क्यों यूपी में छोटे-छोटे दलों के सामने मजबूर है बीजेपी ? सारी रणनीति हुई फेल!
लखनऊ, 12 नवंबर: भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पिछले तीन चुनावों से लगातार अपना जलवा दिखाया है। पिछले लोकसभा चुनावों में उसने सपा-बसपा के 'अजेय' माने वाले गठबंधन को भी पराजित किया है। जाहिर है कि पार्टी ने समाज के बड़े तबके को अपने साथ जोड़ने में सफलता पाई है। लेकिन, सामाजिक समूहों का यह जोड़ उसके साथ कितना मजबूती के साथ खड़ा है यह अभी भी सवालों के दायरे में है। इसकी वजह है जाति आधारित वह छोटी-छोटी पार्टियां जिन्होंने चुने हुए वोट बैंक पर कब्जा कर रखा है। बीजेपी चाहकर भी अभी तक उन्हें अपने पाले में नहीं ला पाई है। लिहाजा उसे इन जातिवादी पार्टियों के नेताओं के साथ डील करनी होती है और उन जातियों में पार्टी अपना खुद का जनाधार नहीं बना पा रही है।

कुछ जातियों में अपना जनाधार बनाने में पिछड़ी
भारतीय जनता पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी (कैडर के हिसाब से ) होने का दावा करती है। भारत में कांग्रेस के गिरते ग्राफ ने तो उसके विस्तार में मौका दिया ही है। दिल्ली की सत्ता के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में दबदबा उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है और जाहिर है कि 2022 ठीक रहेगा, तभी 2024 जीतने की उम्मीदें भी बची रहेंगी। इसी के लिए पार्टी उत्तर प्रदेश में 51% वोट शेयर हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक को अपने साथ गोलबंद करने के लिए उसने हाल ही में सात से आठ छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन भी किया है। ये छोटी पार्टियां मुख्य तौर पर जाति आधारित हैं, जिनके नेता किसी ने किसी जाति समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं। जातियों से जुड़े ऐसे राजनीतिक दलों को अपने साथ रखने की नीति ने भाजपा को यूपी में पिछले तीन-तीन चुनावों में लगातार कामयाबी भी दिलाई है। लेकिन, तथ्य ये है कि भाजपा एक दल को अपने साथ करती है तो दूसरा छिटक कर चला जाता है। सात साल की कोशिशों के बावजूद वह कुछ अहम ओबीसी जातियों को एक राष्ट्रीय पार्टी होने के हिसाब से बगैर सहारे के वह अपने साथ नहीं कर पाई है।

कुर्मियों में अपना जनाधार नहीं कायम कर पाई है भाजपा
उत्तर प्रदेश में भाजपा के रणनीतिकारों के सामने यही बड़ी चुनौती है। जिस तरह से यादवों की दबदबे वाली समाजवादी पार्टी ने पिछले दिनों कुछ छोटी पार्टियों को अपने साथ लिया है, उसने बीजेपी की स्थिति थोड़ी असहज कर दी है। भाजपा की चिंता ये है कि कुछ बड़ी ओबीसी जातियां उसके साथ तभी खड़ी रहती हैं, जब उनकी जाति का प्रतिधित्व करने वाले नेता पार्टी के साथ रहते हैं। ऐसी बड़ी ओबीसी जातियों में कुर्मी सबसे महत्वपूर्ण हैं। पिछले दो दशक से प्रदेश में ये अपना दल के साथ रहे हैं, जिसकी स्थापना दिवंगत सोनेलाल पटेल ने की थी और आज उनकी सियासी विरासत उनकी बेटी और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल संभाल रही हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में और कानपुर के कुछ इलाकों में इस वोट बैंक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राजनीतिक दल मानकर चलते हैं कि ओबीसी में यादवों (करीब 9 फीसदी) के बाद सबसे अधिक आबादी कुर्मियों की है और इनके पास 7 से 8 प्रतिशत वोट है।

क्या बीजेपी की रणनीति रही है फेल ?
हालांकि, भाजपा ने कुर्मी वोट बैंक को पूरी तरह से अपने कैडर में तब्दील करने के लिए प्रयास कम नहीं किए हैं। पार्टी ने स्वतंत्र देव सिंह जैसे कुर्मी नेता को प्रदेश की कमान सौंप रखी है, लेकिन अपना दल (सोनेलाल) के बगैर भाजपा का काम चलना मुश्किल है। पार्टी इस भरोसे नहीं रह सकती कि सिंह का चेहरा सामने रखकर कुर्मियों के वोट अपने पाले में कर लेगी। यही वजह है कि यूपी विधानसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले मंत्रिमंडल विस्तार में अनुप्रिया पटेल को फिर से जगह देनी पड़ी। कुर्मियों की तरह ही निषाद और राजभर वोट बैंक भी भाजपा को इसी तरह से चिंता में डाले रखता है। इनके नेताओं के साथ डील हुई तो सही, नहीं तो फिर वह कोई नया ठिकाना ढूंढ़ने में देर नहीं लगाते।

यूपी चुनाव से पहले राजभर ने दिया है बड़ा झटका
कहने के लिए प्रदेश में राजभरों के कई नेता हैं। लेकिन, आमतौर पर यह वोट बैंक सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के नेता ओम प्रकाश राजभर के ही पीछे चलता दिखता है। हालांकि, इस समाज पर डोरे डालने के लिए भारतीय जनता पार्टी के बड़े से बड़े नेताओं ने काफी कोशिशें की हैं। गृहमंत्री अमित शाह से लेकर यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ की ओर से कई घोषणाएं की गई हैं। इस समाज की पहचान माने जाने वाले हिंदू योद्धा सुहेलदेव राजभर की मूर्ति लगाने तक का ऐलान किया गया है। ओपी राजभर भाजपा के साथ आए थे तो 2017 के चुनाव में दोनों दलों को फायदा भी मिला था। खुद राजभर की पार्टी 8 में से 4 सीटें जीती भी थी और वे मंत्री भी बने थे। लेकिन, अब वो समाजवादी पार्टी के साथ जा चुके हैं। माना जा रहा है कि सपा-सुभासपा गठबंधन से पूर्वांचल में यादव-मुस्लिम-राजभर वोट के साथ समाजवादी पार्टी को बड़ा फायदा मिल सकता है। जाहिर है कि ऐसा होने पर नुकसान भाजपा का ही होना है। वैसे बीजेपी सरकार ने अनिल राजभर को प्रमोशन देकर कैबिनेट मंत्री बनाया है, लेकिन इससे राजभर वोट बैंक को वह भाजपा के पक्ष में मोड़ पाएंगे यह जरा मुश्किल लग रहा है।

निषाद नेताओं के साथ भी करनी पड़ी है डील
निषाद समाज को उत्तर प्रदेश में ही नहीं बिहार में भी पहले भाजपा के साथ माना जाता था। लेकिन, निषाद समाज के नेताओं की पार्टी बनने से बीजेपी के इस समीकरण का भी हिसाब-किताब बिगड़ चुका है। बिहार में मुकेश सहनी की वीआईपी ने इसके आधार पर अपना वोट बैंक तैयार किया है तो यूपी में डॉक्टर संजय निषाद की अगुवाई वाली निषाद पार्टी ने। इसी वजह से बीजेपी को यहां संजय निषाद के साथ गठबंधन को मजबूर होना पड़ा है। लेकिन, उससे पहले उनके बेटे प्रवीण निषाद को लोकसभा का टिकट देना पड़ा था और हाल ही में संजय निषाद को एमएलसी में नामांकित करना पड़ा है।

बहुत ही मुश्किल है 51% वोट पाने का लक्ष्य
दलितों की बात करें तो पिछले तीन चुनावों में भाजपा को इस समाज का समर्थन जरूर मिला है। लेकिन, जाटव को छोड़कर। पार्टी ने दलितों को खुश करने के लिए सबकुछ करने की कोशिश की है, लेकिन वह जाटवों को अबतक अपने साथ नहीं जोड़ पाई है और वह फिलहाल मायावती के साथ ही दिखाई पड़ते हैं। ऐसे में 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में आधे से ज्यादा वोट पाकर सत्ता पाने का उसका लक्ष्य बहुत ही बड़ी चुनौती है। 2017 में पार्टी ने यूपी विधानसभा की 403 सीटों में से 312 सीटें जीती थीं। 2012 के विधानसभा चुनाव में 25% के मुकाबले 2017 में उसने 39.7% वोट पाए थे। वहीं, 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 42.63% और 2019 में 49.98% वोट हासिल किए थे।












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