दस हजार फीट की ऊंचाई पर सीढ़ीनुमा रास्ते का पहाड़ी रोमांच सफर करना है तो हो जाइए तैयार
भारत-चीन सीमा पर उत्तरकाशी जिले की जाड़ गंगा घाटी में स्थित गर्तांगली ट्रैक
देहरादून, 19 अगस्त। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में पहाड़ियों पर करीब साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर सीढ़ीनुमा रास्ते को पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है। यह खौफनाक रास्ता लकड़ी के फट्टों का बना है। जो हवा में झूल रहा है। गंगोत्री राष्ट्रीय पार्क अन्तर्गत गर्तांगली के क्षतिग्रस्त ट्रैक मार्ग जिसकी लम्बाई 136 मीटर तथा चौड़ाई औसतन 1.8 मीटर है, लकड़ी से निर्मित सीढ़ीदार ट्रैक का पुर्ननिर्माण किया गया है।
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वीडियो साभार : पंडित सतेन्द्र सेमवाल

एक बार में 10 पर्यटकों को मिलेगी परमिशन
भारत-चीन सीमा पर उत्तरकाशी जिले की जाड़ गंगा घाटी में स्थित गर्तांगली (सीढ़ीनुमा रास्ता) के पुनरुद्धार का कार्य पूरा होने के बाद इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है । उत्तरकाशी के जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने बताया कि एक बार में अधिकतम दस पर्यटकों को ही गर्तांगली जाने के निर्देश गंगोत्री नेशनल पार्क के उपनिदेशक को दिए गए हैं। जिलाधिकारी ने बताया कि भैरवघाटी के पास चेकपोस्ट बनाकर गर्तांगली क्षेत्र में जाने वाले पर्यटकों का पंजीकरण करने के निर्देश भी पार्क प्रशासन को दिए गए हैं। वहीं, गंगोत्री नेशनल पार्क के अधिकारी गर्तांगली की सैर को शुल्क तय करने समेत अन्य पर्यटन सुविधाएं जुटाने में लगे हैं।
भारत-तिब्बत के बीच होता था व्यापार
समुद्रतल से 10500 फीट की ऊंचाई पर एक खड़ी चट्टान को काटकर बनाए गए इस सीढ़ीनुमा मार्ग से गुजरना बहुत ही रोमांचकारी अनुभव है। 140 मीटर लंबा यह सीढ़ीनुमा मार्ग 17वीं सदी में पेशावर से आए पठानों ने चट्टान को काटकर बनाया था। गंगोत्री के तीर्थ पुरोहित पंडित सतेन्द्र सेमवाल ने बताया कि वे अपने परिजनों के साथ इस रोमांच के सफर को तय कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज भी इस रास्ते के बारे में कई बार उत्सुकता के साथ साझा किया करते थे। सत्येंद्र सेमवाल ने बताया कि उन्हें बताया गया कि 1962 से पहले भारत-तिब्बत के बीच व्यापारिक गतिविधियां संचालित होने के कारण नेलांग घाटी दोनों तरफ के व्यापारियों से गुलजार रहती थी। दोरजी (तिब्बती व्यापारी) ऊन, चमड़े से बने वस्त्र व नमक लेकर सुमला, मंडी व नेलांग से गर्तांगली होते हुए उत्तरकाशी पहुंचते थे। भारत-चीन युद्ध के बाद गर्तांगली से व्यापारिक आवाजाही बंद हो गई। हालांकि, सेना की आवाजाही होती रही। भैरव घाटी से नेलांग तक सड़क बनने के बाद 1975 से सेना ने भी इस रास्ते का इस्तेमाल बंद कर दिया। देख-रेख के अभाव में इसकी सीढ़ियां और किनारे लगाई गई लकड़ी की सुरक्षा बाड़ जर्जर होती चली गई। लेकिन अब एक बार फिर इस रास्ते को खोल दिया है।












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