कौन हैं उत्तराखंड के जीवन जोशी? पीएम मोदी ने Mann Ki Baat में उनके 'बगेट कला' की चर्चा क्यों की?
PM Modi Mann Ki Baat: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (25 मई) अपने रेडियो कार्यक्रम मन की बात कार्यक्रम की 122वें एपिसोड में लोगों से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर से लेकर कई अहम मुद्दों पर अपनी बात रखी। इसी दौरान पीएम मोदी ने उत्तराखंड के 65 वर्षीय दिव्यांग जीवन जोशी (Jivan Joshi Baget art) की चर्चा की और उनके द्वारा स्थापित किए गए बगेट कला उसके प्रति उनके समर्पण की कहानी शेयर किया। चलिए जानते हैं कौन है जीवन जोशी और क्या है उनकी बागेट कला जिसकी चर्चा पीएम मोदी ने अपने महत्वपूर्ण कार्यक्रम में किया।

पीएम मोदी ने क्या कहा?
मन्न की बात के 122वें एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, 'आज मैं आपको 65 वर्षीय जीवन जोशी के बारे में बताना चाहता हूँ। अब सोचिए, जिनके नाम में ही 'जीवन' होता है, वह जीवन से कितने भरे होंगे। जीवन जी हल्द्वानी, उत्तराखंड में रहते हैं। बचपन में पोलियो ने उनके पैरों की ताकत छीन ली, लेकिन पोलियो उनके हौसले को छीन नहीं पाया। जीवन जोशी ने एक अनोखा कला रूप जन्म दिया और इसका नाम रखा 'बगेट'। इसमें वह उस सूखी छाल से सुंदर कलाकृतियां बनाते हैं जो पाइन के पेड़ों से गिरती है। वही छाल, जिसे लोग आमतौर पर बेकार समझते हैं, जीवन जी के हाथों में आते ही विरासत बन जाती है। कभी वह पहाड़ों के लोक वाद्ययंत्र बन जाती है, तो कभी ऐसा लगता है जैसे पहाड़ों की आत्मा उस लकड़ी में समा गई हो।'
कौन हैं जीवन चंद्र जोशी?
जीवन चंद्र जोशी उत्तराखंड के हल्द्वानी (Haldwani) शहर के कठघरिया क्षेत्र के निवासी हैं और एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। वे एक कुशल काष्ठ शिल्पी होने के साथ-साथ एक संघर्षशील और समर्पित कला साधक भी हैं। बचपन में पोलियो के कारण उन्होंने अपने पैरों की शक्ति खो दी थी, लेकिन उनके आत्मबल और रचनात्मकता ने उन्हें कभी थकने या रुकने नहीं दिया। पिछले बीस वर्षों से वे काष्ठ कला के क्षेत्र में सक्रिय हैं और उन्होंने अपनी अनूठी कला शैली को 'बगेट कला' का नाम दिया है। जीवन जोशी न केवल खुद कला सृजन करते हैं, बल्कि बच्चों और युवा कलाकारों को प्रशिक्षित कर इस लोककला को आगे बढ़ाने और जीवित रखने का कार्य भी कर रहे हैं।
क्या है बगेट कला?
- बगेट (Baget) शब्द का संबंध चीड़ (Pine) के पेड़ की सूखी छाल से है, जो आमतौर पर जंगलों में गिर जाती है और बेकार समझी जाती है।
- जीवन जोशी उसी छाल को तराशकर सुंदर और जीवंत कलाकृतियां, लोक वाद्ययंत्र और सांस्कृतिक प्रतीक तैयार करते हैं।
- यह कला न केवल पर्यावरण मित्र है, बल्कि एक स्थानीय सांस्कृतिक धरोहर को भी पुनर्जीवित करती है।
- उनकी बनाई कलाकृतियों में पहाड़ों की आत्मा, लोक परंपरा और प्रकृति से जुड़ाव साफ झलकता है।
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