भारत जोड़ो यात्रा के बाद उत्तराखंड के पूर्व सीएम हरीश रावत लेंगे बड़ा फैसला, कांग्रेस संगठन को लेकर उठाए सवाल

उत्तराखंड के पूर्व सीएम हरीश रावत ने प्रदेश कांग्रेस से बनाई दूरी

देहरादून, 4 अक्टूबर। उत्तराखंड के पूर्व सीएम और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने एक बार फिर बड़ा कदम उठाने के संकेत दिए हैं। हमेशा से दिल्ली से लेकर देहरादून की सियासत में सक्रिय रहने वाले हरीश रावत ने राजनीति से अलग होने के संकेत दिए हैं। हालांकि उन्होंने सोशल मीडिया में अपने मन की बात रखते हुए कुछ बातें स्पष्ट की तो कई सवालों के जबाव नहीं दिए। जिससे आने वाले दिनों में ये साफ हो पाएगा कि हरीश रावत प्रदेश से ज्यादा दिल्ली की राजनीति में सक्रिय नजर आ सकते हैं।

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हरीश रावत ने प्रदेश की सियासत से कुछ समय के लिए विश्राम लेने की बात की

उत्तराखंड की सियासत के सबसे पुराने दिग्गज और कांग्रेस के बड़े नेता हरीश रावत ने एक बार फिर उत्तराखंड की राजनीति से दूर दिल्ली जाने का ऐलान किया है। हरीश रावत के नेतृत्व में ही कांग्रेस ने विधानसभा 2022 का चुनाव लड़ा लेकिन पार्टी 18 सीटों पर सिमट कर रह गई। इसके बाद से ही कांग्रेस के अंदर हरीश रावत की राजनीति को लेकर कई तरह के सवाल खड़े होते रहे। पार्टी में एक धड़ा लंबे समय से हरीश रावत का विरोध करता आ रहा है। अब हरीश रावत ने प्रदेश की सियासत से कुछ समय के लिए विश्राम लेने की बात की है। हरीश रावत ने फेसबुक के जरिए कहा है कि भारत जोड़ो यात्रा की समाप्ति के 1 माह बाद स्थानीय और राष्ट्रीय परिस्थितियों का विहंगम विवेचन कर कर्म क्षेत्र व कार्यप्रणाली का निर्धारण करूंगा। थोड़ा विश्राम अच्छा है। हरिद्वार के प्रति मेरा कृतज्ञ मन अपने सामाजिक, सांस्कृतिक व वैयक्तिक संबंधों व निष्ठा को बनाए रखने की अनुमति देता है। मैं अपने घर गांव व कांग्रेसजनों को हमेशा उपलब्ध रहूंगा। पार्टी की सेवा के लिए मैं दिल्ली में एक छोटे से उत्तराखंडी बाहुल्य क्षेत्र में भी अपनी सेवाएं दूंगा। पार्टी जब पुकारेगी मैं उत्तराखंड में भी सेवाएं देने के लिए उत्सुक बना रहूंगा।

हरीश रावत ने राजनीति के सफर को भी पूरे विस्तार से सामने रखा

हरीश रावत ने उत्तराखंड में अपनी राजनीति के सफर को भी पूरे विस्तार से सामने रखा है कि हरीश रावत ने कहा कि एक स्पष्ट कार्यक्रम आधारित सोच का परिणाम था कि जब हमने भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन व सचिवालय पर कार्य प्रारंभ किया और विधानसभा सत्र वहां आयोजित किए। पहाड़ मैदान की बातें, आर्थिक व संस्कृतिक आधार पर विकसित सामाजिक सोच के आगे मिट गई। सभी सामाजिक क्षेत्रीय समूहों को गैरसैंण में अपना भविष्य दिखाई देने लगा। चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी से बड़ा दल-बदल भी भाजपा को सत्ता में नहीं ला सकता था, यदि भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद़ मोदी के व्यक्तित्व को पुलवामा एवं बालाकोट से उत्पन्न प्रचंड आंधी और उत्तर प्रदेश में समाज को हिंदू व मुसलमान के रूप में बटने का लाभ नहीं मिला होता।

उत्तराखंड कांग्रेस अभी नहीं लगता अपने को बदलेगी

हरीश रावत का कहना है कि मैं पार्टी को इस अस्त्र के साथ खड़ा नहीं कर पाया। यह मेरी विफलता थी। उत्तराखंडियत को लेकर पार्टी से एकजुटता के बजाए अन्यथा संदेश गया। अंततः जीतते.जीतते कांग्रेस हार गई। उत्तराखंड कांग्रेस अभी नहीं लगता अपने को बदलेगी। व्यक्ति को अपने को बदलना चाहिए। मैं इस निष्कर्ष पूर्ण सोच को आगे बढ़ाने के लिए आशीर्वाद मांगने भगवान बद्रीनाथ के पास गया था। भगवान के दरबार में मेरे मन ने मुझसे स्पष्ट कहा है कि हरीश आप उत्तराखंड के प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर चुके हो। उत्तराखंडियत के एजेंडे को अपनाने व न अपनाने के प्रश्न को उत्तराखंड वासियों व कांग्रेस पार्टी पर छोड़ो। हरीश रावत के इस पोस्ट से साफ है कि वे कांग्रेस के संगठन के कामकाज से खुश नहीं है। ऐसे में वे दिल्ली में रहकर ही पार्टी गतिविधियों को कुछ समय के लिए हिस्सा लेंगे।

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