उत्तराखंड में निकाय चुनाव को लेकर सस्पेंस,जानिए कहां फंसा पेंच, सियासत भी गरमाई

उत्तराखंड में निकाय चुनाव को लेकर सस्पेंस बरकरार है। गैरसेंण सत्र में ​निकायों के ओबीसी आरक्षण संबंधी विधेयक पर सत्ता पक्ष के विधायकों के विरोध के बाद प्रवर समिति को मामला सौंप दिया गया है।

ऐसे में साफ है कि अब डेडलाइन के अंदर चुनाव कराना आसान नहीं होगा। प्रवर समिति एक माह तक आरक्षण संबंधी शिकायतों को सुनकर रिपोर्ट तैयार करेगी। इसके बाद इस पर विचार होगा।

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ऐसे में अक्टूबर तक निकाय चुनाव कराने की चुनौती को पूरा कर पाना सरकार के लिए आसान नहीं है। बता दें कि सरकार ने हाईकोर्ट को 25 अक्टूबर तक निकाय चुनाव कराने की जानकारी दी है। निकायों के कार्यकाल पूरा होने के बाद दो बार प्रशासकों का कार्यकाल बढ़ाया जा चुका है। स्थानीय निकायों का कार्यकाल दिसंबर 2023 में समाप्त हो गया है। सरकार ने निकायों के संचालन को छह माह के लिए प्रशासक नियुक्त कर दिए।

जून 2024 में प्रशासकों का छह माह का कार्यकाल भी समाप्त हो गया। राज्य सरकार ने चुनाव कराने के बजाय प्रशासकों का कार्यकाल बढ़ा दिया। अब सरकार ने निकायों का कार्यकाल समाप्त होने के आठ माह बीत जाने के बाद कई नगर निगम व नगर पंचायतों की घोषणा कर दी है। लेकिन आरक्षण संबंधी विधेयक पर आपत्ति के बाद ये मामला लंबा खिंच गया है।

उधर निकाय चुनाव को लेकर सियासत गरमा गई है। कांग्रेस इसे भाजपा का डर करार दे रही है। जबकि भाजपा इसे संवैधानिक प्रक्रिया बता रही है। कांग्रेस का कहना है कि निकाय चुनाव में कांग्रेस की जीत को देखते हुए भाजपा चुनाव समय पर कराने में डर रही है।

भाजपा ने सभी पार्टियों से निकाय से जुड़ी संवैधानिक प्रक्रिया को समझने और राजनैतिक बयानबाजियों से बचने की सलाह दी है। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा, जनता का रुझान बताता है कि निकाय चुनाव जब भी होंगे, भाजपा की एकतरफा जीत निश्चित है। सरकार पहले ही प्रवर समिति की रिपोर्ट के बाद शीघ्र विशेष सत्र की बात कह चुकी है ऐसे में अपनी हार के लिए कांग्रेस का उतावलापन कतई उचित नही है।

उन्होंने कहा, कांग्रेस भी जानती है कि ओबीसी आरक्षण को लेकर आयोग की रिपोर्ट के मद्देनजर ही निगम एवं निकाय के एक्ट में संशोधन विधेयक विधानसभा में प्रस्तुत किया गया था। चूंकि कई विधायकों को इसमें कुछ आपत्ति थी लिहाजा इसे प्रवर समिति को सोपा गया है। सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि शीघ्र ही प्रवर समिति की रिपोर्ट आने के बाद विशेष सत्र बुलाकर इसे पारित किया जाएगा।

विधेयक पास होने के बाद जिलाधिकारी के माध्यम से ओबीसी आरक्षण का नोटिफिकेशन जारी कर उस पर आपत्तियां व सुझाव मांगे जाएंगे। सभी जनपदों से प्राप्त रिपोर्ट के बाद ही चुनाव कराए जाने की निश्चित प्रक्रिया है । लिहाजा राजनीतिक लाभ के लिए भ्रमित करने वाली बयानबाजियां अब विपक्ष को बंद करनी चाहिए।

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