उत्तराखंड में एक माह तक मनाई जाने वाली कुमाऊंनी होली क्यों है खास, जानिए ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व

कुमाऊं में होली के 3 स्वरुप- बैठकी होली, खड़ी होली और महिला

देहरादून, 17 मार्च। पूरे देश होली के रंगों में रंगा हुआ नजर आ रहा है। होली आते ही उत्साह और होल्यार अपने आप ही झलकने लगता है। रंगों का पर्व होली हर किसी के लिए खास होता है। ऐसे में हर किसी को रंग के पर्व होली का साल भर इंतजार रहता है। खासकर उत्तराखंड के कुमाऊं में। जहां होली का त्यौहार एक माह तक मनाया जाता है। कुमाऊं में होली के 3 स्वरुप नजर आते हैं। बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली। जो कि सिर्फ रंगों के साथ ही नहीं खेली जाती। कुमाऊं में होली गायन, नृत्य और सांस्कृतिक विरासत को संजोते हुए खेली जाती है। जो कि रंग के अलावा प्रकृति के बदलाव का भी स्वागत करती है। होली आते ही मौसम में गरमी का एहसास होने लगता है। जो कि बसंत ऋतु के साथ ही शुरू हो जाती है।

 Why Kumaoni Holi, celebrated for a month in Uttarakhand, is special, know its historical and cultural importance

बसंत पंचमी के दिन से ही शुरू हो जाता है

कुमाऊंनी होली का अपना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व है। होली का त्यौहार कुमाऊं में बसंत पंचमी के दिन से ही शुरू हो जाता है। कुमाऊंनी बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली के रुप में मनाते हैं। ​रंग के अलावा गीत, संगीत, नृत्य के साथ घर-घर जाकर एक दूसरे को बधाई देते हैं। वरिष्ठ पत्रकार डॉ अजय ढ़ोडियाल बताते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में भी कुमाऊं में होली का गायन होता रहा। 1850 से होली की बैठकें नियमित होने लगीं और 1870 से इसे वार्षिक समारोह के रूप में मनाया जाने लगा। राजा कल्याण चंद्र के समय दरबारी गायकों के भी संकेत मिलते हैं। डॉ अजय बताते हैं कि होली में फाग यहां की विशेषता है। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में अल्मोड़ा, नैनीताल,पिथौरागढ़, चम्पावत और बागेश्वर जिले आते हैं। जहां होली खास तरह से मनाई जाती है। खासकर भगवान को याद भी करते हुए एक दूसरे को बधाई दी जाती है। डॉ अजय ने बताया कि होली पर जो गीत सबसे ज्यादा गुनगुनाए जाते हैं,

उनमें 'सिद्धि को दाता, विघ्न विनाशन, होली खेलें गिरिजापति नंदन' और

जल कैसे भरूं जमुना गहरी -2

ठाडी भरूं राजा राम जी देखें
बैठी भरूं भीजे चुनरी
जल कैसे...जैसे गीत गाए जाते हैं।

होली के स्वरूप--
बैठकी होली- मुख्य रूप से अल्मोड़ा और नैनीताल में ही मनाई जाती रही है। बैठकी होली बसंत पंचमी के दिन से शुरू हो जाती है, और इस में होली पर आधारित गीत घर की बैठक में राग रागनियों के साथ हारमोनियम और तबले पर गाए जाते हैं। कुमाऊं के प्रसिद्द जनकवि गिरीश गिर्दा ने बैठकी होली के सामाजिक शास्त्रीय संदर्भों के बारे में गहराई से अध्ययन किया है, और इस पर इस्लामी संस्कृति और उर्दू का असर भी माना है।

खड़ी होली-बैठकी होली के कुछ दिनों बाद खड़ी होली शुरू होती है। जो कि कुमाऊं के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलता है। खड़ी होली में गांव के लोग टोपी, कुर्ता और चूड़ीदार पायजामा पहन कर एक जगह एकत्रित होकर होली गीत गाते हैं, और साथ साथ ही ढोल-दमाऊ तथा हुड़के की धुनों पर नाचते भी हैं। खड़ी होली के गीत कुमाऊंनी भाषा में होते हैं। होली गाने वाले लोगों को होल्यार कहते हैं, जो कि बारी बारी गांव के प्रत्येक व्यक्ति के घर जाकर होली गाते हैं, और उसकी समृद्धि की कामना करते हैं।

महिला होली-महिला होली में प्रत्येक शाम बैठकी होली जैसी ही बैठकें लगती हैं, जिसमें ​सिर्फ महिलाएं ही भाग लेती हैं। इसके गीत भी महिलाओं पर ही आधारित होते हैं।

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