Raksha bandhan 2023: चंपावत जिले के देवीधुरा स्थित मां वाराही धाम में होगा बगवाल मेला, फूलों से होगा युद्ध
उत्तराखंड के चंपावत में रक्षाबंधन पर एक अनोखी परंपरा निभाई जाएगी, यहां फल फूलों से युद्ध खेला जाएगा। जिसे बगवाल कहा जाता है।
रक्षाबंधन पर्व भाई बहन के पवित्र रिश्ते का त्यौहार है। इस दिन बहन अपने भाई को रक्षा सूत्र बांधकर अपने स्नेह और रिश्ते निभाने का वचन लेती है। लेकिन उत्तराखंड के चंपावत में रक्षाबंधन पर एक अनोखी परंपरा निभाई जाएगी, यहां फल फूलों से युद्ध खेला जाएगा। जिसे बगवाल कहा जाता है।

चंपावत जिले के देवीधुरा स्थित मां वाराही धाम में बग्वाल मेले का आयोजन हो रहा है। रक्षाबंधन पर खास फल और फूलों से बग्वाल खेली जाती है। इस बग्वाल में थोक के योद्धा शिरकत करते हैं। बग्वाल का अर्थ होता है, पत्थरों की बारिश या पत्थर युद्ध का अभ्यास। श्रावणी पूर्णिमा रक्षाबंधन के दिन देवीधुरा वाराही मंदिर में बग्वाल खेली जाती है। इस दौरान आत्मरक्षा के लिए एक विशेष प्रकार की छंतोलियां का इस्तेमाल किया जाता है।
स्थानीय लोग मां वाराही देवी से पूरे क्षेत्र में खुशहाली, फसलों की अच्छी पैदावार हो, क्षेत्र वासी रोग मुक्त हों, निवासियों को अन्न धन की प्राप्ति हो, ऐसी मेरी प्रार्थना करते है। इस मेले को मनाने के लिए चार प्रमुख खाम चम्याल, वालिग, गहड़वाल और लमगड़िया खाम के लोग पूर्णिमा के दिन पूजा अर्चना कर एक दूसरे को बगवाल का निमंत्रण देते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले यहां नरबलि दिए जाने का रिवाज था लेकिन जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के इकलौते पौत्र की बलि की बारी आई तो वंशनाश के डर से उसने मां वाराही की तपस्या की।
देवी मां के प्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों के मुखियाओं ने आपस में युद्ध कर एक मानव बलि के बराबर रक्त बहाकर कर पूजा करने की बात स्वीकार ली। तभी से बगवाल शुरू हुई है। आलों की मतलब परंपरागत रूप से जो अलग-अलग जाति समूह हैं, जिनमें पारस्पर पारिवारिक रिश्ते हैं उनकी आलें-आलें वो आपस में दूसरी आलों के साथ बगवाल खेलते हैं। बीच में एक पत्थर होता है जिसको छूना होता है और बड़ी-बड़ी बांस की छतरियों के सहारे बहादुर लोग आगे बढ़ते हैं और दूसरी आलों के लोग पत्थर बरसाते हैं। अब पत्थर की जगह पर फूल व फल बरसाये जाने लग गए हैं। मगर परंपरा जारी है।












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