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जानिए, राफाल सौदे की जांच अब क्यों कर रहा है फ्रांस

नई दिल्ली, 05 जुलाई। फ्रांस हथियार बनाने वाली कंपनी दासों और भारत के बीच लड़ाकू विमान राफाल की खरीद को लेकर हुए समझौते की जांच कर रहा है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 2019 के आम चुनाव से पहले जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया था और भारत के प्रधानमंत्री का नाम लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे.

8 अक्टूबर 2019 को पहला राफाल लड़ाकू विमान लेने भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह खुद फ्रांस गए थे.

फ्रांस में समझौते की जांच शुरू होन की खबर आने के बाद रविवार को राहुल गांधी ने ट्वीट किया, "चोर की दाढ़ी." तंज के अंदाज में उन्होंने ट्विटर पर एक सर्वेनुमा सवाल पूछाः JPC जाँच के लिए मोदी सरकार तैयार क्यों नहीं है? इस सवाल के जवाब में चार विकल्प दिए गए थेः अपराधबोध, मित्रों को भी बचाना है, जेपीसी को आरएस सीट नहीं चाहिए, ये सभी विकल्प सही हैं.

बाद में कांग्रेस ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार पर आरोप भी लगाए. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, "राफाल मामले में फ्रांस में भ्रष्टाचार की जांच शुरू हो चुकी है. सच कितना ही दबा लो, छुपा लो, लेकिन सच बाहर आता ही है, क्योंकि सच में ताकत होती है. राफाल घोटाले का सच भी बाहर आएगा."

तस्वीरों मेंः राफाल की ताकत

सुरजेवाला ने कहा, "जो खुलासे अब फ्रांस में हुए हैं, उन्होंने एक बार फिर शक की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है. पहली नजर से राफाल एयरक्राफ्ट सौदे में भष्टाचार साबित है, सामने है. जो कांग्रेस और राहुल गांधी कहते रहे हैं वो आज साबित हो गया है."

कांग्रेस को जवाब देते हुए भारतीय जनता पार्टी ने उस पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया. बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, "कांग्रेस पार्टी आज झूठ और भ्रम की पर्यायवाची बन चुकी है. फ्रांस में एक एनजीओ ने राफालको लेकर शिकायत की और उसके लिए वहां एक मैजिस्ट्रेट नियुक्त किया गया. लेकिन इस पूरे प्रकरण को लेकर राहुल गांधी और कांग्रेस जिस प्रकार से राजनीति कर रहे हैं, यह दुखद है."

क्या हो रहा है फ्रांस में?

फ्रांस में एक जज को 2016 में भारत और दासों के बीच हुए समझौते की जांच के लिए नियुक्त किया गया है. फ्रांस के नेशनल फाइनेंशल प्रॉसिक्यूटर (पीएनएफ) के दफ्तर ने बीते शुक्रवार को इस जांच का ऐलान किया है.

इस समझौते पर भ्रष्टाचार के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं. लेकिन पीएनएफ ने पहले जांच की मांग को खारिज कर दिया था. लेकिन खोजी पत्रकारिता करने वाली एक वेबसाइट मीडियापार्ट ने अपनी जांच के बाद आरोप लगाया कि सितंबर 2016 में हुए इस समझौते से जुड़े संदेहों को दबाया जा रहा है.

अप्रैल में मीडियापार्ट ने दावा किया कि इस सौदे के लिए बिचौलियों को करोड़ों यूरो का कमीशन दिया गया था, जिसमें भारत के नेताओं और अधिकारियों को रिश्वत भी शामिल है. दासों ने हालांकि कहा कि उसके ऑडिट में कुछ भी गलत साबित नहीं हुआ है.

देखिएः क्यों चुना गया राफाल

मीडियापार्ट की रिपोर्ट आने के बाद फ्रांस की एक गैरसरकारी संस्था शेरपा ने यह मुद्दा उठाया. वित्तीय भ्रष्टाचार के मामलों पर काम करने वाली शेरपा ने इस सौदे में भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसके चलते पीएनएफ ने जांच के लिए मैजिस्ट्रेट नियुक्त किया है.

शेरपा ने 2018 में भी जांच की मांग की थी लेकिन तब पीएनएफ ने कोई कार्रवाई नहीं की थी.

क्या है राफाल मामला?

भारत सरकार और दासों के बीच 9.3 अरब डॉलर लगभग सात खरब रुपये का समझौता 2016 में हुआ था. हालांकि इस खरीद समझौते की शुरुआत मनमोहन सिंह सरकार के समय 2012 में हुई थी, जिसके तहत 126 दासों कंपनी भारत को 126 विमान बेचने वाली थी. इसमें भारत की ओर से सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड एक पक्ष थी.

दासों के मुताबिक 2015 में समझौता लगभग तैयार था लेकिन उसी साल अप्रैल में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक फ्रांस पहुंच गए. कांग्रेस को हराकर 2014 में प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी फ्रांस पहुंचकर पुराने समझौते के बजाए नई शर्तों पर सौदा कर लिया.

नए सौदे में एचएल को बाहर कर दिया गया और एक निजी कंपनी रिलायंस ग्रुप को साझीदार बनाया गया जबकि उसके पास विमान बनाने का कोई अनुभव नहीं था. नए समझौते के तहत सिर्फ 36 विमान खरीदने का सौदा हुआ.

क्यों हैं संदेह?

भारत में 2019 के चुनाव से पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर रिलांयस कंपनी और उद्योगपति अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने के आरोप लगाए थे.

फ्रांसीसी गैरसरकारी संस्था शेरपा का कहना है कि सौदे को प्रभावित किए जाने के संकेत मिलते हैं. मसलन, 2016 में जनवरी में जब समझौते की बातचीत चल रही थी, तब रिलायंस ने जूली गाएट की एक फिल्म में पैसा लगाया. जूली गाएट तब फ्रांस के राष्ट्रपति रहे फ्रांस्वा ओलांद की पार्टनर हैं और उस फिल्म की निर्माता थीं. ओलांद ने हालांकि कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं था क्योंकि समझौते में उनकी या फ्रांस सरकार की कोई भूमिका नहीं थी.

जानिए, क्यों मिग और टाइफून से बेहतर है राफाल

फ्रांसीसी अखबार ला मोंड ने भी एक खबर छापी थी कि 2015 में जब भारत और दासों के बीच समझौते पर बातचीत चल रही थी तब फ्रांसीसी सरकार ने रिलायंस से संबंधित एक फ्रांसीसी कंपनी पर 143.7 मिलियन यूरो यानी लगभग 12 अरब रुपये का टैक्स माफ कर दिया था.

हालांकि भारत में इस मामले पर सीएजी की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला भी आ चुका है. 14 दिसंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राफालसौदे में कोई अनियमितता या भ्रष्टाचार नहीं मिला है. 14 नवंबर 2019 को एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस सौदे और उसके पुराने फैसले की समीक्षा याचिकाएं खारिज कर दी थीं.

रिपोर्टः विवेक कुमार (एएफपी)

Source: DW

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