केजरीवाल नहीं अजय राय देंगे नरेंद्र मोदी को कड़ी टक्कर

जी हां दिल्ली में शीला दीक्षित को हराने के बाद केजरीवाल को ऐसा लगने लगा है कि वो वाराणसी में मोदी को हरा देंगे। मजेदार बात यह है कि पूरा मीडिया वाराणसी की जनता, खास कर मुसलमानों से यह जानने की कोशिश में लगा है कि वे किसे वोट देंगे। ऐसे में वनइंडिया ने भी वाराणसी की खाक छानी तो अलग-अलग समीकरण नजर आये। ये समीकरण कांग्रेस के लिये अच्छे, लेकिन आप के लिये उदासी भरे हैं।
अगर हिन्दू मुस्लिम वोट देखें तो इस बार वाराणसी के 3 लाख 30 हजार मुसलमानों में ज्यादातर कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय को ही अपना नेता चुनने का मन बना चुके हैं, जबकि हिन्दुओं में एक वर्ग ऐसा है, जिसकी जनसंख्या काफी अधिक है। वह वर्ग भुमिहारों का है, जिनकी संख्या 1 लाख 80 हजार के करीब है। और चूंकि अजय राय वाराणसी के दिग्गज नेता होने के साथ-साथ भुमिहार भी हैं, इसलिये ये वोट उनके खाते में आसानी से गिर सकते हैं।
अजय राय के राजनीतिक इतिहास की बात करें तो राय 5 बार विधायक रह चुके हैं। खास बात यह है कि अजय राय जब-जब निर्दलीय चुनाव लड़े, तब-तब जीते। 2012 में सपा के टिकट पर लड़े तो हार गये, इस बार टिकट कांग्रेस का है। खैर हार जीत तो 16 मई को तय होगी, लेकिन चूंकि मुख्तार अंसारी मैदान से हट चुके हैं, इसलिये राय को मजबूती मिल सकती है।
जातिवाद या विकास
हमने जब वाराणसी की गलियों का दौरा किया तो रेलवे स्टेशन से निकलते ही आप चाहे दाहिने जायें या बायें, दोनों ओर टूटी सड़कें और साथ में पतली गलियों में ट्रैफिक जाम। गंगा नदी के घाटों पर अव्यवस्था और साथ में सुरक्षा का अभाव। गंदगी चरम पर है और छोटी-छोटी गलियों में कूड़े के ढेर मच्छरों की जनसंख्या रिकॉर्डतोड़ रूप से बढ़ा रहे हैं।
वाराणसी जो एक समय में एजूकेशन हब हुआ करता था, आज यहां के संस्थानों में (आईआईटी-बीएचयू को छोड़ कर) पढ़ाई की क्वालिटी गिरती जा रही है। ऐसे में अब देखना होगा कि वाराणसी की जनता जाति या धर्म को महत्व देती है या विकास को।












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