Badrinath dham: अमरनाथ नम्बूद्री होंगे नए रावल,कौन, कहां से और कैसे बनते हैं बदरीनाथ धाम के मुख्य पुजारी
बद्रीनाथ धाम में 14 जुलाई को मुख्य पुजारी या रावल ईश्वर प्रसाद नम्बूद्री विदा हो रहे हैं। उनकी जगह अमरनाथ नम्बूद्री बद्रीनाथ धाम के नए रावल होंगे।
बदरीनाथ धाम के रावल और नायक रावल का चयन दक्षिण भारत में ही नम्बूद्री परिवार में किया जाता है। बद्रीनाथ के रावल केरल के नंबूदरी ब्राह्मण होते हैं।

बताया जाता है कि शंकराचार्य भी एक नंबूदरी ब्राह्मण थे। बद्रीनाथ और केदारनाथ को फिर से स्थापित करने के बाद उन्होंने यह परंपरा शुरू की। बद्रीनाथ में केरल के नंबूरी या नंबूदरी ब्राह्मण होते हैं।
बद्रीनाथ भगवान की पूजा रावल को ही करनी होती है। केवल उन्हीं के पास होता भगवान बद्रीनाथ को छूने का अधिकार होता है। इसमें उनके सहयोग के लिए नायब रावल होते हैं। बद्रीनाथ धाम के जब कपाट खुलते हैं, तब रावल साड़ी पहन, माता पार्वती का शृंगार कर गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। उन्हें मां का ही एक स्वरूप मानते हैं। हालांकि उनके उस रूप के दर्शन हर कोई नहीं कर सकता।
रावल की रिटायरमेंट की कोई उम्र नहीं होती। वह चाहें तो जीवनभर इस दायित्व को निभा सकते हैं। किसी नंबूदरी ब्राह्मण के रावल बनने के लिए सबसे ज़रूरी है उनका ब्रह्मचारी होना। वह पारिवारिक हो सकते हैं यानी माता-पिता से संबंध रख सकते हैं, लेकिन गृहस्थ नहीं होने चााहिए।
किसी को रावल बनाने से पहले नायब रावल बनाया जाता है, ताकि वह परंपराओं को सीख सके। नायब का चयन करने के लिए बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति की ओर से एक कमेटी गठित की जाती है। इसमें रावल भी होते हैं।
बद्रीनाथ धाम के पूर्व धर्म अधिकारी भुवन चंद्र उनियाल बताते हैं कि बद्रीनाथ धाम में नए रावल बनने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। नये रावल बनने के लिए योग्य व्यक्ति का मुंडन संस्कार तिलपात्र किया जाता है। साथ ही पंचतीर्थ का भ्रमण कराया जाता है।
बद्रीनाथ धाम में तप्तकुंड, अलकनंदा नदी, नारद कुंड, प्रहलाद धारा, कुर्म धारा, ऋषि गंगा में नए रावल को स्नान कराया जाता है। बद्रीनाथ धाम में इससे पहले विष्णु नम्बूद्री, बदरी प्रसाद नम्बूद्री का तिलपात्र हुआ है। बाकी सभी रावल का तिलपात्र जोशीमठ के नृसिंह मंदिर में संपन्न कराया गया है।
बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी को रावल कहा जाता है, जो दक्षिण भारतीय राज्यों से आते हैं। रावल को शंकराचार्य के कुल का वंशज कहा जाता है। शंकराचार्य ने ही दक्षिण भारतीय पुजारियों को हिमालय के मंदिर में नियुक्त करने की परंपरा की शुरुआत की थी। जो आज भी चली आ रही है।
रावलों की अनुपस्थिति में सरोला ब्राह्मण मंदिर में दिशानिर्देश के अनुसार, पूजा-अर्चना करवाते हैं। सरोला ब्राह्मण रावलों के सहयोगी माने जाते हैं। सरोला ब्राह्मण स्थानीय डिमरी समुदाय के होते हैं। कहा जाता है कि डिमरी भी मूलत: दक्षिण भारतीय ही हैं, जो शंकराचार्य के साथ ही सहायकों के तौर पर आए थे और कर्णप्रयाग के पास स्थित डिम्मर गांव में बस गए। जिसके बाद उन्हें डिमरी समुदाय के नाम से जाना जाने लगा। बदरीनाथ धाम में भोग बनाने का अधिकार डिमरी ब्राह्मणों को ही दिया गया है।
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