यूपी चुनाव में सुहेलदेव और निषादराज जैसे नायकों पर भाजपा की नजर, मूर्ति और स्मारक बनाने के पीछे क्या है रणनीति
लखनऊ, 15 नवंबर। 16 फरवरी 2021 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बहराइच के चित्तौरा में महाराजा सुहेलदेव स्मारक का भूमि पूजन किया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्चुअली इसका शिलान्यास किया था। प्रयागराज के श्रृंगवेरपुर में योगी सरकार निषादराज पार्क और श्रीराम के साथ निषादराज की 15 फीट ऊंची प्रतिमा बना रही है। महाराजा सुहेलदेव को उत्तर प्रदेश के राजभर और पासी दोनों ही अपने समुदाय का मानते हैं। निषादराज यूपी में निषादों के अराध्य हैं। उत्तर प्रदेश में राजभर और निषाद, दोनों समुदायों का पूर्वांचल की कई सीटों पर प्रभाव है। दोनों ही समुदायों का वोट पाने के लिए भाजपा, सपा और बसपा; राजभर और निषाद नेताओं को अपने पाले में करने में लगे हैं। ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद दोनों ही लोकसभा चुनाव 2019 तक भाजपा के साथ थे। लोकसभा चुनाव के ठीक बाद ओम प्रकाश राजभर को योगी सरकार ने मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में संजय निषाद भाजपा के साथ हैं। लेकिन संजय निषाद भी ओम प्रकाश राजभर की तरह अपनी मांगों को मनवाने के लिए भाजपा पर दबाव डालते रहते हैं। छोटी पार्टियों की दबाव की राजनीति से निपटने का एक रास्ता भाजपा के पास यही है कि राजभर और निषाद समुदाय को वो अपने बूते पर साधे। इसी प्रयास में भाजपा पिछले कुछ सालों से लगी है। राजभरों के महाराज सुहेलदेव और निषादों के राजा निषादराज की प्रतिमा और स्मारक बनाने के पीछे भी भाजपा इसी रणनीति पर चल रही है।

राजभर और निषाद यूपी चुनाव में कितने अहम
2019 के लोकसभा चुनाव के बाद राजभरों के बड़े नेता ओम प्रकाश राजभर से रिश्ता टूटने के बाद भाजपा परेशान हो गई। राजभरों को रिझाने के लिए अनिल राजभर को योगी सरकार में मंत्री बनाया गया, सकलदीप राजभर को राज्यसभा में भेजा गया। पूर्व सांसद हरिनारायण राजभर भी भाजपा के पाले में हैं। राजभरों के तीन कद्दावर नेता रामअचल राजभर, सुखदेव राजभर और ओम प्रकाश राजभर सपा के साथ हैं। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या में राजभर करीब चार प्रतिशत हैं। पूर्वांचल के 24 से अधिक जिलों में राजभर वोटर जीत-हार तय करने की स्थिति में हैं। यूपी की 403 विधानसभा सीटों में 100 से ज्यादा सीटों पर राजभरों का प्रभाव है। उत्तर प्रदेश की 20 लोकसभा सीटों और 60 विधानसभा सीटों पर निषाद पार्टी का प्रभाव माना जाता है। भदोही, जौनपुर, आजमगढ़, कुशीनगर, घोसी, देवरिया, बस्ती, डुमरियागंज, सलेमपुर, वाराणसी, बलिया और सुल्तानपुर, खासकर पूर्वांचल के इलाकों में निषाद पार्टी अपने दबदबे का दावा करती है। यही वजह है इन दोनों समुदायों से निकले नेताओं को बड़ी पार्टियां तवज्जो देती हैं। लेकिन दोनों ही समुदाय के ओपी राजभर और संजय निषाद जैसे बड़े नेता बहुत महत्वाकांक्षी हैं। इनकी बढ़ती ताकत भाजपा जैसी पार्टियों के लिए परेशानी की वजह भी है। ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा के साथ 2017 का विधानसभा चुनाव लड़कर भाजपा बहुत फायदे में रही थी। लेकिन इस बार ओम प्रकाश राजभर सपा के साथ हैं और दावा कर रहे हैं कि उन्होंने भाजपा के लिए सत्ता तक पहुंचने का दरवाजा बंद कर दिया है। संजय निषाद भी निषाद वोट बैंक के जरिए प्रदेश में सरकार बनाने का दावा करते हैं।

प्रतीकों की राजनीति भाजपा की रणनीति का हिस्सा
भारतीय जनता पार्टी आजादी के नायक और देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा गुजरात में लगवा चुकी है। यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा मानी जाती है। भाजपा ने इसका नाम स्टैच्यू ऑफ यूनिटी रखा और एकता के प्रतीक के तौर पर स्थापित किया। भगवान श्रीराम के लिए अयोध्या में मंदिर आंदोलन छेड़कर भाजपा यूपी में सत्ता तक पहुंची और पूरे देश में अपने लिए हिंदू जनाधार बनाया। अब भाजपा सरकार अयोध्या में श्रीराम की ऊंची प्रतिमा लगाने की तैयारी कर रही है। भाजपा की राजनीति में इन नायकों की प्रतिमाओं और स्मारकों का अहम स्थान है। इसी तीर के जरिए भाजपा अब राजभर और निषाद वोटबैंक पर निशाना लगा रही है। महाराज सुहेलदेव और निषादराज की प्रतिमा और स्मारक बनाकर राजभर और निषाद समुदाय के वोटरों को मैसेज दे रही है कि भाजपा उनके बारे में सोचती है। 2018 में मोदी सरकार महाराजा सुहेलदेव पर डाक टिकट भी जारी कर चुकी है।

कौन हैं महाराज सुहेलदेव और निषादराज?
महाराज सुहेलदेव का इतिहास करीब 1000 साल पुराना माना जाता है। उनके बारे में यह स्पष्ट नहीं है कि वह किस जाति या पंथ के थे। महमूद गजनवी के भांजे सैय्यद सालार मसऊद गाजी के साथ हुए भीषण युद्ध में जीत हासिल करने के लिए उनको याद किया जाता है। उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल समेत कई क्षेत्रों में महाराजा सुहेलदेव के किस्से सुने जा सकते हैं लेकिन इतिहास उनके बारे में कुछ स्पष्ट नहीं बता पाता है। राजभर और पासी उनको अपना मानते हैं। राजपूत भी सुहेलदेव को हिंदू राजा मानते हैं। कहा जाता है कि शायद उन्होंने बाद में जैन धर्म को स्वीकार कर लिया था। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान श्रीराम के मित्र निषादराज श्रृंगवेरपुर (प्रयागराज) के महाराजा थे और वनवास के लिए जा रहे राम, सीता और लक्ष्मण ने उनके यहां ही पहली रात को विश्राम किया था। इसके बाद निषादराज ने सेवकों से कहकर उनको गंगा पार कराया था। हाल में संजय निषाद ने कहा था कि भगवान राम और निषादराज बाल सखा थे। निषादराज की पूजा निषाद समुदाय के लोग करते हैं। भाजपा राम और निषादराज की प्रतिमा भी श्रृंगवेरपुर में स्थापित करने जा रही है।
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