क्या रंग लाएगी मिस्र के राष्ट्रपति की भारत यात्रा

Provided by Deutsche Welle

भारत सरकार के निमंत्रण पर सीसी बुधवार 24 जनवरी को भारत पहुंच गए थे. 25 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में उनका स्वागत किया गया और वो राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिले. उसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर उनसे मिले और उनसे दोनों देशों के आपसी रिश्तों पर चर्चा की.

दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते स्थापित हुए 75 साल बीत चुके हैं लेकिन यह पहली बार है जब मिस्र के राष्ट्रपति को भारतीय गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनाया गया है. सीसी के दफ्तर के प्रवक्ता ने भारत के निमंत्रण को दोनों देशों के बेहतरीन रिश्तों और मिस्र के लोगों और नेतृत्व के प्रति भारत की सराहना का सबूत बताया.

नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में मोदी और सीसी के नेतृत्व में दोनों देशों के प्रतिनिधि मंडलों के बीच कई विषयों पर बातचीत हुई. इस मौके पर दोनों देशों के रिश्तों को 'सामरिक साझेदारी' का दर्जा दिया गया. इसके अलावा साइबर सुरक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी, संस्कृति, युवा मामले और प्रसारण के क्षेत्रों में संधियों पर हस्ताक्षर भी किए गए.

प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर बताया कि सामरिक साझेदारी के तहत दोनों देश राजनीतिक, सुरक्षा, आर्थिक एवं वैज्ञानिक क्षेत्रों में और अधिक सहयोग करेंगे. साथ ही दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग को और मजबूत करने और आतंकवाद के मुकाबले से संबंधित सूचना एवं इंटेलिजेंस का आदान-प्रदान भी बढ़ाने का भी फैसला किया गया.

क्यों महत्वपूर्ण है मिस्र

मिस्र को 75 सालों में पहली बार गणतंत्र दिवस के लिए निमंत्रण देना कई कारणों से महत्वपूर्ण है. यूं तो दोनों देशों के बीच कई दशकों से करीबी रिश्ते रहे हैं. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और मिस्र के दूसरे राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासेर ने तत्कालीन यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज टीटो के साथ मिल कर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी थी.

उसके बाद से आज तक दोनों देशों के रिश्ते स्थिर और दोस्ताना रहे हैं. मिस्र की राजनीति में लंबे उथल पुथल के बावजूद दोनों देशों के संबंधों में स्थिरता रही. दोनों देशों के नेता भी एक दूसरे के देशों में आधिकारिक दौरे पर जाते रहे हैं और उसके अलावा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में मिलते रहे हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 2009 में मिस्र गए थे. मोदी अभी तक मिस्र की यात्रा पर नहीं गए हैं, लेकिन पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 2015 में मिस्र गई थीं. मोदी सीसी से अलग अलग अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में कम से कम दो बार मिल चुके हैं और कई बार फोन पर बात कर चुके हैं.

सीसी सितंबर 2016 में भारत भी आए थे और दोनों नेताओं की मुलाकात तब भी हुई थी. मिस्र अफ्रीका में भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों में से है. मिस्र इन दिनों आर्थिक संकट से गुजर रहा है और भारत से मदद चाह रहा है. उसे उम्मीद है कि भारत सरकार और उद्योगपति मिस्र में निवेश बढ़ाएंगे.

भारत के लिए मिस्र की जरूरत सामरिक दृष्टिकोण से ज्यादा महत्वपूर्ण है. मिस्र एक अरब देश है और उसके साथ संबंधों को और मजबूत करना अरब देशों के साथ साझेदारी बढ़ाने की भारत सरकार की राजनीति का हिस्सा है.

वरिष्ठ पत्रकार संजय कपूर मानते हैं कि मिस्र "मॉडरेट इस्लाम" का प्रतिनिधित्व करता है और सीसी को निमंत्रण देकर मोदी भारत के अंदर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी सरकार मुस्लिम-विरोधी नहीं है.

दिलचस्प है कि जून 2022 में बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के पैगम्बर मोहम्मद पर की गई विवादास्पद टिप्पणी से जन्मे विवाद पर जहां कई अरब देशों ने कड़ी निंदा की थी, उस समय मिस्र की तरफ से इस मामले पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई थी.

मिस्र इस्लामी देशों के संगठन ओआईसी का भी सदस्य है और भारत के इस कदम को ओआईसी में पाकिस्तान के प्रभाव को टक्कर देने के लिए मिस्र को खड़ा करने के उद्देश्य से भी प्रेरित माना जा रहा है.

Source: DW

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