उत्तरकाशी विश्वनाथ मंदिर को क्यों मानते हैं कलियुग में शिव का वास, दक्षिण दिशा में एक मात्र स्वयंभू शिवलिंग
Sawan उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले में है विश्वनाथ मंदिर। मान्यता है कि 12 ज्योतिर्लिगों में से एक उत्तराखण्ड के काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना भगवान परशुराम द्वारा की गई थी। जहां स्वयंभू शिवलिंग है।
Sawan भोलेनाथ का सबसे प्रिय महीना माना गया है। इस दौरान शिवभक्त शिव मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना और जल चढ़ाना नहीं भूलते। ऐसे में अगर शिव के कलियुग में निवास करने वाले स्थान पर जाने और भक्ति करने का मौका मिले तो हिंदू धर्म को मानने वाला खुद को धन्य महसूस करेगा। भगवान शिव के कलियुग में निवास करने को लेकर पुराणों में जो वर्णित है और जो काशी शिव के एक मात्र स्वयंभू शिवलिंग होने और आसपास ऐसे सभी क्षत्रपालों और शिव परिवार के होने का प्रमाण लिए हुए हैं, वह है उत्तरकाशी।

उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले में है विश्वनाथ मंदिर। जिसे विश्वनाथ की नगरी, बाड़ाहाट, सौम्यकाशी और पुराणों में कई नामों से जाना गया है। मान्यता है कि 12 ज्योतिर्लिगों में से एक उत्तराखण्ड के काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना भगवान परशुराम द्वारा की गई थी। जहां स्वयंभू शिवलिंग है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मंदिर का निर्माण गढ़वाल नरेश प्रद्युम्न शाह ने करवाया था , बाद में उनके बेटे महाराजा सुदर्शन शाह की पत्नी महारानी कांति ने 1857 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। विश्वनाथ मंदिर में जो प्राचीन शिवलिंग है वह दक्षिण की ओर झुका हुआ है। जो कि पूरे भारत में एक मात्र ऐसा शिवलिंग है। दूसरे सभी उत्तर की दिशा में हैं।
चारों धाम से जुड़ी एक मान्यता ये भी है कि उत्तरकाशी के विश्वनाथ मंदिर की पूजा अर्चना किये बिना गंगोत्री धाम की यात्रा के पूरी नहीं होती। मंदिर परिसर के गर्भगृह में देवी पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित है और साथ ही साथ भगवान साक्षी गोपाल और बाबा मार्कंडे मंदिर भी हैं।
मंदिर को कत्युरी शैली में बनाया गया है। विश्वनाथ मंदिर के महंत अजय पुरी ने बताया कि स्कन्दपुराण के केदारखंड में भगवान आशुतोष ने उत्तरकाशी को कलियुग की काशी के नाम से संबोधित किया है। साथ ही कहा कि वे अपने परिवार, समस्त तीर्थ स्थानों, काशी सहित कलियुग में उस स्थान पर वास करेंगे। जहां पर एक अलौकिक स्वयंभू लिंग, जो कि द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक है, स्थित है। साथ ही उत्तरकाशी वरूणा और असी के संगम पर बसा है। जो कि प्रमाण है कि यहीं शिव का वास है।
मंदिर को लेकर एक कथा है, जिसके अनुसार ऋषि मार्कंडेय अल्पायु से शापित थे। वह विश्वनाथ मंदिर में ही तपस्यारत थे। जब मृत्यु के देवता यमराज उनके प्राण लेने के लिए आये तो ऋषि विश्वनाथ से जाकर लिपट गये। भगवान भोले ने अपने भक्त की भक्ती को देखते हुए यमराज को खाली हाथ वापस भेज दिया। इसी कारण विश्वनाथ मंदिर में शिवलिंग दक्षिण की ओर झुका हुआ है।












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