यूपी विधानसभा चुनाव 2017: मोदी के गढ़ वाराणसी में बीजेपी ने किस-किस को उतारा?
भाजपा ने पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से चुनाव लड़ रहे अपने प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी है। आइए जानते हैं इनके नाम।
वाराणसी। लम्बी जद्दोजहद और तमाम अटकलों के बाद आज पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी की भाजपाई सीट की घोषणा कर दी गई। वाराणसी की पांच सीटों में से सिर्फ उत्तर पर सिटिंग एमएलए रविन्द्र जायसवाल को टिकट दिया गया। वहीं सात बार से विधायक रहे श्यामदेव राय चौधरी (दादा) के टिकट को काट कर युवा प्रत्याशी नीलकण्ठ तिवारी को टिकट दिया गया है। कैंट विधानसभा से विधायक ज्योत्सना श्रीवास्तव की जगह उनके बेटे सौरभ को तो शिवपुर विधानसभा से अनिल राजभर और रोहनिया से सुरेंद्र नारायण को अपना प्रत्याशी घोषित किया है।


वाराणसी कैंट विधान सभा से सौरभ श्रीवास्तव
कैंट विधान सभा से टिकट पाने वाले सौरभ श्रीवास्तव को ये विधान सभा विरासत में मिल रही है। इस विधानसभा पर इनके परिवार का बीते 6 विधानसभा चुनाव से कब्जा बरकरार है। इसी सीट पर 1991 और 1993 विधानसभा में सौरभ की माता ज्योत्सना श्रीवास्तव विधायक रहीं तो वहीं 1996 और 2002 में इनके पिता और पूर्व मंत्री स्वर्गीय हरीश जी चुनाव जीते थे। फिर 2007 और 2012 में कैंट की जनता ने ये सीट इनकी मां की झोली में डाल दी। अब ये मौका सौरभ को मिला है, जो मानते हैं कि इस बार चुनाव जीतने में कोई दिक्कत नहीं हैं और इस बार वह सूबे की सरकार के अपराध और भ्रष्टाचार पर चुनाव लड़ेंगे। 2012 के चुनाव में कैंट विधानसभा से कुल 24 उम्मीदवार मैदान में थे। इसमें बीजेपी की ज्योत्सना श्रीवास्तव ने कांग्रेस के अनिल श्रीवास्तव को पराजित कर जीत दर्ज की थी। बीजेपी को जहां कुल पड़े मतों में से 32.05 प्रतिशत मत हासिल हुए तो कांग्रेस को 24.94 फीसदी। तीसरे स्थान पर रही सपा, जिसे 20.99 प्रतिशत और चौथे स्थान पर आई बसपा को 12. 27 फीसदी मत हासिल हुए।
ज्योत्सना श्रीवास्त (57918 मत) बीजेपी, अनिल श्रीवास्तव (45066 मत) कांग्रेस, अशफाक अहमद उर्फ डबलू (37922 मत) सपा, चंद्र कुमार मिश्र उर्फ गुड्डू महाराज (22162 मत)। इसके अलावा कौमी एकता दल के मो. सलीम को 5366 यानी कुल 2.97 फीसदी मत मिले।
उपलब्धि- बीते छः बार से ये सीट इनके परिवार यानि भाजपा के पास है और यही वजह है कि इस बार के चुनाव में इन्हें इसी कड़ी का फायदा मिलेगा।
कमजोरी- युवा जोश है पर अब तक चुनाव नहीं लड़ा है। हमेशा से माता पिता का राजनैतिक कैरियर देखा है।

वाराणसी शहर उत्तरी विधानसभा से रविन्द्र जायसवाल
इस विधान सभा के प्रत्याशी रविन्द्र जायसवाल एक ऐसे प्रत्याशी हैं, जिन्हें वाराणसी में सिटिंग एमएलए होने का फायदा मिला है। बीते चुनाव में कांटे की टक्कर में रवींद्र ने सुजीत को मात दी थी। 2012 के चुनाव में अंतिम समय तक यह तय नहीं था कि जीत किसकी होगी। भाजपा और बसपा में कांटे की टक्कर थी। शहर उत्तरी विधानसभा का परिणाम भी सबसे देर में आया था। लेकिन जब परिणाम आया तो भगवा ब्रिगेड की बांछें खिल गईं। रवींद्र ने निकटतम प्रतिद्वंद्वी बसपा के सुजीत को 2336 मतों से पराजित कर जीत दर्ज की। रवींद्र को जहां (47889 मत) मिले तो सुजीत को (45844 मत) मिले। सपा के अब्दुल समद को 2012 में 37434 मत मिले। कांग्रेस की रजिया कलाम को चौथा स्थान (31029) मिला।
उपलब्धि - ये उमा भारती के करीबी नेता माने जाते हैं और उनके आशीर्वाद से ही बीते चुनाव में इन्हें टिकट मिला था। बीते लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री मोदी की योजनाओ में इन्हें खास तवज्जो मिली है।
कमजोरी - बीते विधानसभा चुनाव के जिस बसपा प्रत्याशी से इनकी कांटे ही टक्कर हुई थी उसे इस बार भी टिकट मिला है। साथ ही गठबंधन के बाद नए समीकरण की आवश्यकता लगती है।

वाराणसी शहर दक्षिणी विधानसभा से नीलकण्ठ तिवारी
इस विधानसभा से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले नीलकण्ठ तिवारी पेशे के अधिवक्ता हैं और छात्र संघ चुनाव में भी इन्होंने चुनाव लड़ कर जीत हासिल की थी। इस विधानसभा पर बीते 16 बार के चुनावों में 10 बार भाजपा का ही कब्जा रहा है, जिसमें टिकट ना पाने वाले श्यामदेव राय चौधरी दादा खुद सात बार विधायक रहे हैं। नीलकंठ की मानें तो वह पूर्व विधायक के मार्ग दर्शन में इस बार चुनाव लड़ेंगे। हालांकि, पिछले विधानसभा चुनाव के परिणाम इस प्रकार हैं।
2012 के चुनाव परिणाम
2012-श्यामदेव राय चौधरी- (57868) बीजेपी, डॉ. दयाशंकर मिश्र दयालू- (44046) कांग्रेस, अतहर जमाल लारी- (20454) कौएद, मो. इश्तेकबाल कुरैशी- बाबू (14642) सपा, कैशर अमीन अंसारी- (8841) बसपा, नियाज अली मंजू -(1263) आरएलएम, साबिर- (1209)- आईएनडी, निजामुद्दीन- (993)-सीपीआई
उपलब्धि - उत्तरी विधानसभा को भाजपा का गढ़ कहा जाता है। इस विधानसभा में जितने वोटर हैं वो भाजपा से खास प्रभावित रहते हैं। यही वजह है की भाजपा का इस सीट पर लगातार कब्जा है।
कमजोरी - इस विधानसभा से टिकट के लिए सिटिंग एमएलए से लेकर तमाम वरिष्ठ नेताओं की इच्छा रही है। ऐसे में एक युवा को टिकट मिलने के बाद आपसी मदभेद का सामना करना पड़ेगा।

वाराणसी शिवपुर विधानसभा से अनिल राजभर
इस विधानसभा से टिकट पाने वाले अनिल राजभर को भाजपा का साथ पकड़े अभी करीब एक ही साल हुए हैं। इसके पहले ये समाजवादी पार्टी के साथ थे और इनके पिता विधायक भी रह चुके हैं। हालांकि, बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा कोई कमाल नहीं दिखा पाई थी पर जातिगत आधार पर भाजपा को ये उम्मीद है कि शायद इस बार शिवपुर विधानसभा भाजपा की झोली में आ जाए। पिछले साल ये सीट बीएसपी की थी। बसपा के उम्मीदवार उदय लाल मौर्या को जहां 48716 वोट मिले, वहीं एसपी के डॉ. पीयूष यादव को 36084 वोट मिले। बीएसपी के उदय लाल मौर्या ने 12632 वोटों से अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को हराया था।
उपलब्धि - जातिगत समीकरण का फायदा मिल सकता है।
कमजोरी - बीते विधानसभा में भाजपा का हारना और पार्टी में कम समय में ही आते ही टिकट मिलने से बागी नेता इनकी कमजोरी बन सकते हैं।

वाराणसी रोहनिया विधानसभा से सुरेंद्र नारायण
इस विधानसभा से भाजपा के बैनर तले चुनाव लड़ने वाले सुरेंद्र नारायण का राजनैतिक कैरियर 1981 से शुरू हुआ था और 1989 में इन्होंने भाजपा का दामन पकड़ा। 1992 में ये भाजपा के तमाम पदों पर पदाधिकारी बने और वर्तमान समय में ये पार्टी के पंचायत राज प्रकोष्ठ के सह-संयोजक पद पर तैनात हैं। हमसे बात करने पर सुरेंद्र नारायण ने बताया कि इस बार का चुनाव भाजपा ग्रामीण क्षेत्र में होने के कारण बिजली, पानी, और शिक्षा के मुद्दे पर लड़ेगी। इनका कहना है कि प्रदेश सरकार की खस्ता व्यवस्था इनका मुख्य मुद्दा बनेगा। चुनाव जीतने के लिए इन्हें हर जाति का सहयोग मिलेगा। बीते विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो साल 2012 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने शानदार जीत हासिल की थी। उन्होंने 57812 वोट हासिल किए थे। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी रमाकांत सिंह को हराया, जिन्हें 40229 वोट मिले। इस चुनाव में वोटिंग का प्रतिशत 60.35 फीसदी रहा था। 2014 में रोहनिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के महेंद्र एस. पटेल ने जीत हासिल की। उन्होंने अपना दल की उम्मीदवार कृष्णा पटेल को हराया। एसपी उम्मीदवार महेंद्र एस. पटेल को 76121 वोट मिले, जबकि कृष्णा पटेल को महज 61672 वोट मिले।
उपलब्धि - युवा होने के साथ ही इस विधानसभा के लोकसभा चुनाव में पिछड़ी जाति की जनसंख्या अधिक होने के बावजूद एक लाख 20 हजार वोट मिले थे।
कमजोरी - बीते उपचुनाव में अपना दल ने ये सीट हारी थी और समाजवादी पार्टी के महेंद्र पटेल चुनाव जीते थे जो सपा सरकार के मंत्री सुरेंद्र पटेल के भाई हैं।
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