यूपी चुनाव 2022 से पहले नाराज ब्राह्मणों को क्या मना पाएगी भाजपा? जानें क्यों अहम बना ये समुदाय
यूपी चुनाव 2022 से पहले नाराज ब्राह्मणों को क्या मना पाएगी भाजपा? जानें क्यों सभी दलों के लिए अहम बना ये समुदाय
लखनऊ, 27 दिसंबर। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 का दंगल शुरू हो चुका है। प्रदेश में भाजपा की दोबारा पूर्ण बहुमत की सरकार बने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक जोर अजमाइश कर रहे हैं। वहीं भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से लेकर सभी नेता चुनाव सक्रिय नजर आ रहे हैं। भाजपा नेता जनता से जनसंपर्क साधकर योगी सरकार के राज में हुए विकास कार्यों और आम जनता से जुड़ी योजनाओं का बखान कर रहे हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है कि योगी सरकार के प्रति ब्राह्मण समाज की नाराजगी को दूर करना है। आइए जानते हैं कि क्या ब्राह्मण वोटर जो भाजपा के कोर वोटर माने जाते हैं उनको चुनाव से पहले मना पाएगी? जानें क्यों सभी दलों के लिए ब्राह्मण समुदाय चुनाव के समय क्यों इतना महत्वपूर्ण हो गया है।

क्यों सभी दलों के लिए अहम बना है ब्राह्मण समुदाय
यूपी में ब्राह्मण वोटरों की ताकत भले ही 8 से 10 फीसदी ही है लेकिन प्रदेश में वर्ष 1989 के बाद से जिस भी पार्टी ने ब्राहृमण कार्ड चला उसने सत्ता हासिल की। इसके पीछे खास वजह है कि भले ही वोटरों की संख्या कम हैं लेकिन ब्राह्मण समाज का प्रभाव यूपी में सर्वाधिक है। यहीं कारण है कि यूपी के ब्राह्मणों में चुनावी बयार बदलने की ताकत है।

2007 के चुनाव है ब्राह्मण वोटर की ताकत का सबसे बड़ा उदाहरण
2007 विधानसभा चुनाव इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है। जब राज्य में ब्राह्मण शंख बजाएगा और हाथी बढ़ता जाएगा के नारे के साथ बसपा ने सत्ता हासिल की थी, सत्ता ही हासिल ही नहीं की थी बल्कि सालों बाद किसी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी। उस समय मायावती ने सतीश मिश्रा के जरिए ब्राह्मण कार्ड खेला था। बसपा इस बार भी भाजपा से नाराज ब्राह्मणों को अपने पक्ष में लाने के लिए उन्हें लुभाने में जुटी हुई है। वहीं सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव ब्राह्मणों को अपने पक्ष में करने के लिए प्रबुद्ध सम्मेलन करवा रहे हैं।

राजनीतिक हवा बदलने की रखते हैं ताकत
यूपी में ब्राह्मण वोटर को रिझाने में इसीलिए भाजपा, सपा, बसपा इसलिए जुटी हुई है कि क्योंकि जिस पाले में जाकर ब्राह्मण वोटर खड़े हो जाते हैं उस पार्टी का पड़ला भारी हो जाता है और उस पार्टी का चुनाव में लाभ होता है। यूपी के पूर्वांचल समेत वाराणसी, इलाहाबाद और कानपुर समेत ऐसे 12 जिले हैं जहां ब्राहमण वोटरों का प्रतिशत लगभग 15 फीसदी है। ये वोटर जिस पार्टी के सपोर्ट में खड़े होते हैं, उस पार्टी की चुनाव में बल्ले-बल्ले हो जाती है क्योंकि कम संख्या होने के बावजूद ब्राह्मण समाज राज्य में प्रभुत्वशाली होने के साथ-साथ राजनीतिक हवा बनाने की ताकत रखते हैं।

राजनीतिक हवा बदलने की रखते हैं ताकत
यूपी में ब्राह्मण वोटर को रिझाने में इसीलिए भाजपा, सपा, बसपा इसलिए जुटी हुई है कि क्योंकि जिस पाले में जाकर ब्राह्मण वोटर खड़े हो जाते हैं उस पार्टी का पड़ला भारी हो जाता है और उस पार्टी का चुनाव में लाभ होता है। यूपी के पूर्वांचल समेत वाराणसी, इलाहाबाद और कानपुर समेत ऐसे 12 जिले हैं जहां ब्राहमण वोटरों का प्रतिशत लगभग 15 फीसदी है। ये वोटर जिस पार्टी के सपोर्ट में खड़े होते हैं, उस पार्टी की चुनाव में बल्ले-बल्ले हो जाती है क्योंकि कम संख्या होने के बावजूद ब्राह्मण समाज राज्य में प्रभुत्वशाली होने के साथ-साथ राजनीतिक हवा बनाने की ताकत रखते हैं।

पिछले चुनावों में ब्राह्मणों वोटरों निभाई है अहम भूमिका
प्रदेश में 1989 के बाद यूपी को आठ ब्राह्मण सीएम दिए,वहीं पिछले तीन दशक से प्रदेश की सत्ता तो किसी ब्राह्मण मुख्यमंत्री के हाथ में नहीं आई लेकिन जो भी कुर्सी पर बैठा उन्हें सीएम सीट तक पहुंचाने में यूपी की लगभग 60 सीटों के ब्राह्मण वोटर की अहम भूमिका रही। यहीं कारण है कि वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से नाराज ब्राह्मणों को मानने में भाजपा जुट चुकी है।

भाजपा ने ब्राह्मण वोटरों की नाराजगी दूर करने के लिए बनाया है ये प्लान
ब्राहृमण वोटरों की नाराजगी को दूर करने के लिए रविवार को केंद्रीय मंत्री और उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी धमेंद्र प्रधान ने ब्राह्मण नेताओं के साथ मीटिंग की। वहीं एक दिन सोमवार यानी आज पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने प्रदेश के ब्राह्मण नेताओं के साथ बैठक कर ये समझा कि कैसे ब्राह्मण वोटरों की नाराजग दूर की जाए। इसके लिए पांच ब्राह्मण नेताओं की एक कोर कमेटी भी बनाई है।

ब्राहृाण नेताओं को दी गई है ये जिम्मेदारी
पार्टी सूत्रों के अनुसार मीटिंग में निर्णय लिया गया कि भाजपा के सभी ब्राह्मण नेता अपने-अपने क्षेत्र में जाकर भाजपा सरकार द्वारा किए गए कार्यों के बारे में बताएंगे। जिसमें राम मंदिर, काशी कॉरडोर, मथुरा बाके बिहारी मंदिर, मिर्जापुर विंध्यवासिनी मंदिर, गंगा एकसप्रेस सर्किट समेत अनेक धार्मिक स्थलों से संबंधित कार्यों का बखान करेंगे। साथ ही लव जिहाद और सवर्णो को आरक्षण समेत अन्य मुद्दों से रूबरू करवाना है और उन्हें ये समझाना है कि ब्राह्मणों के हितों की रक्षा के लिए प्रदेश सरकार क्या कर रही है और क्या करने वाली है।

वोटरों को अपने पक्ष में लाने के लिए भाजपा की रणनीति
इसके साथ ही योगी सरकार जिनकी छवि ठाकुरवादी और ब्राह्मण विरोधी बनी हुई है उनके पक्ष में ब्राह्माणों को लाने के लिए उन्हें समझाना है कि भाजपा ने सदा से ब्राह्मण समुदाय को महत्व दिया है। जैसे 2017 में बीजेपी के 312 विधायकों में 58 ब्राह्मण चुनकर आए थे 56 मंत्रियों में योगी सरकार में उपमुख्यमंत्री सीएम दिनेश शर्मा को बनाया गया, इसके अलावा जितिन प्रसाद, श्रीकांत शर्मा समेत अन्य ब्राह्मण नेताओं को महत्व दिया गया। इसके साथ ही केंद्र में तमाम ब्राह्मण नेताओं को कैबिनेट में स्थान दिया गया।

क्या नाराजगी दूर कर पाएगी भाजपा
राजनीति के जानकारों का मानना है कि भाजपा के कोर ब्राह्मण वोटर नाराज होने के बावजूद कमल को ही चुनेंगे क्योंकि इनमें से अधिकांश वोटर अन्य राजनीतिक पार्टियों की विचारधारा से सहमत नहीं ह्रे तो कई ऐसे हैं कि उनके पास चुनने के लिए बेहतर विकल्प कम हैं। हालांकि कई सीटों पर पार्टी नहीं उम्मीदवार वोटर्स के लिए अहम होता है ऐसे में इस समुदाय के वोट इस आधार पर भी बंट सकते हैं कि उम्मीदवार कौन है ना कि पार्टी।












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