धू-धू कर जल रहे पहाड़ के जंगल,5 माह में वनाग्नि की घटनाओं के आंकड़े देखकर चौंक जाएंगे
उत्तराखंड में गर्मी की शुरूआत में ही वनाग्नि की घटनाओं से परेशानी बढ़ गई है। हालात ये हैं पहाड़ों में आग की घटनाओं से लोगों की मुश्किलें बढ़ती जा रही है। इससे आने वाले दिनों में फिर से गर्मी का असर तो नजर आएगा ही वन संपदा को भारी नुकसान होगा।

15 फरवरी से 15 जून तक का फायर सीजन प्रदेश के जंगलों के लिए बेहद संवेदनशील होता है। शीतकाल में यदि अच्छी वर्षा और बर्फबारी हो जाए, तो जंगलों में आग लगने की अवधि पीछे खिसक जाती है। मगर इस वर्ष अन्य वर्षों की अपेक्षा बर्फबारी की बेरुखी के परिणाम गर्मी के मौसम के शुरुआत में ही नजर आने लगे हैं। अप्रैल मेंं ही आग की घटनाएं आए दिन सामने आ रही हैं।
बीते सोमवार को इस सीजन की सबसे ज्यादा आग लगने की घटनाएं रिकॉर्ड की गई हैं। प्रदेश में पिछले 24 घंटे के भीतर 52 जगह पर आग लगी। इसमें 14 घटनाएं गढ़वाल मंडल में हुई तो वहीं 35 घटनाएं कुमाऊं मंडल के जंगलों के रिकॉर्ड हुई। 24 घंटे के दौरान कुल 76.65 हेक्टेयर जंगल आग से प्रभावित हुए। जिसमें 1 लाख 65 हजार 300 रुपए की आर्थिक क्षति रिकॉर्ड की गई है।
प्रदेश में 1 नवंबर से अब तक आग लगने की कुल 431 घटनाएं रिकॉर्ड की जा चुकी हैं। इसमें गढ़वाल मंडल वाले वन क्षेत्र में 177 घटनाएं हुई हैं। कुमाऊं मंडल के जंगलों में 215 घटनाएं रिकॉर्ड की गई हैं। वन्य जीव संरक्षित वन क्षेत्र में 39 जगह पर आग लगने की शिकायतें मिली हैं।
इस तरह करीब 5 महीने से ज्यादा समय में राज्य के 516.92 हेक्टेयर जंगल आग से प्रभावित हुए, जिसमें अब तक राज्य को 11 लाख 13 हजार 451 रुपए का नुकसान होने का आंकलन किया गया है। हालांकि इन घटनाओं में किसी तरह की पशु या मानव क्षति नहीं हुई है। वन विभाग का दावा है कि वे जल्द ही घटनाओं पर कमी लांएगे। इस बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी वन विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक कर आग की घटनाओं पर लगाम लगाने को लेकर सख्ती बरत चुके हैं।
पहाड़ी जिलों खासकर उत्तरकाशी व नैनीताल के जंगलों में आग लगने की घटनाओं मैं तेजी से बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है। जिससे वन संपदा को भी भारी नुकसान हो रहा है। वनाग्नि के कारण चारों तरफ धुआं छाया हुआ है। इससे हवा में पीएम 2.5 के स्तर में कई गुना बढ़ोत्तरी हो गई है। जो कि स्वास्थ्य की परेशानी को भी बढ़ाने लगा है।












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