उत्तरकाशी त्रासदी: 60 फीट मलबे के नीचे अभी भी दबे हैं लोग, धराली कैसे बना ‘कट ऑफ’ गांव?

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जनपद के धराली गांव में आई कुदरती आपदा ने कई लोगों की जान ले ली है। लेकिन यह सिर्फ पहाड़ों का कहर नहीं था, बल्कि हमारे सिस्टम की बरसों पुरानी लापरवाही और तैयारी की कमी का जीता-जागता उदाहरण भी है।

सवाल यह नहीं है कि धराली गांव में दबे लोगों की तलाश गुरुवार तक भी क्यों शुरू नहीं हो पाई, असल सवाल यह है कि धराली जैसी संवेदनशील जगह पर रेस्क्यू की नौबत इतनी "असहाय" क्यों है?

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टूटी सड़कें और ठप मशीनें

उत्तरकाशी से करीब 100 किलोमीटर दूर गंगोत्री जाने के लिए एक ही सड़क मार्ग है, जो धराली से होकर गुजरता है। यह सड़क मार्ग हर्षिल से धराली के बीच करीब 3 किलोमीटर में चार जगहों पर पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका है। भटवाड़ी से हर्षिल तक तीन बड़े भूस्खलन हुए हैं, और गंगनानी से आगे नाग मंदिर के पास 30 मीटर लंबा एक पुल टूट चुका है।

मलबा हटाने और उसके नीचे दबे लोगों की तलाश के लिए हाईटेक थर्मल सेंसिंग उपकरण और बड़ी मशीनों की ज़रूरत है, लेकिन ये संसाधन 60 किलोमीटर दूर भटवाड़ी में फंसे हुए हैं क्योंकि सड़क मार्ग पूरी तरह बंद है। गुरुवार को एक जनरेटर देहरादून से चिनूक हेलीकॉप्टर के ज़रिए हर्षिल पहुंचाया जा सका, लेकिन धराली तक पहुंच अब भी मुश्किल बनी हुई है।

72 घंटे बाद भी राहत का इंतज़ार

करीब 72 घंटे बीत जाने के बाद भी मलबे में दबे सभी लोगों को बाहर नहीं निकाला जा सका है। 5 अगस्त 2025 को दोपहर बाद आई इस आपदा में धराली गांव में 20 से 60 फीट ऊंचा मलबा भर गया था, जो करीब 80 एकड़ क्षेत्र में फैला है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तीन दिन बीत जाने के बावजूद रेस्क्यू अभियान पूरी तरह से शुरू नहीं हो पाया है।

धराली एक 'हाई रिस्क ज़ोन'

समुद्र तल से करीब 9,000 फीट की ऊंचाई पर बसा धराली गांव भौगोलिक रूप से बेहद संवेदनशील है। यहां लैंडस्लाइड, ग्लेशियर गतिविधियों और मौसमीय चरम घटनाओं की आशंका पहले से ही बनी रहती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस गांव की निगरानी हो रही थी? क्या मौसम अलर्ट काम कर रहा था? क्या ग्लेशियर मूवमेंट ट्रैक हो रहा था? जवाब है-नहीं। सरकार के पास सैटेलाइट और मौसम विज्ञान संस्थान तो हैं, लेकिन धराली जैसी जगहों पर स्थानीय स्तर पर अलर्ट सिस्टम अभी भी सिर्फ एक सपना ही है।

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यह बादल फटना नहीं, शायद ग्लेशियर ब्लास्ट था: वैज्ञानिकों का विश्लेषण

वनइंडिया हिंदी की उत्तराखंड टीम से बातचीत में वरिष्ठ ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉ डीपी डोभाल का बयान चौंकाने वाला है। उनके मुताबिक, धराली में जिस दिन आपदा आई, उस दिन आईएमडी के रिकॉर्ड के अनुसार 100 मिमी से अधिक बारिश नहीं हुई। ऐसे में, यह कहना कि यह बादल फटने की वजह से हुआ-गलत हो सकता है।

डॉ डोभाल का कहना है कि धराली के पास मौजूद दो हैंगिंग ग्लेशियर और संकरी घाटी की भौगोलिक बनावट को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि ग्लेशियर ब्लॉक और एवलांच की वजह से पानी रुका और फिर एक झटके में नीचे गिरा। अब सवाल है कि क्या उत्तराखंड के पास ऐसे संभावित 'ग्लेशियर ब्लास्ट ज़ोन' की कोई सूची है? क्या ऐसी संवेदनशील जगहों पर कोई प्री-इवेंट ट्रैकिंग हो रही है?

BRO का बयान: रास्ता बहाल करने में लगेंगे कई दिन

बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (BRO) के अनुसार धराली तक पहुंचने का एक ही रास्ता है, जिसे पूरी तरह बहाल करने में कम से कम 3-4 दिन और लग सकते हैं। प्रशासनिक नजरिए से यह एक सामान्य वक्तव्य लग सकता है, लेकिन धराली के लिए ये चार दिन ज़िंदगी और मौत के बीच की दूरी हैं।

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उधर, गांव धराली में हाईटेक मशीनों का इंतजार कर रही भारतीय सेना की 2 इंजीनियर रेजिमेंट के कैप्टन गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि हादसे के महज 15 से 20 मिनट बाद ही सेना के जवान बचाव व राहत कार्यों के लिए गांव धराली पहुंच गए थे। सभी जवान तकनीकी विशेषज्ञ हैं, मगर इन्हें भी अत्याधुनिक मशीनों की दरकार है। अभी मौजूदा संसाधनों से ही काम चलाया जा रहा है।

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