पितरों को प्रसन्न करना है तो उत्तराखंड में इन मोक्ष स्थलों का खास पौराणिक महत्व, भगवान ने यहां किया पिंड दान
उत्तराखंड में मोक्ष स्थलों का खास पौराणिक महत्व
देहरादून, 7 सितंबर। 10 सितंबर से श्राद्ध पक्ष शुरू होने जा रहे हैं। इस साल श्राद्ध पूरे 16 दिन के होंगे। पितृपक्ष 10 सितंबर से प्रारंभ होंगे और 25 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ विसर्जन होगा। पहला श्राद्ध पूर्णिमा से शुरू होता है। इस दिन पहला श्राद्ध कहा जाता है अश्विनी मास में 15 दिन श्राद्ध के लिए माने गए हैं। पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक का समय पितरों को याद करने के लिए मनाया गया है। इन दिनों में सभी अपने पितरों का उनकी निश्चित तिथि पर तर्पण श्राद्ध करते हैं। ऐसा करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देकर प्रस्थान करते हैं। अमावस्या के दिन पितरों को विदा दी जाती है। उत्तराखंड में भी ऐस कई स्थान है जहां पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो कि मोक्ष धाम माने गए हैं। आइए एक नजर ऐसे मोक्ष स्थलों पर-

गंगोत्री धाम
उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध चारधाम में गंगोत्री धाम का अपना अहम स्थान है। गंगोत्री गंगा नदी का उद्गम स्थान है। यह स्थान उत्तरकाशी जिले से 100 किमी की दूरी पर स्थित है। पौराणिक कथा के अनुसार राजा सागर के साठ हजार पुत्रों ने ऋषि कपिल के आश्रम पर धावा बोल दिया। जब कपिल मुनि ने अपनी आँखें खोलीं, तो उनके श्राप से राजा सागर के 60000 पुत्रो की मृत्यु हो गई। पौराणिक मान्यता है कि राजा सागर के पौत्र भागीरथ ने देवी गंगा को प्रसन्न करने के लिए अपने पूर्वजों की राख को साफ करने और उनकी आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए उनका ध्यान किया, उन्हें मोक्ष प्रदान किया। मान्यता है कि इसी स्थान पर मां गंगा पृथ्वी लोक पर उतरी। इसी वजह से इन पवित्र स्थान को गंगोत्री कहा जाता है। गंगा को भागीरथी इसी वजह से भी पुकारा जाता है। गंगोत्री में मौजूद भगीरथ शिला के पास ही ब्रह्म कुंड, सूर्यकुंड, विष्णुकुंड है, जहां पर श्रद्धालु गंगा स्नान के बाद अपने पितरों का पिंडदान किया करते हैं। गंगोत्री में पितर तर्पण, दान का अपना ही महत्व है। बता दें कि किसी भी कार्य में गंगाजल का विशेष महत्व है।

बदरीनाथ धाम में ब्रह्मकपाल तीर्थ
पुराणों में पितृ तर्पण का जो महत्व गया तीर्थ में बताया गया है। वहीं महत्व उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित बदरीनाथ धाम में ब्रह्मकपाल तीर्थ का भी है। मान्यता है कि ब्रह्मकपाल तीर्थ में एक बार पितरों का पिंडदान व तर्पण करने पर पितरों को सीधे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने से लेकर बंद होने तक पिंडदान होते रहते हैं। लेकिन पितृपक्ष में यहां किए जाने वाले पिंडदान को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। मान्यता है कि ब्रह्मकपाल को पितरों की मोक्ष प्राप्ति का सर्वोच्च तीर्थ भी कहा गया है। ब्रह्मकपाल में पिंडदान करने के बाद फिर कहीं पिंडदान की जरूरत नहीं रह जाती है।

केदारनाथ
केदारनाथ में श्राद्ध पक्ष एक विशेष महत्व रखता है। यहां प्रतिवर्ष स्थानीय लोगों के साथ ही देश विदेश से आने यात्री अपने पूर्वजों का पिंडदान कर उन्हें तर्पण देते हैं।यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, क्योंकि यहां मोक्ष की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथा के अनुसार जब पांडवों को गो हत्या का पाप लगा था, तो वह भी केदारनाथ में गो हत्या के पाप से मुक्त होकर यहीं से स्वर्गारोहिणी के लिए थे। जहां उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। तब से अब तक इस क्षेत्र को मोक्ष का द्वार माना है। सरस्वती नदी के पास बना हंसकुंड पर अपने पूर्वजों का पिंडदान कर उन्हें तर्पण देते हैं। इससे उनके पितरों को हमेशा मोक्ष की प्राप्ति हो सके।

भागीरथी और अलकनंदा नदी के संगम स्थल देवप्रयाग
टिहरी जिले में भागीरथी और अलकनंदा नदी के संगम स्थल देवप्रयाग है। श्राद्ध पक्ष में देवप्रयाग में पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है। यहां देश के साथ ही पड़ोसी देश नेपाल से भी लोग तर्पण के लिए पहुंचते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार त्रेतायुग में ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति के लिए भगवान राम ने देवप्रयाग में ही तप किया था। इस दौरान उन्होंने यहां विश्वेश्वर शिवलिंगम की स्थापना की। इसी कारण यहां रघुनाथ मंदिर की स्थापना हुई। यहां श्रीराम के रूप में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। मान्यता है कि भगवान राम ने देवप्रयाग में अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान किया था। यहां गंगा,भागीरथी, को पितृ गंगा भी कहा जाता है।

हरिद्वार मुक्ति का द्वार
हरिद्वार मुक्ति का द्वार है, हरिद्वार में हर की पौड़ी को सावंत घाट नारायणी शिला और कनखल में पिंडदान और अपने पितरों का श्राद्ध करने से पितरों को मुक्ति मिलती है। नारायणी शिला पर श्राद्ध पक्ष के दौरान पितरों का तर्पण और पिंडदान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा पक्ष पर यहां अपने पितरों का पिंडदान करता है वह 100 मातृवंश और 100 पितृवंश का उद्धार करता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार नारायणी शिला में भगवान विष्णु के कंठ से लेकर नाभि तक की शिला स्थित है। गया में भगवान विष्णु के चरण तथा बदरीनाथ में कपाल की प्रतिमा स्थापित है।
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