दो मुख्यमंत्री बदलने वाली भाजपा क्या उत्तराखंड में सरकार बचा पाएगी ?
देहरादून, 02 नवंबर। उत्तराखंड में भाजपा की सरकार है। पिछले छह-सात महीने में दो मुख्यमंत्री बदलने वाली भाजपा क्या सरकार बचा पाएगी ? क्या भाजपा ने गुटबाजी से बचने के लिए बार बार नयी सरकार बनायी ? य़ा फिर एंटी इनकंबेंसी फैक्टर से बचने के लिए ये बदलाव किये ? केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह दो दिन पहले राज्य में चुनावी शंखनाद कर चुके हैं।

भाजपा का मानना है कि मुख्यमंत्री घस्यारी कल्याण योजना गेमचेंजर साबित होगी। 2017 में भाजपा ने 70 में से 57 सीटों लेकर ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। लेकिन अब सरकार के असंतोषजनक प्रदर्शन और आंतरिक गुटबाजी के कारण भाजपा चुनौतियों से घिरी हुई है। उत्तराखंड में फरवरी 2022 में विधानसभा चुनाव कराये जाने की संभावना है। इसलिए चुनावी दंगल अब तेज हो गया है।

चुनाव के मुख्य प्रतिभागी
उत्तराखंड सन 2000 में उत्तर प्रदेश से कट कर नया राज्य बना था। तब से दो बार कांग्रेस और दो बार भाजपा की सरकार बन चुकी है। यानी यहां कांग्रेस और भाजपा के बीच ही मुख्य मुकाबला होता रहा है। अभी तक 11 मुख्यमंत्रियों में केवल नारायणदत्त तिवारी (कांग्रेस) ही पांच साल का कार्यकाल पूरा कर पाये हैं। इसलिए कांग्रेस हो या भाजपा, यहां मुख्यमंत्री बदलना एक राजनीतिक परिपाटी रही है। चूंकि उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहा है इसलिए यहां बहुजन समाजपार्टी का भी कुछ असर है। 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में 7 और 2012 में बसपा के तीन विधायक जीते थे। उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए जिस दल (उत्तराखंड क्रांति दल) ने राजनीतिक लड़ाई लड़ी, वह भी चुनाव मैदान में है। पिछले चुनाव में उसे एक भी सीट नहीं मिल पायी थी। लेकिन उसे 2002 में चार, 2007 में तीन और 2012 में एक सीट मिली थी। 2017 में समाजवादी पार्टी ने भी यहां चुनाव लड़ा था लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पायी थी। आम आदमी पार्टी भी यहां चुनावी किस्मत आजमा रही है। उसने सेना के पूर्व अधिकारी अजय कोठियाल को अपना सीएम उम्मीदवार घोषित भी कर दिया है।

क्या हैं भाजपा के सामने चुनौतियां ?
उत्तराखंड में कोरोना से करीब सात हजार लोगों की मौत हुई है। कोरोना जांच घोटाला का मामला सामने आने से भाजपा सरकार की छवि खराब हुई। कर्मकार बोर्ड विवाद में मंत्री हरक सिंह ने पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत पर सवाल उठा दिया था। बोर्ड के अध्यक्ष शमशेर सिंह सत्याल ने इस मामले की सीबीआइ जांच की मांग कर दी थी। भाजपा नेता जिस तरह से आपस में लड़ने लगे उससे जनता में यह संदेश गया कि ये सरकार काम करने वाली नहीं है। भाजपा सरकार पर कई और सवाल हैं। पुष्कर सिंह धामी ने जुलाई 2021 में तीसरे मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था। उन्हें सत्ता के साथ-साथ कांटों का ताज भी मिला था। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी की गुटबाजी खत्म करने की है। धामी अभी युवा हैं और उनके सामने मुश्किल ये हैं कि वे कैसे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ तालमेल बैठाएं। कुछ दिन पहले ही धामी के कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य और उनके विधायक बेटे ने भाजपा से नाता तोड़ कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया। यशपाल आर्य पहले कांग्रेस में ही थे और 2017 में भाजपाई बने थे। धामी के एक मंत्री हरक सिंह रावत को भी नाखुश बताया जाता है। हालांकि वे अभी भाजपा के साथ बने हुए हैं। हरक सिंह रावत 2016 में भाजपा के सदस्य बने थे।

दलबदलुओं की राजनीति
2017 के विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के 10 विधायक भाजपा में शामिल हुए थे। भाजपा ने इन सभी को टिकट दिया था। जब त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी तो उसमें पांच मंत्री पूर्व कांग्रेसी थे। अब 2022 में कांग्रेस भी इसी तर्ज पर जवाब देना चाहती है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत कांग्रेस के चुनावी अभियान को धार दे रहे हैं। वे कांग्रेस प्रदेश चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष हैं। उनका दावा है कि इस बार हम भाजपा के नेताओं को अपने पाले में करेंगे क्यों कि उनमें सरकार की नाकामी से बहुत निराशा है। रावत का कहना है कि भाजपा सरकार हर मोर्चे पर फेल हो गयी है और जनता कांग्रेस को एक विकल्प के रूप में देख रही है। पहाड़ी राज्य उत्तराखंड की राजनीति, मौसम की तरह बदलती रही है। हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन यहां का ट्रेंड रहा है। इस ट्रेंड को ध्यान में रख कर कांग्रेस इस बार 10 लाख लोगों को पार्टी से जोड़ने के अभियान में लगी है। 2017 में कांग्रेस को करीब 18 सीटों पर बहुत कम वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। इस बार इन चुनाव क्षेत्रों में संगठन को मजबूत कर कांग्रेस अपनी हार को जीत में बदलना चाहती है। पार्टी में गुटबाजी खत्म करने के लिए जिम्मेदारियों का विकेन्द्रीकरण कर दिया गया है। कांग्रेस पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में है। ऐसे में भाजपा के लिए लगातार दूसरी जीत, एक कठिन लक्ष्य है।
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