Nag Nathaiya Leela: कालिया नाग के फन पर बांसुरी बजाते दिखे कान्हा, हजारों श्रद्धालु रहे मौजूद
Nag Nathaiya Leela: वाराणसी घाट पर 496 वर्षों से चली आ रही नाग नथैया की लीला का मंचन शनिवार को किया गया, इस लीला को देखने के लिए देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे
तुलसीदास द्वारा काशी के तुलसी घाट पर 496 साल पूर्व शुरू करवाई गई Nag Nathaiya Leela की लीला का आयोजन शनिवार को किया गया। इस अद्भुत पल को देखने के लिए वाराणसी समेत आसपास के जनपदों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे थे। श्री कृष्ण के बाल स्वरुप कान्हा का किरदार निभा रहे कलाकार के कदंब की डाल से छलांग लगाने के बाद ही लोग जयकारा लगाने लगे और थोड़ी देर बाद गंगा नदी में कालिया नाग के फन पर सवार होकर कान्हा बांसुरी बजाते नजर आए।

छलांग लगाते ही लगने लगे जयकारे
यमुना नदी में कालिया नाग से लोग काफी परेशान हो चुके थे। इसी कालिया नाग से गोकुल को मुक्त कराने के की लीला शनिवार को की गई। शनिवार को शाम 4:40 बजे खेलते समय गेंद यमुना नदी में चली गई। कदंब की डाल पर बैठे श्री कृष्ण से लोगों ने बाल निकालने का अनुरोध किया। यमुना में कालिया नाग होने के चलते बाल सखाओं द्वारा श्री कृष्ण यमुना नदी में से गेंद निकालने से रोका गया लेकिन श्री कृष्ण गेंद निकालने के लिए यमुना में छलांग लगा दिए। छलांग लगाने के बाद भगवान श्री कृष्ण का बाल स्वरूप धारण किए कलाकार जब कालिया नाग के फन पर सवार हो कर बांसुरी बजाते हुए यमुना में दिखे तो वहां पर हजारों की संख्या में मौजूद श्रद्धालुओं द्वारा बांके बिहारी लाल और हर हर महादेव के गगनचुंबी नारे लगाए गए। चारों तरफ हर्ष ध्वनि गुंजने लगी और बाद में लोगों द्वारा पुष्प वर्षा भी की गई।

तुलसी घाट बन जाता है गोकुल
बताया जाता है कि वाराणसी के गंगा नदी किनार स्थित तुलसी घाट पर दीपावली के 4 दिन बाद 496 वर्षों से नाग नथैया की लीला की जाती है। इस लीला में मंचन करने वाले सभी कलाकार वाराणसी के भदैनी के ही रहने वाले होते हैं। लीला के लिए वाराणसी के गंगा किनारे स्थित तुलसी घाट को गोकुल और गंगा को यमुना का रूप दिया जाता है। लक्खा मेलों में शुमार काशी में नाग नथैया की लीला का देखने के लिए वाराणसी ही नहीं। देश विदेश से काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। शनिवार को यह लीला देखने के लिए दोपहर से ही तुलसी घाट किनारे श्रद्धालुओं का जुटान होना शुरू हो गया था।

तुलसीदास द्वारा की गई थी शुरुआत
बताया जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा 496 साल पहले नाग नथैया की इस लीला की शुरुआत की गई थी। महादेव की नगरी काशी में राम के साथ ही श्रीकृष्ण के बारे में लोगों को जागरूक करने और श्रीकृष्ण को जन-जन तक पहुंचाने के लिए शुरुआत की गई इस लीला की लोकप्रियता आज भी पहले की तरह ही है। यह लीला अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास के महंत प्रोफेसर विशंभर नाथ की देखरेख में आयोजित होता है और इस लीला के माध्यम से सभी धर्म और जातियों को एक धागे में पिरोने का कार्य किया जाता है।

22 दिनों तक चलती है लीला
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा कार्तिक माह में शुरू की गई इस श्री कृष्ण लीला में 22 दिनों तक नाग नथैया के अलावा भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव और रासलीला से लेकर, पूतना वध, कंस का वध, गोवर्धन पर्वत उठाने सहित श्रीकृष्ण की अन्य लीलाओं का मंचन किया जाता है। अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास के महंत प्रोफ़ेसर विशंभर दास द्वारा बताया गया कि साढ़े चार सौ साल से अधिक पुरानी श्री कृष्ण लीला की इस परंपरा का आज भी निर्वहन किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस लीला में सभी धर्म और जातियों के भेदभाव को मिटा दिया जाता है।

बाढ़ के चलते बड़ी मुसीबत
वर्तमान समय में गंगा नदी में बाढ़ का पानी कम नहीं हुआ है जिसके चलते नाग नथैया की लीला का मंचन करते समय थोड़ी समस्याओं का भी सामना करना पड़ा। गंगा नदी में पानी अधिक होने के चलते गंगा किनारे घाटों का संपर्क एक दूसरे से टूटा हुआ है, ऐसे में तुलसी घाट पर आयोजित होने वाली इस लीला को देखने के लिए दूसरे घाट से लोग तुलसी घाट पर नहीं पहुंच पा रहे थे। यही कारण था कि तुलसी घाट पर ही काफी संख्या में भीड़ उमड़ी हुई थी जिसके चलते लोगों को मुसीबतों का सामना करना पड़ा।












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