Year Ender 2023: क्रिकेट प्रेमियों के लिए यादगार साल, 20 साल बाद पत्नी साक्षी के साथ पैतृक गांव पहुंचे माही
साल 2023 उत्तराखंड के क्रिकेट प्रेमियों के लिए सबसे अलग और खास रहा। भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी 20 साल बाद अपने पैतृक गांव पैतृक गांव ल्वाली, अल्मोड़ा पहुंचे। यहां धोनी अपनी पत्नी और बेटी के साथ ग्रामीणों और स्वजनों के साथ काफी पल बिताए। इस बीच धोनी ने युवा क्रिकेटरों को निराश नहीं किया और सभी के साथ फोटो खिंचाई।

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पूरे परिवार के साथ उत्तराखंड पहुंचे। धोनी अपनी पत्नी साक्षी, बेटी जीवा और अपने कुछ दोस्तों के साथ पहले नैनीताल आए इसके बाद बाबा नीब करौरी महाराज के दर्शन किए। जिसके बाद धोनी अपने पैतृक गांव ल्वाली, अल्मोड़ा आए। इस बीच धोनी ने पत्नी के साथ अपने पैतृक गांव में यादगार लम्हों को कैमरे में कैद भी किया।
इन तस्वीरों में साक्षी ने अपनी सादगी से सबका दिल जीता। इन तस्वीरों को साक्षी ने अपने इंस्टाग्राम पेज पर शेयर की है। एक अन्य तस्वीर में धोनी कुछ बच्चों के साथ नजर आ रहे हैं। गांव पहुंचने पर ग्रामीणों ने उनका जोरदार स्वागत किया। इस दौरान महेंद्र सिंह धोनी ने पत्नी साक्षी और अपने दोस्तों के साथ गुरु गारयनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की। जैसे ही धोनी अपनी गाड़ी के काफिले के साथ गांव को निकले तो जगह-जगह उनकी एक झलक पाने के लिए उनके प्रशंसक बेताब दिखे।
इस दौरान उनकी एक झलक पाने के लिए प्रशंसकों की भीड़ जुटी रही। धोनी ने कुल देवता समेत गांव के चार मंदिरों में पूजा अर्चना कर परिवार के कल्याण की कामना की। गांव की बुजुर्ग महिलाओं ने धोनी और उनकी पत्नी का पारंपरिक तरीके से पूजन कर उन्हें तरक्की का आशीर्वाद दिया। काला चश्मा पहने साक्षी गांव के प्राकृतिक सौन्दर्य से अभिभूत नजर आई।
साक्षी ने गांव की महिलाओं के साथ खूब बातचीत की। इस दौरान महेंद्र सिंह धोनी ने बच्चों का हौसला अफजाई की। गांव के युवाओं ने धोनी से क्रिकेट की बारीकियां सीखी। महेंद्र सिंह धोनी इससे पहले 2003 में गांव आए थे। महेंद्र सिंह धोनी के पिता पान सिंह ने 40 साल पहले अपना पैतृक गांव को छोड़ दिया था।
वह रोजगार के लिए रांची चले गए। बाद में वह वहीं रहने लगे। हालांकि धोनी के पिता धार्मिक आयोजनों में गांव में आते हैं। धोनी के चाचा घनपत सिंह भी अब गांव में नहीं रहते हैं। वह भी चार वर्ष पूर्व गांव से पलायन कर हल्द्वानी बस गए हैं। धौनी का परिवार वर्ष 2004 में गांव आया था। उत्तराखंड गठन से पूर्व महेंद्र धौनी का अपने पैतृक गांव में जनेऊ संस्कार हुआ था।












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