Ishita Sengar: कौन हैं इशिता सेंगर? कुलदीप सेंगर की छोटी बेटी क्या करती हैं? पिता की सजा पर तोड़ी चुप्पी
kuldeep singh sengar Daughter Ishita Sengar: भाजपा के पूर्व विधायक और उन्नाव रेप केस में उम्रकैद की सजा काट रहे कुलदीप सिंह सेंगर की छोटी बेटी इशिता सेंगर अचानक चर्चाओं में आ गई हैं। 29 दिसंबर को इशिता ने एक इमोशनल ओपेन लेटर लिखकर दर्द बयां किया है। इशिता सेंगर का कहना है कि हर दिन उन्हें सोशल मीडिया पर टारगेट किया जाता है, कहा जाता है कि 'रेप किया जाना चाहिए, हत्या होनी चाहिए।' इशिता ने लिखा कि बीते आठ सालों से वह थकी हुई, डरी हुई और टूटते भरोसे के साथ जी रही हैं।
इशिता ने लिखा कि उन्होंने न्याय व्यवस्था पर भरोसा करते हुए चुप्पी साधे रखी, लेकिन अब उनका विश्वास धीरे-धीरे डगमगाने लगा है। इशिता ने लिखा कि यह सब सहना किसी भी युवा लड़की के लिए आसान नहीं होता, लेकिन वह अब तक चुप रहीं।

इशिता का ये ओपेन लेटर ऐसे वक्त सामने आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा को सस्पेंड किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि सेंगर को उन्नाव रेप केस में जेल से रिहा नहीं किया जाएगा। ऐसे में आइए जानते हैं इशिता सेंगर के बारे में।
▶️ who is Ishita Sengar: कौन हैं इशिता सेंगर?
- इशिता सेंगर कुलदीप सिंह सेंगर की छोटी बेटी हैं और फिलहाल दिल्ली में रहकर पढ़ाई कर रही हैं। इशिता सेंगर अपने नाम के आगे 'डॉक्टर' लगाती हैं। उनका पूरा नाम डॉ. इशिता सेंगर हैं।
- इशिता सेंगर की अभी तक शादी नहीं हुई है। इशिता सेंगर काफी लो प्रफाइल रहती हैं। उनके सोशल मीडिया एक्स पर सिर्फ 1600 फॉलोअर्स हैं।
- कुलदीप सिंह सेंगर के परिवार में मां संगीता सिंह सेंगर हैं, जो उन्नाव की जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं। उनकी बड़ी बहन ऐश्वर्या सेंगर पेशे से वकील हैं और उनकी शादी गोरखपुर के कैंपियरगंज विधायक फतेह बहादुर सिंह के बेटे से हुई है। फतेह बहादुर के पिता पूर्व सीएम वीर बहादुर सिंह थे।
- सेंगर परिवार की राजनीतिक विरासत को भांजे अंतरांजय सिंह उर्फ गोल्डी राजा (Antranjay Singh "Goldi Raja") आगे बढ़ा रहे हैं।

▶️ अब पढ़िए इशिता सेंगर का ओपेन लेटर (Ishita Sengar Open letter)
''रिपब्लिक ऑफ इंडिया के माननीय अधिकारियों को,मैं यह लेटर एक ऐसी बेटी के तौर पर लिख रही हूं...मैं डरी हूं और भीतर से बेहद थकी हुई भी। ऐसा लग रहा है जैसे धीरे-धीरे मेरा भरोसा टूटता जा रहा है, फिर भी मैंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। पिछले आठ वर्षों से मैं और मेरा परिवार धैर्य के साथ इंतजार करता रहा। हमें भरोसा था कि अगर हम हर कदम सही तरीके से उठाएंगे, तो सच खुद सामने आ जाएगा। हमने कानून और संविधान पर विश्वास किया, लेकिन आज वही विश्वास डगमगाता हुआ महसूस हो रहा है। इसी बेचैनी ने मुझे यह पत्र लिखने पर मजबूर किया है।
मेरी बात सुनी जाने से पहले ही मेरी पहचान एक ठप्पे में बदल दी जाती है। मुझे एक इंसान नहीं, बल्कि सिर्फ "बीजेपी विधायक की बेटी" कहा जाता है। जैसे इस पहचान के साथ मेरी संवेदनाएं, मेरा दर्द और मेरी इंसानियत खत्म हो जाती हो। जिन लोगों ने मुझे कभी देखा तक नहीं, जिन्होंने न कोई दस्तावेज पढ़ा और न ही किसी अदालती रिकॉर्ड को समझा, उन्होंने पहले ही तय कर लिया कि मेरी जिंदगी की कोई अहमियत नहीं है।
इन आठ सालों में मुझे सोशल मीडिया पर अनगिनत बार निशाना बनाया गया। ऐसे-ऐसे शब्द कहे गए, जिन्हें लिखते हुए भी हाथ कांपता है। कहा गया कि मेरे साथ भी रेप होना चाहिए, कि मुझे मार दिया जाना चाहिए, मुझे सजा मिलनी चाहिए, यह नफरत कभी रुकी नहीं। जब आपको एहसास होता है कि इतने सारे लोग मानते हैं कि आप जीने के काबिल नहीं हैं, तो यह अहसास आपको अंदर से तोड़ देता है।
हमने चुप्पी इसलिए नहीं अपनाई क्योंकि हम ताकतवर थे, बल्कि इसलिए क्योंकि हमें संस्थाओं पर भरोसा था। हमने न सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया, न टीवी डिबेट्स में शोर मचाया। न पुतले जलाए, न हैशटैग चलाए। हमने इंतजार किया, क्योंकि हमें लगता था कि सच को दिखावे की जरूरत नहीं होती।
लेकिन उस चुप्पी की कीमत हमें भारी पड़ी। हमारी गरिमा धीरे-धीरे छीन ली गई। आठ साल तक हर दिन हमारा अपमान हुआ, मजाक बनाया गया, हमें अमानवीय नजरों से देखा गया। एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के चक्कर काटते हुए, पत्र लिखते हुए, फोन करते हुए और अपनी बात सुनाने की कोशिश में हम शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुके हैं। ऐसा कोई दरवाजा नहीं, जिस पर हमने दस्तक न दी हो। ऐसा कोई संस्थान नहीं, जिससे हमने गुहार न लगाई हो। शायद ही कोई मीडिया हाउस होगा, जिसे हमने लिखा न हो।
फिर भी हमारी आवाज नहीं सुनी गई। इसलिए नहीं कि हमारे पास तथ्य नहीं थे या सबूत कमजोर थे, बल्कि इसलिए क्योंकि हमारा सच असहज था। लोग कहते हैं कि हम ताकतवर हैं। मैं पूछना चाहती हूं कि कैसी ताकत होती है, जो किसी परिवार को आठ साल तक खामोश और बेबस बनाए रखे। कैसी ताकत, जिसमें आप रोज अपने नाम को कीचड़ में घसीटते हुए देखते रहें और फिर भी सिस्टम पर भरोसा करते रहें, जो आपकी मौजूदगी तक स्वीकार नहीं करता।
जानबूझकर ऐसा माहौल बनाया गया, जिसमें डर ही डर हो। ताकि जज, पत्रकार, संस्थाएं और आम लोग चुप रह जाएं। ताकि कोई हमारे साथ खड़ा होने की हिम्मत न करे, कोई यह कहने की हिम्मत न करे कि तथ्यों को देखा जाए, सबूतों को परखा जाए।
यह सब देखना मुझे भीतर तक हिला देता है। अगर सच को इतनी आसानी से भीड़ के गुस्से और गलत सूचनाओं में दबाया जा सकता है, तो मेरे जैसी एक आम इंसान आखिर जाए तो कहां जाए। अगर दबाव और सार्वजनिक उन्माद कानून और प्रक्रिया पर भारी पड़ने लगें, तो फिर एक नागरिक के पास सुरक्षा के नाम पर क्या बचता है।
मैं यह पत्र न किसी को धमकाने के लिए लिख रही हूं, न सहानुभूति पाने के लिए। मैं लिख रही हूं, क्योंकि मैं डरी हुई हूं। और फिर भी मुझे अब भी भरोसा है कि कहीं न कहीं कोई ऐसा जरूर होगा, जो सच में सुनना चाहेगा। हम किसी एहसान की मांग नहीं कर रहे। हम यह भी नहीं कह रहे कि हमारी पहचान के कारण हमें विशेष संरक्षण मिले।
हम सिर्फ न्याय की मांग कर रहे हैं, क्योंकि हम भी इंसान हैं। कृपया कानून को बिना भय के बोलने दीजिए। कृपया सबूतों को बिना दबाव के परखने दीजिए। कृपया सच को सच ही रहने दीजिए। मैं एक बेटी हूं, जिसे अब भी अपने देश पर भरोसा है। कृपया मुझे उस भरोसे पर शर्मिंदा होने के लिए मजबूर मत कीजिए।
सादर
इंसाफ के इतंजार में में एक बेटी''

▶️ Unnao Rape Case Timeline: क्या है उन्नाव गैंगरेप केस की घटना?
🔹 उन्नाव गैंगरेप केस की शुरुआत 4 जून 2017 से मानी जाती है। आरोप है कि उस दिन पीड़िता के साथ तत्कालीन भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने दुष्कर्म किया। घटना के बाद पीड़िता न्याय की तलाश में पुलिस और प्रशासन के दफ्तरों के चक्कर काटती रही, लेकिन उसकी शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
🔹 इसी दौरान मामला और भयावह मोड़ ले गया। पीड़िता के पिता को कथित तौर पर पेड़ से बांधकर बेरहमी से पीटा गया। इस हमले में कुलदीप सेंगर के भाई अतुल सिंह सेंगर और उनके करीबी लोगों के शामिल होने के आरोप लगे। कुछ ही समय बाद पीड़िता के पिता की हालत बिगड़ती चली गई।
🔹 न्याय न मिलने से टूट चुकी पीड़िता 8 अप्रैल 2018 को लखनऊ पहुंची और मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की। मौके पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने समय रहते उसे बचा लिया, लेकिन अगले ही दिन एक और चौंकाने वाली खबर सामने आई। पीड़िता के पिता की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई। इस घटना ने पूरे मामले को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया।
🔹 इसके बाद केस में कुलदीप सिंह सेंगर, उनके भाई, माखी थाने के तत्कालीन एसएचओ समेत करीब 10 लोगों को आरोपी बनाया गया। जन दबाव और बढ़ते राजनीतिक विवाद के बीच 12 अप्रैल 2018 को यह मामला CBI को सौंप दिया गया। जांच के बाद सेंगर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
🔹 पीड़िता के लिए मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। जो चाचा इस लड़ाई में उसका साथ दे रहे थे, उन्हें 19 साल पुराने एक मामले में 10 साल की सजा सुना दी गई। पीड़िता लगभग अकेली पड़ गई। 28 जुलाई 2019 को जब वह अपनी मौसी, चाची और वकील के साथ कार से जा रही थी, तभी एक ट्रक ने उनकी गाड़ी को टक्कर मार दी। हादसे में मौसी और चाची की मौत हो गई, जबकि पीड़िता किसी तरह बच गई।
🔹 इस दुर्घटना को भी साजिश मानते हुए सेंगर के खिलाफ अलग मामला दर्ज किया गया। तब के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने पूरे प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए केस को दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में ट्रांसफर कराया। लगातार 45 दिन तक चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर को दोषी करार दिया और 21 दिसंबर 2019 को उसे उम्रकैद की सजा सुनाई।












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