शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज 11 दिवसीय धर्म संचार यात्रा पर, जानिए क्या रहेगा कार्यक्रम
ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज उत्तराखंड की 11 दिवसीय धर्म संचार यात्रा पर रहेंगे। जिसकी शुरूआत वे 25 अप्रैल को हरिद्वार से करने जा रहे हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज केदारनाथ और बदरीनाथ के कपाट खुलने के मौके पर मौजूद रहेंगे।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज 26 अप्रैल से एक मई तक ज्योर्तिमठ स्थित शंकराचार्य मठ में प्रवास करेंगे। दो मई शंकराचार्य केदारनाथ मंदिर के कपाट उद्घाटन के अवसर पर उपस्थित रहेंगे।

ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज उत्तराखंड की 11 दिवसीय धर्म संचार यात्रा के लिए 25 अप्रैल को धर्म नगरी हरिद्वार पहुंचेंगे। केदारनाथ व बदरीनाथ धाम के कपाट उद्घाटन में भी शामिल होंगे। 26 अप्रैल से एक मई तक ज्योर्तिमठ स्थित शंकराचार्य मठ में प्रवास करेंगे।
ज्योर्तिमठ के प्रभारी दंडी स्वामी मुकुंदा नंद गिरी महाराज ने बताया, दो मई शंकराचार्य केदारनाथ मंदिर के कपाट उद्घाटन के अवसर पर उपस्थित रहेंगे। इसके बाद तीन मई को बदरीनाथ धाम पहुंचेंगे। चार मई में को बदरीनाथ मंदिर के कपाट खुलने के अवसर मौजूद रहेंगे। पांच मई को शंकराचार्य बदरीनाथ धाम से हरिद्वार प्रस्थान करेंगे।
इससे पहले शंकराचार्य शीतकाल यात्रा को बढ़ावा देने चारों धामों के शीतकाल गद्दी स्थल की यात्रा कर चुके हैं। साथ ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज अपने बयानों के लिए भी जाने जाते हैं। केदारनाथ में सोने के घाटाले से लेकर देश के समसामयिकी मुद्दों पर वे अपनी बेबाक राय रखते आ रहे हैं।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म यूपी के प्रतापगढ़ के पट्टी के ब्राह्मणपुर गांव में 15 अगस्त 1969 को हुआ। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का मूल नाम उमाशंकर है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की शुरुआती पढ़ाई लिखाई गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में हुई। बताया गया कि 9 साल की उम्र में ही वह गुजरात जाकर धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य ब्रह्मचारी रामचैतन्य के सानिध्य में गुरुकुल में संस्कृत शिक्षा ग्रहण की।
बताया गया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति में सक्रिय रहे। करपात्री जी के निधन के बाद वह ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के संपर्क में आ गए। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें 15 अप्रैल 2003 को दंड सन्यास की दीक्षा दी गई। इसके बाद उन्हें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती नाम मिला।












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