। इन चारों राज्यों की 210 लोकसभा सीटें हैं। जिनमें से भाजपा खुद पिछली बार 121 सीटें जीती थी, और सहयोगी दल 52 सीटें जीते थे। कुल मिला कर 210 में से 173 सीटें एनडीए, जबकि विपक्षी दल सिर्फ 36 सीटें जीते थे। एनडीए को पूरे देश में मिली 353 सीटों में से करीब करीब आधी सीटें इन चार राज्यों से मिली थीं।
कांग्रेस इन चारों राज्यों में ही गठबंधन करना चाहती है। ये राज्य हैं, बंगाल, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश। इन चार राज्यों में कांग्रेस पिछली बार पांच सीटें जीती थी, बंगाल में दो, बाकी तीनों राज्यों में एक एक। इंडी गठबंधन के बाकी दल इन चारों राज्यों में 31 सीटें जीते थे। जिनमें से 22 तृणमूल कांग्रेस, 4 एनसीपी और पांच समाजवादी पार्टी। लेकिन गठबंधन के सहयोगियों से इन चारों राज्यों में कांग्रेस 50 सीटें मांग रही है। महाराष्ट्र में 48 में से 26, उतर प्रदेश में 80 में से 10, बिहार में 40 में से 9 और बंगाल में 42 में से 5 सीटें।

इनके अलावा कांग्रेस दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन में पांच और पंजाब में आठ सीटों पर दावा कर रही है। तमिलनाडु में दस सीटों पर और जम्मू कश्मीर में 3 सीटों पर दावा है। इन आठों राज्यों में कांग्रेस कुल मिला कर इंडी एलायंस के सहयोगी दलों से 85 सीटें मांग रही है।
कांग्रेस ने बाकी राज्यों में 291 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया, यानी कुल मिलाकर उसने 2024 में सिर्फ 376 सीटों की शिनाख्त की है। लेकिन महाराष्ट्र में उसे गठबंधन में 16 से ज्यादा सीटें नहीं मिलने वाली, बिहार में 5 से ज्यादा नहीं मिलने वाली, बंगाल में अगर गठबंधन हुआ, तो ममता 3 से ज्यादा सीटें नहीं देंगी।

उत्तर प्रदेश में दस सीटें जरुर मिल सकती हैं, लेकिन अगर मायावती भी गठबंधन में शामिल हुई, तो शायद यूपी में भी दस सीटें न मिलें। दिल्ली और पंजाब में अगर केजरीवाल से कांग्रेस का गठबंधन हुआ, तो वह माँगी गई 13 सीटों के बदले 8 से ज्यादा नहीं देंगे। तमिलनाडु में दस और जम्मू कश्मीर में एक सीट जम्मू की और एक सीट लद्दाख की जरुर मिल सकती है।
कुल मिला कर इंडी एलायंस से इन आठ राज्यों में कांग्रेस जहां 85 सीटें मांग रही है, वहां उसे 54- 55 सीटें ही मिलेंगी। इसका मतलब होगा कि कांग्रेस सिर्फ 345 सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी, जबकि 2019 में 421 सीटों पर और 2014 में 464 सीटों पर चुनाव लडी थी। 1984 में लोकसभा की 413 सीटें जीतने वाली कांग्रेस की अब उतनी सीटों पर चुनाव लड़ने की हैसियत भी नहीं बची।
सवाल यह है कि जिन चार राज्यों में गठबंधन ज्यादा महत्व रखता है। महाराष्ट्र, बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश। इन चारों राज्यों में क्या इंडी एलायंस भारतीय जनता पार्टी को नुकसान पहुंचा पाएगा। इनमें से बिहार और उत्तर प्रदेश को बिलकुल अलग कर दीजिए। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने कम्युनिस्टों के बाद कांग्रेस से भी गठबंधन करने से इंकार कर दिया है।
तीन जनवरी को खुद ममता बनर्जी ने कहा कि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस अकेले लड़ेगी। हालांकि कांग्रेस को दो सीटों की पेशकश बरकरार है, लेकिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने कहा है कि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने गठबंधन की संभावना खत्म कर दी है। अगर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में गठबंधन नहीं होता, और कांग्रेस कम्युनिस्ट मिल कर चुनाव लड़ते हैं, तो बंगाल में भाजपा के सामने एक उम्मीदवार की संभावना खत्म हो जाती है। ऐसे में भाजपा को 2019 में जीती 18 सीटों को बरकरार रखना कोई मुश्किल नहीं होगा। हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद बंगाल में भाजपा की ताकत बढी है, भाजपा ने अपना लक्ष्य बढा कर 35 सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है।
इसके बाद आता है उत्तर प्रदेश, जहां पिछली बार समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी मिल कर लड़ी थी, तो भाजपा को दस सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था। अगर इंडी एलायंस में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ही रहती हैं, तो भाजपा को नुकसान के बजाए कुछ फायदा ही होगा। लेकिन अगर बहुजन समाज पार्टी भी गठबंधन में जुड़ जाती है, तो भाजपा को थोड़ा बहुत नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इसके बावजूद दो कारण हैं, जिन कारणों से भाजपा की सीटें बढ़ भी सकती हैं। पहला कारण है रामजन्मभूमि मन्दिर और दूसरा कारण है मध्यप्रदेश में एक यादव को मुख्यमंत्री बना देना। भाजपा ने उत्तर प्रदेश के यादवों में सेंध मारना शुरू कर दिया है। पिछले पन्द्रह दिन में उत्तर प्रदेश के यादवों ने दो जगह सम्मेलन करके मध्यप्रदेश में यादव मुख्यमंत्री बनाने के लिए मोदी को धन्यवाद दिया है। इस तरह के कुछ और कार्यक्रम भी किए जाएंगे।
भारतीय जनता पार्टी ने चुनौती वाले दो राज्यों बिहार और महाराष्ट्र पर फोकस कर दिया है। इन दोनों राज्यों में लोकसभा की 88 सीटें हैं, पिछली बार इन दोनों राज्यों में गठबंधन करके भाजपा ने 41 सीटें जीतीं थी। 34 सीटें सहयोगी जीते थे। इस बार इन दोनों ही राज्यों में भाजपा को बड़ी चुनौती है। 2019 के भाजपा के दो सहयोगी नेता बिहार के नीतीश कुमार और महाराष्ट्र के उद्धव ठाकरे अब इंडी ब्लाक में जा चुके हैं।
माना यह जा रहा है कि नीतीश और उद्धव भाजपा को नुकसान पहुंचाएंगे। भाजपा के लिए संतोष की बात यह है कि नीतीश और उद्दव दोनों की अपनी पार्टियों पर पकड़ कम हुई है। बिहार में लालू यादव और कांग्रेस नीतीश कुमार को बता रहे हैं कि अब उनकी हैसियत 17 सीटों पर चुनाव लड़ने की नहीं रही। भाजपा ने जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा को तो नीतीश कुमार से तोड़ ही लिया है। जेडीयू के कई सांसदों के आने वाले कुछ दिनों में भाजपा में शामिल होने की उम्मीद की जा रही है।
महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस उद्धव ठाकरे को बता रही हैं कि उनकी हैसियत 23 सीटों पर चुनाव लड़ने की नहीं है। महाराष्ट्र में सीटों के बंटवारे को लेकर शरद पवार की एनसीपी, उद्धव ठाकरे की शिवसेना और कांग्रेस में टकराव बना हुआ है। भाजपा ने शिवसेना के ही दलित मराठा एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बना कर डबल गेम किया है। उद्धव ठाकरे के कांग्रेस और एनसीपी के साथ जाने से बालासाहेब ठाकरे का कोर हिन्दू वोट एकनाथ शिंदे और भाजपा के साथ जुड़ा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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