Gangotri National Park: ट्रैकिंग और टूरिज्म के शौकीन तो यहां कर सकते हैं एक अप्रैल से दीदार, जन्नत से नहीं कम

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में गंगोत्री नेशनल पार्क के गेट एक अप्रैल को खुलने जा रहे हैं। यहां पर ट्रैकिंग से लेकर पर्यटन की गतिविधियां होती हैं। जो कि शीतकाल में बंद हो जाते हैं और फिर अप्रैल में खोल दिए जाते हैं।

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उत्तराखंड देवभूमि के साथ-साथ पर्यटन का केंद्र भी है। यहां प्रकृति ने दिल खोलकर अपना प्यार लुटाया है। ऐसे ही एक जगह उत्तराखंड के उत्तरकाशी में है गंगोत्री नेशनल पार्क। जिसके गेट एक अप्रैल को खुलने जा रहे हैं। यहां पर ट्रैकिंग से लेकर पर्यटन की गतिविधियां होती हैं। जो कि शीतकाल में 30 नवंबर को बंद हो जाते हैं और फिर अप्रैल में खोल दिए जाते हैं।

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गंगोत्री नेशनल पार्क उत्तरकाशी जिले में है। गंगोत्री हिमालय में 40 से अधिक पर्वत चोटियां हैं। गंगोत्री नेशनल पार्क क्षेत्र में स्थित गोमुख तपोवन ट्रैक, केदारताल, सुंदरवन, नंदनवन, वासुकीताल, जनकताल ट्रैक के साथ गरतांग गली पर्यटकों का केंद्र है। जहां सबसे ज्यादा लोग घूमने और ट्रैक पर जाना पसंद करते हैं।

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गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान एक राष्ट्रीय उद्यान है। पार्क क्षेत्र 2,390 वर्ग किमी क्षेत्रफल पर फैला है। गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना सन् 1989 में की गई। जिसकी शुरूआत गोमुख से होती है। गोमुख गंगा का उद्गम स्थल है। गंगोत्री नेशनल पार्क पहुंचने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन और हवाई यात्रा का स्टेशन देहरादून है। जो कि उत्तरकाशी मुख्यालय से 200 से 250 किमी के बीच है।

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यहां से हर्षिल बस या कार से 30 किमी है। उद्यान की पूर्वोत्तर सीमा तिब्बत के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगी हुयी है। बर्फ से ढकी पहाड़ और हिमनद इस उद्यान के विस्तृत भाग में फैले हुये हैं। उद्यान क्षेत्र गोविंद राष्ट्रीय उद्यान और केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य के बीच है।

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इस पार्क के उद्यान पशुओं की 15 प्रजातियां और पक्षियों की 150 प्रजातियों का घर है। इस क्षेत्र में पर्यटकों के लिए हिम तेंदुए, भूरे भालू, कस्तूरी मृग, ताहर, बाघ तथा हिमालय क्षेत्र में पाये जाने वाले कई पक्षी भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं।

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पार्क की सीमा हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले, टिहरी जिले के खतलिंग ग्लेशियर, चमोली जिले के घस्तौली-माणा क्षेत्र और भारत-चीन सीमा से लगी हुई है। इसके अलावा पार्क में बुग्याल, देवदार के जंगल, ग्लेशियर, ट्रांस हिमालय, ऊंची चोटियां व पहाडिय़ों के अलावा भागीरथी, केदारगंगा, जाड़ गंगा सहित कई छोटी नदियां भी हैं।

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कुछ हिस्सा ऐसा है, जहां मानवीय दखल पूरी तरह शून्य है। यही कारण है कि यह क्षेत्र हिम तेंदुआ की ब्रीडिंग के लिए सुरक्षित है। हिमालयी बकरी यानी भरल (ब्यू शिप) हिम तेंदुआ का मुख्य भोजन है। इनकी संख्या पार्क में बहुत अच्छी है। पार्क में आसानी से भरल के बड़े झुंड दिख जाते हैं।

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    भारत-तिब्बत व्यापार की गवाह रही नेलांग घाटी में स्थित ऐतिहासिक गरतांग गली की सीढ़ियों का दीदार भी इसी क्षेत्र में मिलेगा। गरतांग गली में लगभग 150 मीटर लंबी सीढ़ियां हैं। 11 हजार फीट की ऊंचाई पर बनी गरतांग गली की सीढ़ियां इंजीनियरिंग का नायाब नमूना हैं। 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद इस लकड़ी के सीढ़ीनुमा पुल को बंद कर दिया गया था। अब करीब 59 सालों बाद वह दोबारा पर्यटकों के लिए खोला गया है।

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