उफ ! लाशों की गिनती के बीच अब होगी वोटों की गिनती

कोलकाता, 30 अप्रैल: कोरोना, क्रिकेट और काउंटिंग। 'थ्री सी’ फैक्टर का जीवन पर अलग-अलग प्रभाव। कोरोना में लाशों की गिनती से मौत का सन्नाटा है। क्रिकेट में रनों की गिनती के बीच आइपीएल का मालामाल मेला जारी है। तीन दिन बाद वोटों की गिनती होगी तो जीत की खुशी और हार का मातम मनेगा। दुख और चित्कार के बीच रास-रंग ? खलल तो पड़नी ही थी। जिस जोश से पांच राज्यों में चुनाव शुरू हुआ था आज उसका बदरंग और बेमजा अंत होने वाला है। पश्चिम बंगाल में आखिरी दौर के चुनाव में क्या हुआ, यह जानने की दिलचस्पी शायद किसी में ना रही। कोरोना के खौफ से अब आइपीएल में भी खलबली है। कई विदेशी खिलाड़ी लीग छोड़ कर जा रहे हैं। आस्ट्रेलिया के स्पिनर एडम जम्पा ने कहा, जब किसी का कोई अपना डेथ बेड पर हो तो उसे क्रिकेट दिखायी नहीं पड़ता। मुझे पैसों के नुकसान का कोई गम नहीं। सेहत के आगे पैसा क्या चीज है?

 कोरोना के भय के बीच चुनाव

कोरोना के भय के बीच चुनाव

भारत में कोरोना से रोजाना मौत की संख्या अब 3645 पहुंच गयी है। स्थिति खतरनाक से खौफनाक हो गयी है। चुनावी गहमागहमी के बीच पश्चिम बंगाल में यह बीमारी किसी बम की तरह फट गयी है। 2 मार्च को 24 घंटे में करोना के सिर्फ 171 नये मरीज मिले थे। करीब दो महीने में संक्रमण का ग्राफ फुटबॉल तरह उछल गया। 28 अप्रैल को 24 घंटें में 17 हजार 207 नये संक्रमितों की पहचान हुई। 26 फरवरी को चुनाव की अधिसूचना जारी हुई थी। 29 अप्रैल को जब आठवें चरण का चुनाव हुआ तो उस पर संक्रमण और मौत का खौफ तारी था। दो महीना होते-होते चुनाव का रंग बदरंग हो गया। भय और तनाव के बीच हुए इस चुनाव को शायद ही लोग भूल पाएंगे। देश के इतिहास में आज तक ऐसा चुनाव नही हुआ। जब 2 मई को रिजल्ट निकलेगा तब हारजीत के बीच सिर्फ खामोशी होगी। अगर पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में अभी चुनाव नहीं होता तो क्या आसमान फट कर जमीन पर गिर पड़ता ? अधिक से अधिक यही होता कि इन राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाता। होता तो होता। लोगों की जान तो इस तरह खतरे में नहीं पड़ती। लोगों की जान से खेल कर अगर कोई दल सरकार बना ही लेगा तो क्या इतिहास उसे माफ कर देगा ? लाशों की गिनती के बीच वोटों की गिनती कितनी मर्मांतक होगी ?

कोरोना से क्रिकेट भी बेमजा

कोरोना से क्रिकेट भी बेमजा

आइपीएल, क्रिकेट के लबादे में लिपटा एक बहुत बड़ा कारोबार है। चाहे दुखों का कितना भी बड़ा पहाड़ क्यों न टूटा हो, आइपीएल होगा जरूर। खाली स्टेडियम में भी यह खेल मुनाफे का सौदा है। पिछले साल चार हजार करोड़ के नुकसान से बचने के लिए बीसीसीआइ ने संयुक्त अरब आमिरात में इसका आयोजन किया था। लेकिन इस बार भारत में कोरोना की भयावह स्थिति ने आइपीएल को झकझोरना शुरू कर दिया है। आइपीएल में खेल रहे आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने जब अपने देश के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन से विशेष इंतजाम करने की गुहार लगायी तो उन्होंने इंकार कर दिया। मॉरिसन ने दो टूक कहा, आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी आइपीएल खेलने के लिए निजी तौर पर भारत गये हैं। वे आस्ट्रेलिया के अधिकृत क्रिकेट दौरे का हिस्सा नहीं हैं। इसलिए सरकार उनके लिए कोई विशेष इंतजाम नहीं करेगी। उन्हें अपने स्तर से ही आस्ट्रेलिया आना होगा। मॉरिसन ने ऐसा कह कर आइपीएल को अंतर्राष्ट्रीय विवाद से बचा लिया। कोरोना का भयावह रूप देख कर आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को अब पैसे से अधिक जान की फिक्र होने लगी है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ विदेशी खिलाड़ी ही ऐसा सोच रहे हैं। भारत के स्टार स्पिन गेंदबाज आर अश्विन भी आइपीएल से हट गये हैं। अपंयार नितिन मेनन भी प्रतियोगिता से अलग हो गये हैं। जान है तो जहान है।

जान से बढ़ कर क्या है?

जान से बढ़ कर क्या है?

ममता बनर्जी ने चुनाव में नारा दिया था 'खेला होबे'। चुनाव में खेला होबे। स्टेडियम में खेला होबे। अब कोरोना ने भी जिद्दी लोगों को कह दिया कि खेला होबे। कोरोना की अनदेखी कर मनमानी करने की कीमत अब सबको चुकानी पड़ रही है। संक्रमण और मौत के रोज नये रिकॉर्ड बन रहे हैं। इस रिकॉर्ड को देख कर शरीर में झुरझुरी दौड़ रही है। अभी सबसे बड़ी प्राथमिकता लोगों के जान बचाने की है। राजनीतिक या व्यवसायिक फायदे के लिए लोगों की जान से खिलाबाड़, नाकाबिले बर्दाश्त है। पांच राज्यों के चुनाव से यह स्पष्ट हो गया कि महामारी के दौरान इलेक्शन का फैसला सही नहीं था। चुनाव की घोषणा के समय इलेक्शन कमिशन ने कोरोना गाइडलाइंस के पालन कराये जाने की बात कही थी। लेकिन वह इस काम में बुरी तरह नाकाम रहा। मद्रास हाईकोर्ट ने कोरोना फैलाने के लिए चुनाव आयोग को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। अब जब चुनाव आयोग की चौतरफा आलोचना हो रही है तो वह पल्लू झाड़ने की कोशिश कर रहा है। चुनाव आयोग ने कहा कि कोरोना गाइड लाइंस के पालन कराये जाने की जवाबदेही हमारी नहीं बल्कि राज्य सरकारों के आपदा प्रबंधन विभागों की है। जब चुनाव आयोग सुरक्षित चुनाव कराने में सक्षम नहीं था तब फिर उसने इसकी पहल क्यों की?

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