श्रीकृष्ण जन्माष्टमी:इस मंदिर में साल में एक दिन होते हैं दर्शन, दूसरे में शिवपार्वती के रूप में हैं राधाकृष्ण

उत्तराखंड: श्रीकृष्ण के ऐसे मंदिर जिनकी पौराणिक मान्यता खास

देहरादून, 16 अगस्त। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हिंदूओं का विशेष पर्व और त्यौहार है। इस दिन भगवान बिष्णु के श्रीकृष्ण के अवतार के लिए भक्त भगवान की पूजा अर्चना करते हैं और व्रत रखते हैं। हिंदूओं में भगवान श्रीकृष्ण को मानने वाले कई लोग हैं। जो कि देश ही नहीं विदेशों में भी श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं। इस वजह से श्रीकृष्ण के कई भव्य मंदिर हैं। लेकिन कुछ ऐसे मंदिर हैं, जिनकी पौराणिक मान्यता दूसरों से बिल्कुल अलग है। उत्तराखंड में भी श्रीकृष्ण के कुछ ऐसे मंदिर है। जिनकी पौराणिक मान्यता खास है।

चमोली जिले की उर्गम घाटी में बंशीनारायण मंदिर

चमोली जिले की उर्गम घाटी में बंशीनारायण मंदिर

उत्तराखंड के चमोली जिले की उर्गम घाटी में बंशीनारायण मंदिर है। यहां तक कई लोग ट्रैकिंग करते हुए पहुंचते हैं। जिस स्थान पर मंदिर है वहां बुग्याल भी है। स्थानीय लोगों का दावा है कि बंशी नारायण मंदिर की बनावट कत्यूरी शैली में बना है। जो कि छठवीं से दसवीं इसवीं के मध्य निर्मित किया गया है। इस मंदिर को लेकर सबसे बड़ी मान्यता ये है कि मंदिर सिर्फ एक दिन के लिए खुलता है। रक्षाबंधन के दिन सूर्योदय के साथ खुलता है और सूर्यास्त होते ही मंदिर के कपाट अगले 365 दिन के लिए बंद कर दिए जाते हैं। लेकिन जैसे ही मंदिर का द्वार खुलता है वैसे ही महिलाएं भगवान को राखी बंधना शुरू कर देती हैं और बड़े धूम.धाम के साथ पूजा भी करती हैं। यहां श्री कृष्ण और भोलेनाथ की प्रतिमा स्थापित हैं। दस फुट ऊंचे मंदिर में भगवान की चतुर्भुज मूर्ति विराजमान है।

वामन अवतार से मुक्त होने के बाद सबसे पहले यहीं प्रकट हुए थे विष्णु

वामन अवतार से मुक्त होने के बाद सबसे पहले यहीं प्रकट हुए थे विष्णु

पौराणिक मान्यता है कि विष्णु अपने वामन अवतार से मुक्त होने के बाद सबसे पहले यहीं प्रकट हुए थे। इसके बाद से ही यहां देव ऋषि नारद भगवान नारायण की पूजा की जाती है। इसी वजह से यहां पर लोगों को सिर्फ एक दिन ही पूजा करने का अधिकार मिला हुआ है। मान्यता है कि राजा बलि के अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन का रूप धारण किया था और बलि के अहंकार को नष्ट करके पाताल लोक भेज दिया। जब बलि का अहंकार नष्ट हुआ तब उन्होंने नारायण से प्रार्थना की कि आप मेरे सामने ही रहें। इसके बाद विष्णु जी बलि का द्वारपाल बन गए। जब बहुत दिनों तक विष्णु जी, मां लक्ष्मी के पास नहीं पहुंचे तो लक्ष्मी जी पाताल लोग पहुंच गईं और बलि की कलाई पर राखी बांधकर उन्हें विष्णु जी को मांग और लौटकर अपने लोक में पहुंच गए। तब से इस जगह को वंशी नारायण के रूप में पूजा जाने लगा। , मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान नारद जी ने 364 दिन भगवान विष्णु की पूजा करते और एक दिन के लिए चले जाते थे ताकि लोग पूजा कर सकें।

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    शिव राधा के रूप में और पार्वती कृष्ण भगवान के रूप में विराजमान

    शिव राधा के रूप में और पार्वती कृष्ण भगवान के रूप में विराजमान

    हरिद्वार के कनखल में स्थित राधा श्रीकृष्ण मंदिर में शिव राधा के रूप में और पार्वती कृष्ण भगवान के रूप में विराजमान हैं। मान्यता है कि अविवाहित अगर सच्चे मन से 40 दिन तक मंदिर में भगवान राधा कृष्ण की पूजा करता है तो विवाह में आ रही बाधा दूर होती है।
    पौराणिक मान्यता के अनुसार हरिद्वार ब्रह्मा जी के पुत्र राजा दक्ष की नगरी थी और यहीं भगवान कृष्ण राधा के साथ कनखल में भी विराजते हैं। इस मंदिर का निर्माण लंढौरा रियासत की महारानी ने कराया था। जिसके बाद महारानी की सभी परेशानियां दूर हो गई थीं। स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता के अनुसार लंडौरा रियासत की महारानी धर्मकौर काफी धर्मप्रिय थीं, वह अपने बेटे की वजह से काफी परेशान रहती थीं। एक बार तीर्थ यात्रा के दौरान वह मथुरा और वृंदावन पहुंचीं, जिसके बाद उन्होंने एक कृष्ण मंदिर बनाने की इच्छा जताई। मान्यता है कि तब भगवान श्री कृष्‍ण उनके सपने में आए और कहा कि वह गंगा के किनारे हरिद्वार के कनखल में उनका मंदिर बनवाएं। इसके बाद महारानी धर्मकौर ने कनखल में राधाकृष्‍ण का यह मंदिर बनवाया।

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