काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन से पहले सियासत, अखिलेश बोले- अक्षयवट को आघात पहुंचाने वालों का 'क्षय' निश्चित
वाराणसी, 30 नवंबर: आगामी 13 दिसंबर को प्रधानमंत्री अपने ड्रीम प्रोजेक्ट श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन कर सकते हैं। काशी पहचान बनने वाले इस भव्य कॉरिडोर के उद्घाटन को लेकर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। 29 नवंबर, 30 नवंबर को आम दर्शनार्थियों के प्रवेश पर 12 घंटे का प्रतिबंध लगाया गया है। जबकि 1 दिसंबर को मंदिर परिसर में 24 घंटे तक आम दर्शनार्थियों का प्रवेश बन्द रहेगा। सिर्फ परिसर में दैनिक होने वाली सभी आरती और भगवान का श्रृंगार होगा। वहीं, जैसे-जैसे उद्घाटन का समय नजदीक आ रहा है वैसे वैसे श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर पर अब राजनीति शुरू हो गई है। इस पूरे मामले पर सियासत तब गरमा गई जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंगलवार की सुबह ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा, काशी में 'अक्षयवट' को आघात पहुंचाने वालों का 'क्षय' निश्चित है। भाजपा राजनीतिक दंभ से ग्रसित होकर जन भावना एवं जनसंवेदना पर निरंतर प्रहार कर रही है। उत्तर प्रदेश की जनता भाजपा को जड़ से उखाड़ देगी।

महंत ने किया अखिलेश का समर्थन, बोले- दोषी हैं स्थानीय अधिकारी
इस पूरे मामले पर oneindia hindi से बात करते हुए अक्षयवट हनुमान के महंत बच्चा पाठक ने बताया कि अखिलेश यादव यदि ऐसा बयान जारी कर रहे हैं तो वह सही है, लेकिन यह सब कुछ स्थानीय प्रशासन के इशारे पर हुआ। यदि स्थानीय प्रशासन चाहता तो उसी स्थान पर मंदिर का जीर्णोद्धार करा देता। प्रशासनिक अधिकारियों के बीच बकायदा स्टांप पर लिखा पढ़ी के बावजूद भी इस तरीके की कार्यवाही हुई। मैं अखिलेश यादव के बयान से सहमत हूं, लेकिन दोषी स्थानीय प्रशासन के अधिकारी हैं ना कि कोई मंत्री या मुख्यमंत्री। अधिकारी ने अपनी जिद्द में केमिकल और तेजाब के पानी का इस्तेमाल करते हुए इस मंदिर और अक्षयवट वृक्ष का अस्तित्व समाप्त कर दिया। यह वृक्ष हजारों वर्ष पुराना था, जबकि मंदिर 400 वर्ष पुराना। इसलिए हम किसी पार्टी या नेता को दोषी नहीं, मानते इसके पीछे स्थानीय प्रशासनिक अफसर है।
पूरे भारत में तीन 'अक्षयवट' वृक्ष थे
अक्षयवट वृक्ष और अक्षयवट हनुमान के महंत बच्चा पाठक ने बताया कि पूरे भारत में 3 अक्षयवट वृक्ष पहला गया, दूसरा प्रयागराज और तीसरा काशी का अक्षयवट वृक्ष है। सभी का अपना अलग-अलग महत्व है। प्रयागराज के अक्षयवट के नीचे बच्चों के मुंडन संस्कार और यज्ञोपवित संस्कार का विशेष महत्व है, जबकि काशी के अक्षयवट के नीचे यहां आने वाले श्रद्धालु अपने माता-पिता के नाम पर दर्शन पूजन और ब्राह्मण भोज कराते थे। वही गया के अक्षयवट के नीचे पितरो के पिंड दान का विशेष महत्व। लेकिन इन सब में सबसे महत्वपूर्ण काशी का अक्षयवट वृक्ष था, यहां दर्शन पूजन और आराधना करने से शनि के प्रकोप से मुक्ति मिलती थी। वहीं, सबसे महत्वपूर्ण यह है कि शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास स्वामी ने जब भारत की यात्रा शुरू की थी, तो वह अश्व से काशी आए थे और उन्होंने काशी के इसी अक्षयवट के नीचे बैठकर कई वर्षों तक तपस्या की थी।












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