जोशीमठ में भू धंसाव को लेकर वैज्ञानिक संस्थानों की 718 पन्नों की रिपोर्ट सार्वजनिक, जानिए क्या की गई सिफारिशें
उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में भू धंसाव को लेकर वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दिया गया है। 8 वैज्ञानिक संस्थानों की यह रिपोर्ट कई महीनों और वैज्ञानिकों की मेहनत के बाद करीब 718 पन्नों में तैयार की है। रिपोर्ट में प्रभावित क्षेत्र की लगातार निगरानी और विस्तृत भूवैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि जोशीमठ क्षेत्र को नो-न्यू कंस्ट्रक्शन जोन घोषित किया जाना चाहिए। पोस्ट डिजास्टर नीड असेसमेंट (पीडीएनए) ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया है। जोशीमठ में भूधंसाव के बाद भवनों की स्थितियों का आकलन करने की जिम्मेदारी केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई) को सौंपी गई थी। सीबीआरआई ने जोशीमठ के नौ प्रशासनिक क्षेत्रों में फैले 2364 भवनों का व्यापक भौतिक क्षति सर्वेक्षण किया। अपनी 324 पन्नों की रिपोर्ट में सीबीआरआई ने 20 प्रतिशत घरों को अनुपयोगी, 42 प्रतिशत के और मूल्यांकन की आवश्यकता, 37 प्रतिशत को उपयोग योग्य और एक प्रतिशत को ध्वस्त करने की आवश्यकता बताई है।
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जोशीमठ नगर पालिका क्षेत्र में कुल नौ वार्ड प्राभावित हैं। इनमें गांधीनगर वार्ड में 156 भवनों में दरारें हैं। इनके अलावा पालिका मारवाड़ी में 53, लोवर बाजार में 38, सिंघधार में 156, मोहनबाग में 131, अपर बाजार में 40, सुनील में 78, परसारी में 55 और रविग्राम वार्ड में 161 भवनों में दरारें हैं। इस तरह से कुल 868 भवनों में दरारें हैं। इनमें से 181 भवन असुरक्षित क्षेत्र में हैं।
सीबीआरआई ने अपनी रिपोर्ट में जोशीमठ में अंधाधुंध निर्माण पर सवाल उठा यहां हिमालय क्षेत्र के पर्वतीय क्षेत्रों में शहरों के विकास के लिए नगर नियोजन के सिद्धांतों की समीक्षा करने की सिफारिश की।
एनडीएमए के नेतृत्व वाली टीम की ओर से तैयार की गई पीडीएनए रिपोर्ट में जोशीमठ में बड़े पैमाने पर भविष्य की पुनर्निर्माण गतिविधियों से पर्यावरण पर संभावित नकारात्मक प्रभाव की ओर इशारा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है यह महत्वपूर्ण है कि भविष्य में किए जाने वाले पुनर्निर्माण ग्रीन बिल्डिंग आधारित, उपयुक्त प्रौद्योगिकी और सीमित कंक्रीट वाले हों।
एजेसियों की जांच के बाद जीएसआई और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी ने एनटीपीसी को अपनी रिपोर्ट में क्लीन चिट दी है। जांच एजेंसियों ने जोशीमठ में हो रहे भू-धंसाव और दरारों के पीछे का कारण भी अपनी रिपोर्ट में बताया है। 718 पन्नों की रिपोर्ट में मोरेन क्षेत्र (ग्लेशियर की ओर से लाई गई मिट्टी) में बसे जोशीमठ की जमीन के भीतर पानी के रिसाव के कारण चट्टानों के खिसकने की बात सामने आई है, जिसके कारण वहां भू-धंसाव हो रहा है।
फिलहाल केंद्र सरकार ने पीडीएनए की रिपोर्ट पर चर्चा के बाद करीब 1800 करोड़ रुपये की सैद्धांतिक स्वीकृति दी है इसमें से 1464 करोड़ रुपये केंद्र सरकार और 336 करोड़ रुपये राज्य सरकार वहन करेगी। फिलहाल जोशीमठ में होने वाले कामों की डीपीआर बनाने का काम किया जा रहा है। केंद्र से पैसा जारी होते ही जमीन पर काम शुरू किया जाएगा।
जोशीमठ में भू धंसाव और दरार की समस्या से बीते 2 जनवरी की रात को सामने आई थी। जिसके बाद कई इलाकों को खाली कराया गया था। सरकार ने एनडीएमए की ओर से जोशीमठ में हो रहे भूधंसाव की हर पहलू से बारीकी से अध्ययन करने के लिए आठ संस्थानों सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीबीआरआई), रुड़की, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (डब्ल्यूआईएचजी), देहरादून, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी), रुड़की, नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनजीआरआई) हैदराबाद, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (एनआईएच), रुड़की, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई), देहरादून, सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी), देहरादून, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग (आईआईआरएस), देहरादून को जिम्मेदारी सौंपी हुई है। इन संस्थानों ने अपनी प्राथमिक रिपोर्ट एनडीएमए को सौंप दी थी।
भाजपा ने जोशीमठ आपदा आधारित भूगर्भीय रिपोर्ट पर संतुष्टि जताते हुए, भरोसा दिलाया है कि रिपोर्ट के आधार पर केंद्रीय निगरानी में शीघ्र वहां आपदा प्रबंधन की योजनाओं को अंतिम रूप दिया जाएगा। साथ ही सुरक्षित एवं समृद्ध जोशीमठ के लिए प्रतिबद्धता दोहराते हुए, बिना किसी तथ्यों के राष्ट्र सुरक्षा से जुड़े परियोजनाओं को इस आपदा के लिए जिम्मेदार ठहराने वाले राजनैतिक पार्टियों के मुंह पर इस रिपोर्ट को तमाचा बताया। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने विभिन्न माध्यमों से मीडिया से हुई बातचीत में कहा, केंद्र एवं राज्य की अलग अलग विशेषज्ञ एजेंसियों की सामूहिक रिपोर्ट का हम सबको इंतजार था भट्ट ने इस वैज्ञानिक रिपोर्ट को उन राजनैतिक दलों के मुंह पर भी तमाचा बताया है जो कल तक आपदा की आड़ में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी परियोजना को बंद करने की मुहिम चला रहे थे।
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