14 जून, विश्व रक्तदान दिवस: रखना ध्यान रक्त की कमी से न जाए किसी व्यक्ति की जान

14 जून के दिन को 'विश्व रक्तदान दिवस' के रूप में विश्व के बहुत सारे देशों में बड़े पैमाने पर स्वैच्छिक रक्तदान करके मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन को बचाने के लिए अगर उसको कभी अचानक रक्त की ज़रूरत पड़े, तो उसके जीवन के लिए सुरक्षित रक्त उस समय उसके आसपास के लोगों की रक्तदान करने के प्रति जागरूकता की वजह से सुलभता से उपलब्ध हो सके और रक्त के लिए उसको या उसके परिजनों को पैसे देने की ज़रूरत न पड़े। किसी व्यक्ति की जिंदगी में रक्त बेहद आवश्यक जीवन रक्षक तत्व है, क्योंकि रक्त ही हमारे शरीर के सभी ऊतकों और अंगों के लिए महत्वपूर्ण जीवन रक्षक पोषण प्रदान करता है। इसलिए 'विश्व रक्तदान दिवस' समाज में लोगों को जागरूक करके स्वैच्छिक रूप से रक्तदान के लिए प्रेरित करने का एक महान परिवर्तन लाने के उद्देश्य से मनाया जाता हैं। वैसे भी रक्तदान एक ऐसा जीवन रक्षक कारगर उपाय है जिसका अनुसरण करने से अचानक हुई किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा, दुर्घटना, हिंसा और चोट के कारण घायल, गंभीर बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति, जीवन दायनी मातृ शक्ति को डिलिवरी के समय और नवजात बच्चों की देखभाल में रक्त की आवश्यकता, थैलीसीमिया जैसी गंभीर बिमारी से पीड़ित बच्चों को रक्त की आवश्यकता और किसी भी व्यक्ति के जीवन में समय-समय पर अन्य अनेक प्रकार की सुरक्षित रक्त की जरूरत वाली आकास्मिक परिस्थितियों से निकलने के लिए समाज के बहुत सारे इंसान व इंसानियत के मित्र अच्छे व जागरूक लोगों के द्वारा स्वैच्छिक रक्तदान को अपनाया जाता है।

विश्व रक्तदान दिवस: रक्त की कमी से न जाये किसी की जान

विश्व रक्तदान दिवस का इतिहास

इस दिन को महान वैज्ञानिक कार्ल लैंडस्टीनर की जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, कार्ल लैंडस्टीनर का जन्म 14 जून 1868 को ऑस्ट्रिया के शहर वियाना में हुआ था। उन्होंने ही रक्त के विभिन्न ब्लड ग्रुप का पता लगाया था और यह जाना था कि एक व्यक्ति का खून बिना किसी जांच के दूसरे व्यक्ति को नहीं चढ़ाया जा सकता है, क्योंकि हर एक व्यक्ति का ब्लड ग्रुप अलग-अलग होता है। कार्ल लैंडस्टीनर का अपनी खोज के अनुसार तर्क था कि दो व्यक्तियों के अलग-अलग ब्लड ग्रुप संपर्क में आने के साथ रक्त के अणुओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कार्ल लैंडस्टीनर ने वर्ष 1900-1901 के दौरान खून के एबीओ रक्त समूह और रक्त में मिलने वाले एक बेहद अहम तत्व आरएच फैक्टर की जीवन की रक्षा के लिए बेहद आवश्यक खोज को अंजाम देकर, लोगों के अनमोल जीवन को बचाने के लिए मील के पत्थर वाली खोज को सफलतापूर्वक पूर्ण किया था। शरीर विज्ञान के लिए किये गये अभूतपूर्व खोज के कार्य के लिए ही वर्ष 1930 में उन्हें नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। अपनी जीवन रक्षक महान खोज के कारण उन्हें ट्रांसफ्यूजन मेडिसन का पितामह भी कहा जाता है। इसलिए इस महान ऑस्ट्रियाई जीवविज्ञानी और भौतिकीविद की याद में उनके जन्मदिन 14 जून को 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' द्वारा हर साल 'विश्व रक्तदान दिवस' के रूप में वर्ष 2004 से मनाया जाता है। वर्ष 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 100 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान की जीवन रक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण नीति की नींव डाली थी। वर्ष 1997 में संगठन ने यह लक्ष्य रखा था कि विश्व के प्रमुख 124 देश अपने यहाँ स्वैच्छिक रक्तदान को ही बढ़ावा दें, लेकिन लगभग 49 देशों ने ही इस नीति पर अभी तक अमल किया है। आज दुनिया में यह स्थिति है कि तंजानिया जैसे छोटे देश में भी 80 प्रतिशत रक्तदाता किसी को रक्त देने के एवज में पैसे नहीं लेते हैं, ब्राजील में तो यह क़ानून है कि आप रक्तदान करने के पश्चात् किसी भी प्रकार की सहायता नहीं ले सकते। ऑस्ट्रेलिया के साथ साथ कुछ अन्य देश भी हैं जहाँ पर रक्तदाता रक्त के बदले पैसे बिलकुल भी नहीं लेते। लेकिन अभी भी कई देश ऐसे हैं जिनमें अपना देश भारत भी शामिल है, जहां बहुत सारे रक्तदाता अभी भी रक्त देने के बदले चोरीछिपे या खुलेआम पैसे ले लेते हैं।

विश्व रक्तदान दिवस: रक्त की कमी से न जाये किसी की जान

भारत में रक्तदान की स्थिति पर 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' के आंकड़ों पर नजर डाले, तो उसके अनुसार देश में सालाना एक करोड़ यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है, लेकिन बहुत प्रयास के बाद भी करीब 75 फीसदी रक्त ही बमुश्किल उपलब्ध हो पाता है, जिसके चलते लगभग 25 लाख यूनिट रक्त के अभाव में हर साल लाखों मरीज़ असमय काल का ग्रास बन जाते हैं। अफसोस की बात यह है कि केंद्र व राज्य सरकार, देश की बहुत सारी स्वंयसेवी संस्थाओं और जागरूक युवाओं की टोली के धरातल से लेकर प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया तक सामुहिक प्रयास के बाद भी 135 करोड़ की आबादी वाले देश में स्वैच्छिक रक्तदाताओं का आंकड़ा कुल आबादी का एक प्रतिशत भी नहीं पहुंच पाया है। जिसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि लोगों में रक्तदान से जुड़ी जागरुकता का ना होना और उनके बीच में रक्तदान करने के बारे में बिना वजह का भय होना जिम्मेदार है।

चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार भारत में कुल रक्तदान का केवल 59 फीसदी रक्तदान स्वैच्छिक होता है। जबकि हम देश की पढ़ीलिखी राजधानी दिल्ली की बात करें तो स्वैच्छिक रक्तदान मात्र केवल 32 फीसदी ही हो पाता है। दिल्ली में लगभग 53 ब्लड बैंक हैं लेकिन फिर भी लगभग एक लाख यूनिट रक्त की हर वर्ष कमी होती है। वहीं दुनिया के कई सारे ऐसे छोटे-छोटे देश हैं जो इस मामले में भारत को काफ़ी पीछा छोड़ देते हैं। जैसे कि नेपाल में कुल रक्त की ज़रूरत का 90 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान से पूरा होता है तो हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका में 60 फीसदी, थाईलैंड में 95 फीसदी, इंडोनेशिया में 77 फीसदी और बर्मा में 60 फीसदी रक्त की जरूरत का हिस्सा लोगों के द्वारा किये गये स्वैच्छिक रक्तदान से पूरा हो जाता है।

विश्व रक्तदान दिवस: रक्त की कमी से न जाये किसी की जान

आज अपने लोगों के अनमोल जीवन को बचाने की खातिर, देश में लगातार चल रहे उस 25 लाख यूनिट रक्त के अभाव को जल्द से जल्द खत्म करने के लिए हम सभी देशवासियों को संकल्प लेकर धरातल पर कारगर ठोस पहल करनी होगी। हमको बहुत जल्दी समझना होगा कि किसी व्यक्ति के द्वारा रक्तदान करना एक अन्य व्यक्ति को जीवन प्रदान करने वाली बेहद महत्वपूर्ण घटना होती है, इसलिए हम सभी लोग हमेशा कहते हैं कि रक्तदान महादान होता है, इसका दान करने से किसी का व्यक्ति का बेहद अनमोल जीवन समय रहते रक्त मिलने से बचाया जा सकता है। आपके रक्त की हर एक बूंद का कतरा-कतरा किसी व्यक्ति के नव जीवन का कारगर स्रोत बन सकता है। हम सभी को अपने जीवन में हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि रक्त की कमी से कभी किसी व्यक्ति की जान न जाए और हर जरूरतमंद व्यक्ति को निशुल्क सुरक्षित रक्त सुलभता से प्राप्त हो। हमको भविष्य में देश में यह लक्ष्य रखना होगा की रक्त के बदले रक्त मिलने झंझट से स्वैच्छिक रक्तदाताओं की बदोलत मुक्ति मिले। आज देश में रक्त की कमी को दूर करने के लिए समाज के लोगों द्वारा जागरूकता करने के ठोस सामुहिक प्रयास धरातल पर रोजमर्रा के व्यवहार में होने चाहिए। लेकिन एक अच्छी बात यह भी है कि आज लोगों की जान बचाने की बेहतरीन सोच के साथ देश में स्वैच्छिक रूप से रक्तदान करने वाले युवा वर्ग के बहुत सारे लोग रक्त के जरूरतमंद लोगों को सुरक्षित ढंग से रक्तदान करके जान बचाने की मुहिम में निस्वार्थ सेवा भाव से बड़ी संख्या में लगे हुए हैं। स्वयं मैंने भी वर्ष 1998 में प्रथम बार रक्तदान किया था जब से ही यह प्रक्रिया लगातार चल रही है, न जाने अभी तक मैंने मेरे दोस्तों व मेरे भाईयों ने हर तीन माह के बाद कितनी बार रक्तदान किया है इसका जीवन में कभी हिसाब नहीं रखा है, बस हम सभी को रक्तदान करके एक बहुत ज्यादा आत्म संतुष्टि का भाव मिलता और किसी के जीवन बचाने की खुशी जो मिलती है उसका शब्दों में बयां करना मुश्किल है। रक्तदान करने के अपने अनुभव के आधार पर मैं रक्तदान करने में भय का सामना करने वाले उन सभी लोगों से कहना चाहता हूँ कि रक्तदान करने के बाद मुझको तो कभी भी कोई समस्या नहीं हुई है बल्कि हमेशा आत्मसंतुष्टि मिलती है।

विश्व रक्तदान दिवस: रक्त की कमी से न जाये किसी की जान

आज भी रक्तदान करते समय एक तो रेयर ब्लड ग्रुप वाले कुछ लोगों की रक्तदान न करने की इच्छा देखकर बेहद आश्चर्य होता है और वहीं कुछ लोगों की ओछी सोच व बिना मतलब का भय देखकर बहुत अफसोस होता है। कभी-कभी तो स्थिति यह होती है कि व्यक्ति खुद व अपने बच्चों को तो अपने ही मरीज को रक्त देने के लिए तैयार नहीं कर पाते हैं और बाहर के लोगों को बुलाकर उनका रक्त अपने मरीज के लिए बहुत बड़े अधिकार से लेते हैं ऐसे लोगों को समय रहते अपनी सोच को जल्द से जल्द बदलना होगा। जबकि हमारे डॉक्टर व सरकार लगातार कहते है कि एक स्वस्थ व्यक्ति को तीन माह के अंतराल पर रक्तदान करने से शरीर को कोई हानि नहीं होती है, 21 दिन में पुनः रक्त का निर्माण हो जाता है, मेरा स्वयं का अनुभव है कि रक्तदान करने के बाद हमेशा मेरे शरीर को नये जोश व स्फूर्ति का अनुभव होता है। वैसे भी डॉक्टरों के अनुसार रक्तदान करने से आपके शरीर को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता है, बल्कि आपको बहुत सारे लाभ होते हैं। जैसे कि आपको किसी का जीवन बचाने पर आत्मसंतोष मिलता है। रक्तदान करने से आपके शरीर में रक्त में स्वच्छता बनी रहती है और नया रक्त बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। डॉक्टरों के अनुसार शोध से पता चलता है कि रक्तदान करने से रक्तदाता के शरीर में जमा कोलेस्ट्रॉल की मात्रा नियंत्रित होती है और ह्रदय रोग की संभावना कम हो जाती है। भविष्य में कभी रक्त की आवश्यकता होने पर आपको स्वयं के लिए या आपके परिवार के किसी सदस्य के लिए ब्लड बैंक से रक्त लेने में आपको हमेशा प्राथमिकता मिल जाती है।

विश्व रक्तदान दिवस: रक्त की कमी से न जाये किसी की जान

हमारे देश में रक्तदान करने को लेकर अभी तक नाममात्र की जागरूकता है, देश के युवा वर्ग में रक्तदान करने को लेकर पूरी तरह से जागरूकता आनी अभी बाकी है। रक्तदान करने के संदर्भ में देश में अशिक्षित लोगों के साथ-साथ शिक्षित वर्ग के भी अधिकांश लोगों ने भी तरह-तरह की भ्रांतियां अपने मन में पाल रखी हैं, अधिंकाश लोगों में अब भी यह भ्रांति फैली हुई है कि एकबार या बारबार रक्तदान करने से शरीर में रक्त की भारी कमी हो जाती है, जो कि डॉक्टरों के अनुसार एकदम असत्य बात है, जबकि सत्य यह है कि रक्तदान करने से शरीर में रक्त की कोई कमी नहीं होती है, बल्कि रक्त बढ़ता है और शरीर में नये शुद्ध रक्त का नव संचार होता है। एक स्वस्थ मनुष्य में रक्तदान करने के बाद 21 दिनों के भीतर ही शरीर अपनी जरूरत के मुताबिक पुनः रक्त निर्माण कर लेता है। इसलिए किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को रक्तदान करने से बिल्कुल भी नहीं बचना चाहिए।

आज हम सभी देशवासियों को यह संकल्प लेना चाहिए कि भविष्य में किसी भी व्यक्ति की जान अपने देश में अब रक्त के अभाव में नहीं जायेगी और किसी भी व्यक्ति के अनमोल जीवन की रक्षा के लिए रक्तदान करना हम सभी लोगों की एक बेहद महत्वपूर्ण नैतिक व सामाजिक जिम्मेदारी होगी, जिसका हम सभी विशेषकर देश के युवा वर्ग के लोगों को बेहद जिम्मेदारी के साथ निर्वहन करना है। आज हम लोगों को हमेशा उन सभी लोगों की मदद करने के लिए तत्पर तैयार रहना चाहिए जिन्हें वक्त बेवक्त रक्त की आवश्यकता पड़ती है, यही सबसे बड़ी सेवा है। क्योंकि हमारे सनातन धर्म की गौरवशाली परंपरा के अनुसार "नर सेवा ही नारायण सेवा है।"

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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