प्रकृति, पर्यावरण और ऋतुओं का सूचक है हरेला पर्व, जानिए क्यों खास है ये त्यौहार
हरेला पर्व 16 जुलाई को मनाया जाएगा, सावन का महीना शुरू
देहरादून, 22 जून। हरेला पर्व राज्य सरकार इस बार धूमधाम से मनाने जा रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी हरेला पर्व पर विशेष तौर पर अधिक से अधिक फलदार पेड़ लगाने के निर्देश विभागीय अधिकारियों को दिए हैं। इस वर्ष हरेला पर्व 16 जुलाई को मनाया जाएगा। हरेला पर्व के साथ ही सावन का महीना शुरू हो जाएगा।

उत्तराखंड का पारंपरिक पर्व है हरेला
हरेला पर्व उत्तराखंड का पारंपरिक पर्व है। मान्यता है कि , हरेला से 9 दिन पहले घर के मंदिर में कई प्रकार का अनाज टोकरी में बोया जाता है और माना जाता है की टोकरी में अगर भरभरा कर अनाज उगा है तो इस बार की फसल अच्छी होगी। हरेला पर्व के दिन मंदिर की टोकरी में बोया गया अनाज काटने से पहले कई पकवान बनाकर देवी देवताओं को भोग लगाया जाता है जिसके बाद पूजा की जाती है। हरेला मानव और पर्यावरण के अंतरसंबंधों का अनूठा पर्व है। हरेला पर्व पर फलदार व कृषि उपयोगी पौधा रोपण की परंपरा है। हरेला केवल अच्छी फसल उत्पादन ही नहीं, बल्कि ऋतुओं के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है।
साल में तीन बार आता है हरेला
हरेला एक हिंदू त्यौहार है जो मूल रूप से उत्तराखण्ड के कुमाऊं में मनाया जाता है । हरेला पर्व वैसे तो वर्ष में तीन बार आता है। पहला चैत्र माह में जब पहले दिन बोया जाता है तथा नवमी को काटा जाता है। दूसरा श्रावण माह में सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में बोया जाता है और दस दिन बाद श्रावण के प्रथम दिन काटा जाता है। तीसरा आश्विन माह में नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरा के दिन काटा जाता है। चैत्र व आश्विन माह में बोया जाने वाला हरेला मौसम के बदलाव के सूचक है। श्रावण माह में मनाये जाने वाला हरेला सामाजिक रूप से अपना विशेष महत्व रखता है। जो कि एक पर्व के रूप में मनाया जाता है। सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूं, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों को बो दिया जाता है। नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह को पानी छिड़कते रहते हैं। दसवें दिन इसे काटा जाता है। 4 से 6 इंच लम्बे इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है। इसे पूजा जाता है और परिवार के सभी सदस्य अपने माथे में लेकर सम्मान करते हैं।
उत्तराखंड में हरेला का खास महत्व
हरेला पर्व पर्यावरण संरक्षण का त्यौहार है। ऋग्वेद में भी हरेला का उल्लेख किया गया है। ऋग्वेद में लिखा गया है कि इस त्यौहार को मनाने से समाज कल्याण की भावना विकसित होती है। हरेला का अर्थ हरियाली से है इस दिन सुख समृद्धि और ऐश्वर्य की कामना की जाती है। बीते कुछ सालों से सरकारें हरेला पर्व को धूमधाम से मना रही है। साथ ही इसका आयोजन बड़े स्तर पर किया जा रहा है। जिससे आने वाली पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति जागरुक किया जा सके। इस दिन राज्य सरकार की ओर से सार्वजनिक अवकाश देकर कार्यक्रमों का बड़े स्तर पर आयोजन किया जाता आ रहा है।












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