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Dev Anand @100 : फिल्मों में सफल, लेकिन राजनीति के असफल सितारे थे देवानंद

Dev Anand @100 : धर्मदेव पिशोरीमल आनंद, अर्थात देव आनंद आज होते तो अपना 100वां जन्मदिन मना रहे होते। 26 सितंबर 1923 को पंजाब के नैरोवाल में पैदा होनेवाले देव आनंद ने हालांकि एक लंबा जीवन जिया और 87 साल की उम्र में 2011 में लंदन में उनका निधन हो गया। लेकिन देव साहब जब तक रहे जवां मर्द की तरह सक्रिय रहे। देव आनंद एक ऐसा नाम बन गया था जिसको जिंदादिली से जोड़कर देखा जाता रहा है। उनकी फिल्में, उनकी अदाएं, उनका अंदाज, उनकी शख्सियत के कारण उन्हें 'सदाबहार देवआनंद' कहा गया।

चाहे रोमांस हो या फिर राजनीति, अभिनय हो या निर्देशन, देव साहब सदाबहार ही रहे। उम्र के उस दौर तक फिल्में बनाते रहे जिस दौर में लोग बिस्तर पकड़ लेते हैं। उनके जीवन के उतार चढाव की तमाम कहानियों में राजनीतिक पार्टी बनाने की भी छोटी सी कहानी है जिसे नयी पीढी के लोग शायद नहीं जानते हैं।

100th Birth Anniversary of Dev Anand movie and political journey

यूं देव साहब रोमांस और संगीत के पुजारी थे, हमेशा जीवन को आशावादी नजरिए से ही देखते थे और यही उनकी फिल्मों और गानों में दिखता था। लड़कियां उनकी अदाओं की दीवानी रहती थीं और लड़के उनके गाने गुनगुनाकर फिक्र को धुएं में उड़ाते रहते थे। जब तक अभिनेता ही थे, तब तक राजनीति से वास्ता नहीं पड़ा, लेकिन पूरी फिल्म की जिम्मेदारी ली तो वह भी राजनीति के भंवर में फंस गए।

शुरूआत हुई 1970 में देव आनंद के डायरेक्शन में पहली फिल्म आई 'प्रेम पुजारी' से। मुद्दा था चीन युद्ध का। इस मूवी में चीन को इतनी गालियां दी गई थीं कि सारे कम्युनिस्ट नाराज हो गए। क्या चीन, क्या नेपाल और क्या भारत। नेपाल में तो देव साहब की मूवी काफी पैसा बनाती थी। वहां उसके पोस्टर फाड़ दिए गए। पश्चिम बंगाल में फिल्म रिलीज ही नहीं होने दी गई। ज्योति बसु के लिए स्पेशल शो भी रखा, और वह मूवी देखकर बिना बोले चले गए।

नेपाल में फिल्म फ्लॉप हुई तो वो नेपाल गये हालात का जायजा लेने। नेपाल में घूमते हुए उन्होंने देखा कि वहां नेपाली युवाओं को चीन से मुफ्त की ड्रग्स के जरिए नशेड़ी बनाया जा रहा था। उन्होंने मूवी के जरिए ही इन सबसे बदला लेने का मन बनाया। तब बनी 'हरे रामा हरे कृष्णा' और उसका गाना 'दम मारो दम' युवाओें का फेवरेट बन गया। नेपाल की सरकार भी काफी शर्मिंदा हुई, और ऐसे लोगों पर एक्शन लिया।

उन्होंने अपनी आत्मकथा 'रोमांसिंग विद लाइफ' में कई जगह राजनीतिक दबाव का जिक्र किया है कि कैसे उन्हें भी बाकी सितारों के साथ संजय गांधी के एक कार्यक्रम में दिल्ली बुलाया गया था। बड़े बड़े नेता और सितारे संजय गांधी के आगे नतमस्तक हुए जा रहे थे। फिर देव साहब व दिलीप कुमार से उस कार्यक्रम के बाद टीवी पर यूथ कांग्रेस की तारीफ में कुछ बोलने को कहा गया, जिसके लिए देवआनंद ने साफ मना कर दिया। हालांकि उसके बाद टीवी पर उनकी फिल्में दिखाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। चूंकि सारी टीवी, रेडियो मीडिया सरकारी था इसलिए सब जगह उनका नाम लेने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया।

कभी नरगिस और सुनील दत्त की शादी का रिसेप्शन देने वाले देव साहब ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की करीबी नरगिस से भी बात की, लेकिन नरगिस ने भी उन्हें कहा कि थोड़ी बहुत टीवी पर सरकार की तारीफ करने में क्या जाता है। बाद में यह कहकर निकल गईं कि 'आप बिना वजह जिद कर रहे हैं।'

बहरहाल इमरजेंसी के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार आपसी खींचतान में गिरी तो देवाआनंद ने इंदिरा गांधी से मुकाबले के लिए एक राजनीतिक पार्टी ही लॉन्च कर दी। पार्टी का नाम रखा 'नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया'। 14 सितम्बर 1979 को बम्बई (मुंबई) के ताजमहल होटल में इस पार्टी का ऐलान किया गया। पार्टी के अध्यक्ष देवआनंद थे और पार्टी में शामिल होने वाले प्रमुख चेहरे थे वी. शांताराम, विजय आनंद, आईएस जौहर, जीपी सिप्पी आदि। बम्बई के शिवाजी पार्क में बड़ी रैली हुई, कई सभाएं भी हुईं, लेकिन धीरे धीरे अन्य फिल्मी हस्तियां राजनीतिक पार्टी से हटने लगी। अकेले देव साहब रह गए तो उनकी समझ में आ गया कि राजनीति उनके बस की बात नहीं। हालांकि राजनीति से उनका मोह उसके बाद भी भंग नहीं हुआ और 2005 में उन्होंने एक फिल्म बनाई, 'मिस्टर प्राइम मिनिस्टर'।

शूटिंग ब्रेक में कर ली चुपचाप शादी

उनकी शादी की कहानी भी कम फिल्मी नहीं है। आप हैरान हो जाएंगे ये जानकर कि उनकी शादी शूटिंग के दौरान ब्रेक में हुई थी। उनकी पत्नी का नाम है कल्पना कार्तिक, जिनका असली नाम था मोना सिंघा। लेकिन देव आनंद के बड़े भाई ने अपनी कंपनी की फिल्म 'बाजी' में साइन करते वक्त उनका नाम बदलकर कर दिया था कल्पना कार्तिक।

दरअसल मोना यानी कल्पना 'मिस शिमला' चुनी गईं थीं। तब चेतन आनंद ने उन्हें 'बाजी' में देवआनंद के साथ मौका दिया, जो बतौर डायरेक्टर गुरुदत्त की भी पहली ही फिल्म थी। 'बाजी' की शूटिंग के दौरान ही देव आनंद से उनकी दोस्ती बढ़ने लगी थी। सुरैया से विवाह न हो पाने के गम से उबर रहे देव आनंद भी धीरे-धीरे कल्पना के इश्क में गिरफ्तार होने लगे। 'बाजी' तो सुपरहिट गई लेकिन उसके बाद कल्पना के साथ आई 'हमसफर' और 'आंधियां' नहीं चलीं।

तब योजना बनी 'टैक्सी ड्राइवर' की, जिसकी कहानी और डायलॉग चेतन आनंद की पत्नी उमा और भाई विजय आनंद के हवाले कर दिए गए। परिवार दो फिल्में पिटने से वित्तीय संकट में आ गया था, सो पूरा परिवार फिल्म पर जमकर मेहनत कर रहा था। कम से कम पैसे में ज्यादा से ज्यादा काम। इधर कल्पना को बाहर से भी ऑफर मिलने लगे थे, लेकिन वो मना कर रही थी। तो देव साहब ने एक दिन पूछा कि बाहर के ऑफर्स के लिए क्यों मना कर रही हो? तब कल्पना देव साहब को लेकर एक लॉन्ग ड्राइव पर समंदर किनारे चली गईं।

देवआनंद ने अपनी आत्मकथा में इस डेट के बारे में विस्तार से लिखा है कि कैसे तब कल्पना ने अपना सिर देव साहब के सीने पर रख दिया और कहा कि अब जब तक तुम फैसला नहीं ले लोगे, मैं तुम्हें ड्राइव नहीं करने दूंगी। देवआनंद उनकी इस जिद से इमोशनल हो गए और कल्पना का चेहरा ऊपर की तरफ किया और किस कर लिया। कल्पना की आंखों से आंसू बहने लगे।

उसके बाद देवआनंद ने कहा कि, "हम कल एंगेजमेंट करने जा रहे हैं"। कल्पना ने कहा, "कल क्यों?" तब देव ने पूछा, "फिर कब"? कल्पना ने कहा, "एंगेजमेंट नहीं सीधे शादी होगी"। अगले दिन दोनों मैरिज रजिस्ट्रार के ऑफिस में गए। एक दिन 'टैक्सी ड्राइवर' की शूटिंग के दौरान एक छोटा सा ब्रेक हुआ। दोनों फौरन कोर्ट पहुंचे। गवाह पहुंच चुके थे। दोनों ने रजिस्ट्रार के यहां साइन किए। कल्पना को देव ने रिंग पहनाई, मालाएं पहनीं और हो गई शादी।

जब देवआनंद के इंकार ने दिलाए फिल्मी दुनियां को दो बड़े सुपरस्टार

देव साहब ना होते तो अमिताभ बच्चन सुपरस्टार ना बनते। दरअसल 'जंजीर' की कहानी प्रकाश मेहरा ने देव आनंद के लिए लिखवाई थी। देव साहब को ये स्क्रिप्ट काफी पसंद भी आई थी, फिर पूछा कि रोमांटिक गाने कितने हैं? मेहरा ने बताया कि हीरो के हिस्से में कोई नाच-गाना है ही नहीं तो उन्हें बहुत ही अजीब लगा। देव साहब ने एक रोमांटिक गाना डालने को कहा लेकिन मेहरा राजी नहीं हुए तो उन्होंने फिल्म करने से मना कर दिया। देव आनंद ने फिल्म ठुकरा दी तो प्रकाश मेहरा ने उस समय संघर्ष कर रहे अमिताभ बच्चन को जंजीर फिल्म में हीरो का रोल दे दिया।

बिलकुल इसी तरह का वाकया हुआ शम्मी कपूर के साथ। 18 फ्लॉप फिल्में दे चुके शम्मी कपूर के कैरियर ने उड़ान ना भरी होती अगर उन्हें फिल्म 'तुम सा नहीं देखा' ना मिली होती। उन्हें वो फिल्म भी ना मिलती अगर देव आनंद ने उस फिल्म के लिए ऐन वक्त पर मना नहीं किया होता। फिल्मीस्तान स्टूडियो के मालिक की वजह से इस फिल्म के लिए हीरोइन अमीता का नाम पहले से तय था। लेकिन देव साहब एक भी सुपरहिट ना देने वाली लड़की के साथ फिल्म करने को तैयार ना हुए। जबकि अपनी पहली ही फिल्म डायरेक्ट कर रहे नासिर हुसैन इससे पहले देवआनंद के लिए 'मुनीमजी' और 'पेइंग गेस्ट' जैसी फिल्में लिख चुके थे और 'तुम सा नहीं देखा' भी उन्हीं के लिए लिखी थी। देव आनंद की ठुकराई उस फिल्म ने शम्मी कपूर और नासिर हुसैन दोनों का ही कैरियर बुलंदियों पर पहुंचा दिया।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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