Joshimath sinking प्रकरण से उत्तरकाशी के पर्यावरण प्रेमी चर्चा में, भूस्खलन के बाद बदल दी पहाड़ की तस्वीर
उत्तरकाशी के जिस इलाके में भू धंसाव और आपदा आई थी, वहीं पर आज प्रताप सिंह पोखरियाल का श्याम स्मृति वन है। जो कि 40 हेक्टेअर में तैयार किया हुआ है। पोखरियाल ने बताया कि इसमें 4 से 5 लाख पेड़ पौधे हैं।

जोशीमठ में आई दरारें और भू धंसाव की समस्या के बीच एक नई बहस छिड़ गई है। जिसमें पहाड़ों को बचाने और इस तरह की समस्या से बचाव के लिए वृक्षारोपण पर जोर दिया जा रहा है। जिसके लिए उत्तरकाशी का उदाहरण दिया जा रहा है। 2003 में वरुणावत पर्वत से भूस्खलन हुआ, जिसने उत्तरकाशी शहर की पूरी तस्वीर ही बदल दी थी। तब अकेले वरुणावत पर्वत के ट्रीटमेंट पर करीब 70 करोड़ पैसा खर्च किया गया। इसके अलावा विस्थापन और अन्य कार्यों पर करोड़ों रुपए पैसे की तरह बहा दिए गए। लेकिन इस आपदा से सीख लेते हुए उत्तरकाशी के एक पर्यावरण प्रेमी ने दिन रात मेहनत कर सबके सामने मिसाल पेश की, जो कि अब जोशीमठ प्रकरण के सामने आने के बाद फिर से चर्चा में हैं।

श्याम स्मृति वन, 40 हेक्टेअर में तैयार, 4 से 5 लाख पेड़ पौधे
उत्तरकाशी के जिस इलाके में भू धंसाव और आपदा आई थी, वहीं पर आज प्रताप सिंह पोखरियाल का श्याम स्मृति वन है। जो कि 40 हेक्टेअर में तैयार किया हुआ है। पोखरियाल ने बताया कि इसमें 4 से 5 लाख पेड़ पौधे हैं। जिसमें वनस्पतियों से लेकर सभी तरह की जड़ी बूटी और अन्य पौधे रोपे गए हैं। श्याम स्मृति वन अब स्थानीय लोगों के लिए जहां एक दर्शनीय स्थल बन गया है, वहीं छात्रों और पर्यावरण से जुड़े लोगों के लिए एक रिसर्च सेंटर बना हुआ है।

भू-धंसाव वाले हिस्से पर वृहद स्तर पर वृक्षारोपण करके मिसाल कायम की है
बता दें कि तब उत्तरकाशी शहर के विस्थापन की भी मांग उठी थी। लेकिन वरुणावत का ट्रीटमेंट होने के बाद शहर को बचाया जा सका। श्याम स्मृति वन के संस्थापक प्रताप सिंह पोखरियाल एक ऐसे शख्स हैं जिन्होंने वरूणावत पर्वत के भू-धंसाव वाले हिस्से पर वृहद स्तर पर वृक्षारोपण करके मिसाल कायम की है। वहीं इन्होंने अपने निजी प्रयासों से बगैर किसी सरकारी धन की सहायता के जनपद के अन्य हिस्सों में भी 5 हरे-भरे वन और 21 हर्बल गार्डन तैयार किये हैं। प्रताप ने अपने जीवन के तैंतालीस वर्ष प्रकृति संरक्षण के लिए समर्पित किए हैं वे लोगों के लिए प्रेरणादायी बने हुए हैं। वैश्विक महामारी कोविड-19 में अपने वनों से हजारों लीटर गिलोय काढ़े व ग्रीन टी के निशुल्क वितरण के लिए खासे चर्चित रहे हैं। जिसमें शिक्षक शंभू प्रसाद नौटियाल और समाजसेवी सुभाष चंद्र नौटियाल भी उनके साथ जुड़कर इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं।
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पेड़-पौधों भूस्खलन रोकने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण
प्रताप सिंह पोखरियाल कहते हैं कि जोशीमठ में बढ़ते भूस्खलन के पीछे निःसंदेह जलवायु परिवर्तन और बढ़ती मानवजनित गतिविधियां हैं। निर्माण कार्यों के लिए पेड़ों की कटाई से भूस्खलन अभूतपूर्व गति से बढ़ा है, जबकि पेड़-पौधों भूस्खलन रोकने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे बारिश के लिए यांत्रिक अवरोध के रूप में कार्य करते हैं, जल संरक्षण क्षमता में वृद्धि करते हैं और ढीले मलबे के ढेर को थामे रखते हैं। भूस्खलन और जोशीमठ शहर के डूबने के कारणों की जांच के लिए तत्कालीन आयुक्त गढ़वाल मंडल, महेश चंद्र मिश्रा की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया था। 7 मई 1976 की अपनी रिपोर्ट में समिति ने भारी निर्माण कार्य, ढलानों पर कृषि, पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगाने के सुझाव दिए थे।

वृक्षविहीन इलाकों के लिए अग्रगामी योजना बनायी जानी चाहिए
उत्तराखंड में भूस्खलन के प्रबंधन के लिए सभी संबंधित पक्षों के बीच एक समन्वित और बहुआयामी नजरिए की जरूरत के साथ वनों के संरक्षण के लिए प्रभावी प्रयास हेतु वनों की सघनता बढ़ाने के मुक्कमल उपाय किए जाने चाहिए। छोटी व बड़ी वनस्पतियों से नंगे वृक्षविहीन इलाकों के लिए अग्रगामी योजना बनायी जानी चाहिए। प्रताप पोखरियाल ने वरूणावत पर्वत की तलहटी पर श्याम स्मृति वन बनाकर ऐसे लोगों के लिए मिसाल पेश की, जो कि प्रकृति के संदेश को सही समय पर समझने के बजाय आपदा आने के बाद भी नहीं संभलते हैं।












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