क्या है भविष्य बद्री को लेकर भविष्यवाणी ?, जिसका जोशीमठ भू-धंसाव से जोड़ा जा रहा है सीधा कनेक्शन !
जोशीमठ भू धंसाव के बाद से सोशल मीडिया में भी कई तरह की बातें सामने आने लगी है। जिसमें एक भविष्यवाणी की सबसे ज्यादा चर्चा है। जिसमें ये दावा किया गया था कि भगवान बद्रीनाथ भक्तों को भविष्य बद्री में दर्शन देंगे।

हिंदूओं की आस्था का केन्द्र, बदरीनाथ का अहम पड़ाव और पर्यटकों के लिए खास जोशीमठ दरक रहा है। स्थानीय लोग और जानकारों का दावा है कि ये शहर अब अंतिम सांसे गिन रहा है। ऐसे में जोशीमठ और देवभूमि को लेकर शास्त्रों और पुराने जानकारों की दावों को लेकर कई तरह की बातें अब सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है।

दावा- कि भगवान बद्रीनाथ भक्तों को भविष्य बद्री में दर्शन देंगे
जिसमें ये दावा किया गया था कि एक समय बाद कलियुग में भगवान बद्रीनाथ भक्तों को भविष्य बद्री में दर्शन देंगे। यहां एक शिला है जिस पर अभी अस्पष्ट आकृति है, पहाड़ों में इस तरह की चर्चा भी आम है कि भगवान की यह आकृति धीरे-धीरे उभर रही है। जिस दिन यह आकृति पूरी तरह से उभर कर आ जाएगी उस समय से बद्रीनाथ भगवान भविष्य बद्री में ही भक्तों को दर्शन देंगे। जोशीमठ में आ रही दरारें और भू धंसाव को इसी से जोड़ा जा रहा है। हालांकि ये सब बातें वायरल के तौर पर मानी जा रही है जिसका किसी तरह की पुष्टि और प्रमाण नहीं है।

एक भविष्यवाणी की सबसे ज्यादा चर्चा
जोशीमठ भू धंसाव के बाद से सोशल मीडिया में भी कई तरह की बातें सामने आने लगी है। जिसमें एक भविष्यवाणी की सबसे ज्यादा चर्चा है।
जोशीमठ में भगवान बदरी विशाल की शीतकालीन गद्दी और नृसिंह मंदिर है। जो कि हिंदू धर्म आस्था का प्रमुख स्थल है। भगवान नृसिंह की मूर्ति को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं। मान्यता है कि नृसिंह भगवान का एक बाजू सामान्य है जबकि दूसरा बाजू काफी पतला है और यह साल दर साल और पतला होता जा रहा है। मान्यता है कि जिस दिन नृसिंह भगवान का पतला हो रहा हाथ टूट जाएगा उस दिन बद्रीनाथ का मार्ग बंद हो जाएगा। नर नारायण पर्वत एक हो जाएंगे।
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जोशीमठ का प्राचीन इतिहास और पौराणिक कथाएं प्रचलित
भगवान बद्रीनाथ के भक्त भगवान बद्रीनाथ के दर्शन उस मंदिर में नहीं कर पाएंगे जहां पर वर्तमान में भगवान बद्रीनाथ के दर्शन दे रहे हैं। कहते हैं कि इसके बाद से भगवान बद्रीनाथ के दर्शन भक्तों को भविष्य बद्री में होंगे। जोशीमठ का प्राचीन इतिहास और पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। महाभारत के युद्ध में महर्षि वेदव्यास ने ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए पांडवों को इसी तीर्थ स्थल पर पूजा-पाठ करने की सलाह दी थी। धर्मगुरु आदिशंकराचार्य, राजा विक्रमादित्य, राजामिहिर भोज ने भी इस चमत्कारी तीर्थस्थल का जीर्णोद्धार कराया था।

कत्यूरी राजाओं की राजधानी थी, शंकराचार्य ने स्थापित किया था
इतिहासकारों का कहना है कि जोशीमठ कत्यूरी राजाओं की राजधानी थी, जिसका उस समय का नाम कार्तिकेयपुर था। वासुदेव कत्यूरी ही कत्यूरी वंश का संस्थापक था। जिसने 7वीं से 11वीं सदी के बीच कुमाऊं एवं गढ़वाल पर शासन किया। जोशीमठ शब्द ज्योतिर्मठ शब्द का अपभ्रंश रूप है जिसे कभी-कभी ज्योतिषपीठ भी कहते हैं। इसे वर्तमान 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था।

1803 से 1815 के बीच गोरखों के शासनाधीन रहा
गढ़वाल के अन्य भागों की तरह जोशीमठ भी वर्ष 1803 से 1815 के बीच गोरखों के शासनाधीन रहा। वर्ष 1815 में राजा सुदर्शन शाह ने अंग्रेजों की सहायता से गोरखों को पराजित कर दिया, जिन्होंने अलकनंदा एवं मंदाकिनी के पूर्वी भाग श्रीनगर सहित ब्रिटिश गढ़वाल में मिला लिया। प्रारंभ में यहां का प्रशासन देहरादून एवं सहारनपुर से होता रहा। बाद में अंग्रेजों ने पौड़ी नाम से इस क्षेत्र में एक नये जिले की स्थापना की। आज का जोशीमठ एवं चमोली, पौड़ी का तहसील था। 24 फ़रवरी 1960 को चमोली को एक जिला बना दिया गया।












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