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बनारस में एक अनोखा आश्रम जिसमें करीब 100 सालों से गायों का दूध नहीं निकाला गया, लोग करते हैं गौमाता की पूजा

भारत में गाय को देवी का दर्जा प्राप्त है। गाय के भीतर देवताओं का वास माना गया है। पुराणों के अनुसार गाय में सभी देवी देवताओं का वास माना गया है। गाय को किसी भी प्रकार से सताना या हानि पहुँचाना घोर पाप माना गया है। ऐसे में गायों की देखभाल के लिए कई गौशालाएं भी बनाई गई है लेकिन मौजूदा स्तिथि में इन गौशालाओं की हालत क्या है, यह किसी से भी छिपा नहीं है। लेकिन आज हम आपको ऐसी अनोखी गौशाला के बारे में बताएंगे जिसमे पिछले लगभग 100 वर्षों से कभी भी दूध नहीं निकाला गया। यहाँ पलने वाली सैकड़ों गायों की बछियां ही गायों का पूरा दूध पीती हैं।

100 सालों से गायों का दूध नहीं निकाला गया

100 सालों से गायों का दूध नहीं निकाला गया

धर्म अध्यात्म का शहर बनारस पूरे दुनियां में मंदिर,घाट और गलियों के लिए प्रसिद्ध है। इस ऐतिहासिक शहर में एक ऐसा अनोखा आश्रम है जहां गायों की ऐसी सच्ची पूजा की जाती है कि पूरी दुनियां में शायद ही कहीं की जाती होता हो। गंगा के तट पर बसे रमना गांव के वितरागानंद आश्रम में बीते करीब 100 सालों से यहां पल रहे सैकड़ों गायों का कभी भी दूध नहीं निकाला गया। इन सैकड़ों गायों की बछियां ही गायों का पूरा दूध पीती हैं। यही नहीं करीब 30 बीघे के इस आश्रम में गायों को बांध कर भी नहीं रखा जाता। आश्रम के महंत स्वामी रमेशानंद सरस्वती ने बताया कि स्वामी वितरागानंद सरस्वती ने इस आश्रम की स्थापना 1924 में की थी। उन्हें गायों से बेहद प्रेम था। उस वक्त इस आश्रम में हजारों गाय रहती थी। मालवीय जी और भी कई अन्य लोग यहां पूजा के लिए आते थे। उस समय से ही यहां गायों का कभी भी दूध नहीं निकाला गया और न ही उन्हें बांधा गया। उनकी इस परम्परा का निर्वहन आज भी वैसे ही यहां हो रहा है।

स्वामी वितरागानंद करीब 200 वर्ष तक जिंदा रहे

स्वामी वितरागानंद करीब 200 वर्ष तक जिंदा रहे

वर्तमान समय में इस आश्रम में करीब 300 गाय और 200 के करीब नंदी (सांड) हैं। दोनों के लिए यहां अलग अलग व्यवस्था है। खास बात ये भी है कि इस आश्रम के व्यवस्थापकों ने आज तक इस गौशाला के लिए कोई भी सरकारी मदद नहीं ली, बल्कि भक्त और गांव के लोग यहां आते है और गायों की सेवा करते है। इसके साथ ही उनके भोजन का प्रबंध भी इन्ही भक्तों के दान से होता है। विशेष पर्व पर यहां गायों की पूजा भी की जाती है।
बताते चले कि स्वामी वितरागानंद नागा साधु होने के साथ ही भगवान शंकर के भक्त भी थे। कहा ये भी जाता है कि वह 200 वर्ष तक जिंदा रहे और फिर अपने मर्जी से उन्होंने शरीर का त्याग किया। भक्त बाबा कुमायूं ने बताया कि वो बीते 25 सालों से यहां निस्वार्थ भाव से सेवा के लिए आ रहे है। बीएचयू में ड्यूटी के समय के बाद वो यहां आते हैं और गायों की सेवा करते हैं। उनकी मान्यता है कि इन गायों की सेवा से उनके घर में किसी तरह की परेशानी और बाधा भी नहीं आती।

इनसे सीखनी चाहिए इंसानियत

इनसे सीखनी चाहिए इंसानियत

जहाँ एक तरफ आए दिन खबर आती है कि कभी गौशाला में कुत्ते द्वारा गायों का मास नोच कर खाया गया तो कभी भूक से तड़पती गायों की तस्वीरें वायरल होती है वही करीब 30 बीघे के इस आश्रम में गायों को कभी भी बांध कर भी नहीं रखा जाता है। उल्टा लोग यहाँ इन गायों की पूजा करते हैं। और तो और इस गौशाला के लिए कोई भी सरकारी मदद नहीं ली गई, बल्कि भक्त और गांव के लोग यहां आते है और गायों की सेवा करते है।
हमारे देश में गायों का जो महत्व है, लोगों का गाय के प्रति जो विशेष प्रेम है, उसके लिए सही मायने यह आश्रम जो कार्य कर रहा है वह सरहानीय है। इस कार्य की जितनी भी तारीफ की जाए उतना कम है। हमें समाज में ऐसे उधारणों को और बढ़ावा देना होगा जिससे गाय और गौशाला दोनों की स्तिथि जल्द से जल्द सुधर सके।

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