अद्भुत है यहां देवडोलियों का संगम, उत्साह, उमंग और जागृति का अनोखा उत्सव है 'सेलकू'
उत्तरकाशी के भटवाड़ी ब्लॉक में मनाया जाता है सेलकू उत्सव
देहरादून, 10 सितंबर। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां की संस्कृति, परंपरा और रीति रिवाज कुछ खास है। सबसे खास है यहां के स्थानीय देवी देवता और स्थानीय त्यौहार या पर्व। ऐसा ही एक त्यौहार इन दिनों उत्तरकाशी के भटवाड़ी ब्लॉक में मनाया जा रहा है, जिसे कहते हैं सेलकू। यानि सोएगा कौन।
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दो दिन तक ग्रामीण उत्सव मनाते हैं
इस त्यौहार में दो दिन तक ग्रामीण उत्सव मनाते हैं। इस दौरान आसपास के कई गांवों की डोलियां एकत्र होकर नृत्य करती हैं। साथ ही ग्रामीण भी इस दिन पूरे जोश के साथ मंदिर प्रांगणों में एकत्र होकर रासौ नृत्य लगाते हैं। इसके साथ ही दूर-दराज क्षेत्र से आने वाले लोग इस दिन देव डोलियों से अपनी मनोकामना लेकर आते हैं। स्थानीय लोग इसे सालों और कई पूर्वजों की परंपरा मानते आ रहे हैं। जिसे अब युवा भी पूरा उत्साह से मनाते हैं।

सेलकू को स्थानीय लोग उजाले का प्रतीक भी मानते हैं
स्थानीय लोग इसे जागृति का प्रतीक मानते हैं। साथ ही नई फसल के आने और मवेशियों के जंगल से गांव की ओर लौटने के कारण खूश होकर उत्सव मनाते हैं। सेलकू को स्थानीय लोग उजाले का प्रतीक भी मानते हैं। इसके बाद मौसम बदलता है, और जीवन में नए उत्साह और उमंग से उत्साहित ग्रामीण देव डोलियों के साथ नृत्य करते हैं।

एक दूसरे से मिलने के लिए उत्साहित रहते हैं ग्रामीण
ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह के उत्सव मनाने के पीछे बेटियों का घर आना, गांव से दूसरी जगह रहने वाले अपने परिजनों और दूर-दराज क्षेत्रों में रहने वाले रिश्तेदारों से भी मिलना जुलना हो जाता है। इस दिन घरों में पकवान बनाए जाते हैं। जिसे घर पर आने वाले सभी लोगों को बड़े उत्साह से परोसा जाता है।

एक साथ पूजा और उसके बाद नृत्य सबसे आकर्षक
भटवाड़ी ब्लॉक के अष्टमंडली गांव गोरशाली, जोंकाणी, गैरी, लाटा, सेंज, कुमाल्टी, जखोल, पोखरी में सेलकू बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं। भटवाड़ी ब्लॉक के गोरशाली गांव में भी सेलकू का आयोजन हुआ। गांव में 8 देवडोलियों का संगम एक अद्भुत नजारा होता है। एक साथ पूजा और उसके बाद नृत्य सबसे आकर्षक होता है। रात में पूरा गांव और मेहमान जागरण करते हैं और नृत्य करते हैं।

स्यालगी में भ्रमण, देव डोलियों का नृत्य और रासो
इसके बाद सुबह देव डोलियां एक निश्चित स्थान स्यालगी में भ्रमण के लिए जाते हैं। यहां पर हूणेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है, इस जगह एक बार फिर देवडोलियां नृत्य करती हैं। इसके बाद मंदिर प्रांगण में देव डोलियों का नृत्य और रासो नृत्य होता है। इस बीच देवता गांव के किसी व्यक्ति पर अवतरित होता है। जिसे पशुवा कहा जाता है। पूजा के लिए सभी गांव के लोग अपने अपने घरों से फरसे लेकर आते है। इसे स्थानीय भाषा में डांगरी कहा जाता है। और इसे पवित्र माना जाता है। इसे देवता के आगे रखा जाता है।

भक्तों का अटूट विश्वास, देवता का आशीर्वाद
इसके बाद देवता जिस स्थानीय पर अवतरित होता है वो इन फरसों की धार पर पैदल चलता है और लोगों को अपना आशीर्वाद देता है। इस बीच भक्तों की मन की आशंकाएं और किसी भी समस्या को पशुवा के सामने रखा जाता है। जिस पर भक्तों का अटूट विश्वास होता है। माना जाता है कि जो पूरी श्रद्धा के साथ पशुवा के सामने अपनी समस्या या मनोकामना रखते हैं, वह जरूर पूरी होती है। इसी अटूट विश्वास के साथ भक्त भगवान से विदा लेते हैं इस वादे के साथ कि अगले साल इसी पर्व को इसी उत्साह के साथ मनाया जाएगा।












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