Lok Sabha Elections: भगवान विष्णु का अवतार माने जाने वाले खास कछुए चुनाव में दे रहे योगदान, ECI ले रहा ऐसे मदद
Lok Sabha Election: कूच बिहार शहर से लगभग 10 किमी दूर, उत्तरी बंगाल के बनेश्वर गांव में एक शिव मंदिर है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे कोच वंश के राजा प्राण नारायण ने 17वीं शताब्दी में अपने शासनकाल के दौरान बनवाया था। भक्तों का मानना है कि यह मंदिर असुर राजा बाणासुर द्वारा बनवाए गए मंदिर के खंडहरों पर बना है। लेकिन, शिव मंदिर में एकमात्र निवासी देवता नहीं हैं।
मंदिर का तालाब "मोहन" का भी घर है, स्थानीय लोगों ने यह नाम लुप्तप्राय काले नरम कवच वाले कछुओं को दिया है, जिन्हें हिंदू देवता विष्णु के अवतार के रूप में पूजा जाता है। चुनाव आयोग ने 'मोहन' को लोकसभा चुनाव 2024 के लिए शुभंकर बनाया है।
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कछुए के मतदान करने ले संदेश वाले पोस्टर जिले में जगह-जगह पर लगाए गए हैं। कछुए की विलुप्त होती यह प्रजाति सिर्फ पश्चिम बंगाल के बानेश्वर मंदिर के तलाब में पाई जाती है। चुनाव आयोग आमतौर पर मतदान के लिए गाड़ियों का अधिग्रहण करता है। पहाड़ी या अन्य दुर्गम इलाकों में घोड़े-गधों का भी इस्तेमाल किया जा चुका है, लेकिन ऐसा पहली दफा है जब कछुए चुनाव में योगदान दे रहे हैं।
एक समय ऐसा था जब कछुए की इस प्रजाति को बंगाल में भी विलुप्त मान लिया गया था। बानेश्वर मंदिर के तालाब में सफाई के दौरान इन कछुओं को पाया गया। इन कछुओं को भगवान विष्णु का अवतार मन जाता है और इन्हें "मोहन" नाम से पहचाना जाता है। इन कछुओं को शुभंकर बनाने के लिए कुच बिहार प्रशासन ने चुनाव आयोग के आगे मांग रखी थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया।
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कूच बिहार में कछुओं के प्रति आस्था
कूच बिहार के लोगों में इन कछुओं के प्रति गहरी आस्था है। इनकी वजह से इस क्षेत्र में पर्यटन भी बढ़ा है। कूच बिहार के लोग विलुप्त होते इन जीवों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। बानेश्वर में कछुओं के तलाब के पास की सड़क पर गाड़ियां बहुत धीमी गति से चलाई जाती हैं। प्रशासन के आदेश के अनुसार यहां 20 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार से गाड़ी चलाने की इजाजत नहीं है। कई कछुओं की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद प्रशासन ने यह कदम उठाया है।
2002 में हुई थी "मोहन" की पहचान
मोहन कछुआ दिखने में एक अन्य कछुए 'मोर सेल' की तरह होता है। मोर सेल पश्चिम बंगाल में काफी अधिक संख्या में पाया जाता है। इस वजह से आधिकारिक रूप से भी इन कछुओं की पहचान 'निसोनिया हरम' के रूप में हुई थी। हालांकि, 2002 में बानेश्वर तलाब की सफाई के दौरान लोगों ने देखा कि यहां मोहन कछुए हैं। इसके बाद से इन्हें बचाने की पहल जारी है।
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