जोशीमठ भू-धंसाव: जोशीमठ के हालात की कहानी, एक्सपर्ट्स और जानकारों की जुबानी
जोशीमठ में जो हालात पैदा हुए हैं, वो इस बार नवंबर 2021 से बताए जा रहे हैं। जब जोशीमठ में भू धंसाव के सबसे पहले संकेत मिले। लेकिन जानकारों की मानें तो ये नवंबर 2021 की नहीं ये समस्या 1970 से चली आ रही है।

ऐतिहासिक, धार्मिक और हिमालय का अभिन्न अंग जोशीमठ धंस रहा है। घरों में दरारें आ चुकी है, जमीन धंस रही हैं और शहर अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। जोशीमठ को बचाने के लिए स्थानीय लोग, समाजसेवी, पर्यावरणविद् और कई लोग एकजुट होकर सड़कों पर उतर आए हैं। लेकिन जिस तरह के हालात जोशीमठ में हो गए हैं, क्या ऐसे हालात में अब जोशीमठ का अस्तित्व बचाया जा सकता है। ये बड़ा सवाल है। इतना ही नहीं जोशीमठ के जो हालात आज हुए हैं, इसके लिए कौन-कौन जिम्मेदार है। इन सब सवालो के जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं, उत्तराखंड के एक्सपर्ट्, पर्यावरणविद और जानकारों से।

ये नवंबर 2021 की नहीं ये समस्या 1970 से चली आ रही
जोशीमठ में जो हालात पैदा हुए हैं, वो इस बार नवंबर 2021 से बताए जा रहे हैं। जब जोशीमठ में भू धंसाव के सबसे पहले संकेत मिले। लेकिन जानकारों की मानें तो ये नवंबर 2021 की नहीं ये समस्या 1970 से चली आ रही है। उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत ने बताया कि विख्यात स्विश भूवैज्ञानिक अर्नोल्ड हीम और सहयोगी आगस्टो गैस्टर ने सन् 1936 में मध्य हिमालय की भूगर्वीय संरचना पर जब पहला अभियान चलाया था तो उन्होंने अपने यात्रा वृतान्त ''द थ्रोन ऑफ द गॉड (1938) और शोध ग्रन्थ ''सेन्ट्रल हिमालया: जियॉलॉजिकल आबजर्वेशन्स ऑफ द स्विश एस्पीडिशन 1936 (1939) में टैक्टोनिक दरार, मुख्य केन्द्रीय भ्रंश (एमसीटी) की मौजूदगी को चिन्हित करने के साथ ही चमोली गढ़वाल के हेलंग से लेकर तपोवन तक के क्षेत्र को भूगर्वीय दृष्टि से संवेदनशील बताया था।

जोशीमठ को बचाने के प्रयास नहीं, इमारतों का जंगल उगता गया
जय सिंह रावत का कहना है कि ये ग्रन्थ भूवैज्ञानिकों के लिये बाइबिल से कम नहीं हैं। इन्हीं के आधार पर मध्य हिमालय के भूगर्व पर शोध और अध्ययन आगे बढ़ा। आज भूधंसाव के कारण अस्तित्व के संकट में फंसा जोशीमठ (ज्योतिर्मठ) ठीक तपोवन और हेलंग के बीच ही है। इसके बाद 1976 में मिश्रा कमेटी ने भी अध्ययन कर जोशीमठ को संवेदनशील घोषित कर उपचार के सुझाव दिये। पिछले ही साल उत्तराखण्ड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने भी जोशीमठ पर मंडराते खतरे की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया। इन तमाम चेतावनियों के बाद जोशीमठ को बचाने के प्रयास तो हुये नहीं अलबत्ता वहां भारी भरकम इमारतों का जंगल उगता गया। बढ़ती गयी आबादी का उपयोग किया हुआ पानी जोशीमठ के गर्भ में उतरता गया। आज उसी दलदल पर असह्य बोझ तले दबा जोशीमठ नीचे अलकनन्दा की ओर फिसलता जा रहा है। जय सिंह रावत का कहना है कि जो हालात अभी हैं, उसके लिए सरकार, वहां के लोग और विकास कार्य सभी बराबर की दोषी है। जय सिंह रावत कहते हैं कि जितनी केयरिंग केपेसिटी नहीं थी। उससे ज्यादा वहां लोग बस गए। मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बना दी। अब जोशीमठ ही नहीं चारों धाम खतरे में है।
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शहर से ज्यादा पहले लोगों की चिंता की जानी चाहिए
भू गर्भ वैज्ञानिक एसपी सती भी जोशीमठ में भू-धंसाव की स्थिति पर सर्वे कर चुके हैं। एसपी सती का कहना है कि जो हालात अब सामने हैं, ऐसे में शहर से ज्यादा पहले लोगों की चिंता की जानी चाहिए। जिन्हें अब रेस्क्यू किया जाए। लोगों को उठाकर विस्थापित करना जरूरी है। बड़े पैमाने पर हुए अनियत्रिंत विकास कार्यों से ये हालात हैं। उन्होंने बताया कि जोशीमठ पुराने लैंड स्लाइड पर बसा है। जो धंसाव की तस्वीरें सामने आ रही हैं, उन्होंने पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है। अधिकांश भाग अस्तित्व खतरे में है।

टनल का क्या रोल रहा, इसकी भी जांच होनी चाहिए
एसपी सती ने बताया कि निर्माण कार्य को लेकर 1976 में तत्कालीन कमिश्नर मिश्रा ने तब ही निर्माण कार्यों पर रोक लगाने की बात की थी। लेकिन उनकी रिपोर्ट पर किसी सरकार ने सोचा नहीं। एसपी सती कहते हैं कि अब शहर नहीं लोगों को बचाना प्राथमिकता है। इसके बाद ही वहां चल रही परियोजनाओं का अध्ययन होना चाहिए। जोशीमठ में जो हालात हैं, उसके लिए दूसरी आपदाएं भी अहम कारण हो सकती हैं। इसके साथ ही धौलीगंगा परियोजना पानी के सैंपल लिए जाए। इससे ये पता चलेगा कि जो पानी निकल रहा है, उसमें इस टनल का क्या रोल रहा। इसकी भी जांच होनी चाहिए।

जोशीमठ में पैदा हुए हालात का कारण डिफरेंट फेक्टर
एसडीसी फाउंडेशन के फाउंडर और अध्यक्ष अनूप नौटियाल जोशीमठ में पैदा हुए हालात का कारण डिफरेंट फेक्टर मानते हैं। अनूप का कहना है कि 1976 की मिश्रा रिपोर्ट में कहा गया था कि ये खतरे की जद में है। लेकिन इस पर गंभीरता से नहीं सोच गया। भू- धंसाव के एक कारण नहीं है। इसके लिए सरकार, समाज, व्यापार सभी दोषी है। जो हालात अब पैदा हुए हैं, उसमें ये प्वाइंट जरूरी है कि जब नवंबर में दरारें आ गई थी। तब कठोर कदम क्यों नहीं उठाया। अनूप नौटियाल भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अब इस बात पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है कि नए जोशीमठ कहां कहां पैदा हो रहे है।

जोशीमठ का प्रकरण पुराना, यह तो पहले ही भूमि धंसाव का क्षेत्र है
पद्मश्री, मैती आंदोलन के प्रेणता, वरिष्ठ पर्यावरणविद कल्याण सिंह रावत का कहना है कि जोशीमठ का प्रकरण पुराना है। यह तो पहले ही भूमि धंसाव का क्षेत्र है। ये जमीन पहले भी धंस रही थी। जोशीमठ के सामने जो हाथी पर्वत है। ये एक ही इलाका है। यहां पर ठोस चट्टानें हैं। इस जगह पर हिमालय की मिट्टी इकट्ठा होती रही। जिस पर लोग बसते रहे। कल्याण रावत बताते हैं कि पहले भी जोशीमठ ने अपना ये रूप दिखाया था। हम उस समय जोशीमठ में ही पढ़ते थे। तब भी भू धंसाव हुआ। हमने मिलकर वहां वृक्षारोपण किया। 1976 में तब भी भूस्खलन हुआ।

मानव हस्तक्षेप बढ़ने के कारण ये विकराल समस्या खड़ी हो गई
कल्याण सिंह रावत बताते हैं कि तत्कालीन यूपी सरकार ने मिश्रा रिपोर्ट तैयार की थी। लेकिन कुछ ठोस निर्णय नहीं लिया गया। कल्याण सिंह रावत का कहना है कि हाल ही में 2020 में वे नर सिंह मंदिर गए थे। वहां मंदिर के नए प्लेटफॉर्म पर मुझे दरार दिखी थी। मैंने तब भी कहा, लेकिन किसी ने इस बात पर गंभीरता से नहीं सोचा। अब सबको याद आ रही है मिश्रा रिपोर्ट की। हर साल धंसने की बात सामने आई। जब इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है तो अब अध्ययन करने से कुछ नहीं होगा। ये बहुत संवदेनशील इलाका है। बद्रीनाथ हाईवे कई सड़कें धंसी हुई हैं। हिमालय के नए पहाड़ होने से भी ये समस्या सामने आ रही है। साथ ही इन जगहों पर मानव हस्तक्षेप बढ़ने के कारण ये विकराल समस्या खड़ी हो गई है।












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