Silkyara Tunnel Uttarakhand: छोटे से पाइप में घुटनों के बल घुसे प्रवीण, कम ऑक्सीजन में बिताए 3 घंटे
Silkyara Tunnel Uttarakhand Latest Update: उत्तराखंड की सिल्कयारा टनल में फंसे 41 मजदूरों को बचाने के लिए गोरखपुर से प्रवीण कुमार यादव पहुंचे हैं, जो घुटनों के बल चलकर 800 एमएम पाइप के जरिए टनल में गए।
Praveen Kumar Yadav Silkyara Tunnel Uttarakhand: उत्तराखंड की सिल्कयारा टनल में फंसे 41 मजदूर कब तक बाहर निकलेंगे? 13 दिन से उनके लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं? बचाव दलों को किन दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है? खुद की जान तक जोखिम में कैसे डालनी पड़ रही है? इन सारे सवालों के जवाब वन इंडिया हिंदी से बातचीत में उस शख्स ने दिए हैं, जो बीती रात निराशा के घोर अंधेरे में उम्मीद की किरण बनकर टनल में गया। नाम है प्रवीण कुमार यादव।
प्रवीण कुमार यादव उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के रहने वाले हैं। इन्हें सुरंग, खाई व संकड़ी जगहों पर सरिए, स्टील, सीमेंट व कंक्रीट काटकर बंद रास्ता खोलने में महारत हासिल है। 14 साल में प्रवीण कुमार कई बार खरे उतरे हैं। अब उत्तराखंड की सिल्कयारा टनल हादसा 2023 में भी उम्मीद है कि प्रवीण मजदूरों के लिए 'देवदूत' साबित होंगे।

गुरुवार की रात को उत्तराखंड की सिल्कयारा टनल में फंसे मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए बनाए गई एस्केप टनल में क्या कुछ हुआ, सुनिए खुद प्रवीण कुमार यादव की जुबानी।
"दिवाली के दिन ही मैंने टीवी न्यूज में सुना था कि उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में बन रही सिल्कयारा टनल में कुछ मजदूर फंस गए हैं। मैंने भी दुआ की थी कि इन्हें जल्द ही सुरक्षित बाहर निकाल लिया जाए। अभी कुछ दिन पहले मेरी कंपनी ट्रेंचलेस इंजीनियरिंग सर्विस के जरिए मेरे पास कॉल आया कि सिल्कयारा टनल में फंसे मजदूरों को बचाने के लिए जाना है। मैं बिना किसी देरी के लिए मौके पर पहुंचने को रवाना हो गया। मेरे साथ बलविंदर को भी लेकर आया। हम दोनों को टनल में कटिंग मशीन चलाने का अच्छा खासा अनुभव है।

यहां आकर पता चला कि एस्केप टनल तैयार की गई है। उसी के जरिए मजदूरों को बाहर लेकर आना है, मगर यह काम जितना आसान दिख रहा उतना था नहीं। 60 मीटर की एस्केप टनल में से 40-42 मीटर का रास्ता साफ कर लिया गया। कुल 57 मीटर तक करना है, मगर महज 10 मीटर बाद ही मजदूरों तक पहुंच आसान हो जाएगी।
सबसे बड़ी चुनौती ये है कि 42 मीटर के बाद सरिए, सीमेंट और कंक्रीट चट्टान की तरह राह में बाधा बन रही है। इस मुश्किल को भी पार पा लें, मगर यहां पहुंचने का जरिए महज 800 एमएम का पाइप है। उसमें भी जितना अंदर जाओ उतना ही ऑक्सीजन का लेवल कम होता जाता है।
प्रवीण कुमार यादव कहते हैं कि मैंने और बलविंदर ने रात को यह चुनौती स्वीकार की और तमाम सुरक्षा उपाय बरतते हुए कटिंग मशीन साथ लेकर एस्केप टनल में घुसे। जगह कम होने की वजह से घुटनों के बल जाना पड़ा और फिर 40 मीटर के बाद मशीन से कटाई शुरू की तो मशीन की हीट ने रही-सही ऑक्सीजन भी निगल ली। माहौल ऐसा हो गया कि हमारी सांसें फूलने लगीं। वहां ज्यादा देर रुकना मुश्किल हो रहा था।

हमारे साथ में एसडीआरएफ की टीम भी थी। हम सभी लोगों के सामने चुनौती बड़ी थी तो हौसले भी छोटे नहीं थे। हमने हिम्मत नहीं हारी। एस्केप टनल में 3 घंटे तक काम किया। मजदूरों की वापसी के लिए अभी 10 मीटर का रास्ता और साफ करना है। यहां पर स्थिति ऐसी है कि हाईटेक मशीनें बेबस हैं। सिर्फ बुलंद हौसलों के दम ही मजदूरों को बचाया जा सकता है। अभी 800 एमएम के डेढ़ पाइप और पहुंचाने हैं। हम 3 घंटे बाद एस्केप टनल से बाहर आ गए। शेष चट्टानें और गार्डर में आए सरिया व स्टील को काटने दुबारा भी जाएंगे।''

क्या है उत्तराखंड के सिल्कयारा टनल 2023?
बता दें कि उत्तरखंड के उत्तरकाशी जिले में यमनोत्री हाईवे पर सिल्कयारा टनल बन रही है। करोड़ों की लागत वाली इस आधुनिक टनल का निर्माण कार्य साल 2018 में शुरू हुआ था, जिसके पूरा होने का लक्ष्य फरवरी 2024 रखा गया था।
चार किलोमीटर लंबी सिल्कयारा टनल में काम कर रहे 41 मजदूर 12 नवंबर 2023 की सुबह 5 बजे बाहर आ रहे थे ताकि दीपावली पर्व पर अवकाश लेकर अपने घर जा सके।

मजदूर टनल से निकल रहे थे तब 2 किलोमीटर के रास्ते के बाद भूस्खलन हो गया। एक तरफ भूस्खलन होने से मलबा तो दूसरी तरफ टनल का बंद मुहाना। ऐसे में 12 नवंबर से मजदूर अभी भी टनल में फंस हुए हैं।
सिल्कयारा टनल में सारे मजदूर सुरक्षित हैं। उन तक भोजन पहुंचाया जा रहा है। संचार के साधन भी। वे अपनों परिजनों से बात भी कर पा रहे हैं। उन्हें निकालने के लिए विदेशों तक से टनल एक्सपर्ट बुलाए गए हैं, मगर सफलता अभी तक नहीं मिली। उम्मीद है जल्द मिल जाएगी।












Click it and Unblock the Notifications