कौन हैं EX-IPS अमिताभ ठाकुर? राम मंदिर CEO के लिए किया अप्लाई, योगी-अखिलेश समेत 4 CM से ले चुके हैं टक्कर

Ram Mandir CEO (Former IPS officer Amitabh Thakur): अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में पहली बार मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति होने जा रही है। इस हाई-प्रोफाइल पद के लिए पूर्व IPS अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने आवेदन किया है। ये वही अमिताभ ठाकुर ने जिन्हें 2021 में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति' (Compulsory Retirement) कर दिया गया था।

उनके आवेदन के बाद इनकी चर्चा होने लगी है। वजह सिर्फ उनका आवेदन नहीं, बल्कि उनका लंबा और विवादों से भरा प्रशासनिक करियर भी है। मुलायम सिंह यादव, मायावती, अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ की सरकारों के दौरान अलग-अलग मामलों में उनका टकराव चर्चा में रहा। यूपी के चार सीएम से पंगा लेने वाले अमिताभ ठाकुर अब राम मंदिर ट्रस्ट के CEO बनना चाहते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर अमिताभ ठाकुर कौन हैं और उनका करियर कैसा रहा है।

Ram Mandir CEO Former IPS officer Amitabh Thakur

अमिताभ ठाकुर ने अपनी दावेदारी में क्या लिखा?

पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने अपना बायोडाटा ईमेल ([email protected]) के जरिए सर्च कमेटी को भेज दिया है। अपने आवेदन में उन्होंने साफ लिखा है कि वे एक सनातनी हिंदू हैं और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के न्याय, कर्तव्यनिष्ठा और लोक कल्याण के आदर्शों में गहरी आस्था रखते हैं।

उन्होंने 14 जुलाई को वीडियो जारी कर बताया कि राम मंदिर ट्रस्ट के बताए तरीकों से ही उन्होंने औपचारिक तौर पर अप्लाई किया है। राम मंदिर ट्रस्ट ने चढ़ावा चोरी विवाद के बाद राम मंदिर के लिए CEO के लिए 13 जुलाई को आवेदन मांगे थे।

उन्होंने पुलिस सेवा और लोक प्रशासन के अपने लगभग 30 सालों के लंबे अनुभव का हवाला दिया है। अमिताभ ने लिखा है कि वे सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक कामकाज, लीगल मामलों और संस्थागत तालमेल बैठाने में पूरी तरह माहिर हैं। ऐसे में मंदिर की व्यवस्था को पूरी तरह से पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए वे सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं।

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Who is Amitabh Thakur: कौन हैं पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर?

अमिताभ ठाकुर उत्तर प्रदेश कैडर के 1992 बैच के पूर्व IPS अधिकारी हैं। पुलिस सेवा के दौरान प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और कानून के पालन को लेकर उनकी छवि अलग रही। यही वजह है कि वे कई बार सरकारों के साथ सीधे टकराव में भी आए। मार्च 2021 में केंद्र सरकार ने उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी थी। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति का रास्ता चुना और आजाद अधिकार सेना नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई। फिलहाल वह इसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

अमिताभ को 1992 में भारतीय पुलिस सेवा में नियुक्त किया गया था। उनकी शुरुआती फील्ड ट्रेनिंग कानपुर में हुई, उसके बाद पोस्टिंग गोरखपुर में हुई। उन्होंने यूपी के लगभग 10 जिलों में पुलिस अधीक्षक (SP) के रूप में काम किया, जिनमें पिथौरागढ़, ललितपुर, देवरिया, गोंडा, बस्ती, संत कबीर नगर, फिरोजाबाद, बलिया और महाराजगंज शामिल हैं। उन्होंने इंटेलिजेंस, विजिलेंस, एंटी-करप्शन और पुलिस ट्रेनिंग अकादमी सहित कई विभागों में भी काम किया।

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जब मुलायम सिंह यादव-अखिलेश यादव से सीधे टकराए थे अमिताभ ठाकुर

अमिताभ ठाकुर का करियर हमेशा विवादों और बड़े नेताओं से टकराव की कहानियों से भरा रहा है। साल 2006 में जब वे फिरोजाबाद के एसपी थे, तब उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के करीबी रिश्तेदार और विधायक रामवीर सिंह यादव के गलत आदेशों को मानने से इनकार कर दिया था।

इस दौरान उनके साथ बदसलूकी भी हुई थी। खुद मुलायम सिंह यादव ने उन्हें इस मामले में केस दर्ज न करने की मौखिक हिदायत दी थी। लेकिन अमिताभ ने ईका थाने में एफआईआर दर्ज करा दी। यहीं से उनके और समाजवादी पार्टी के बीच एक लंबी जंग की शुरुआत हो गई।

इसके बाद साल 2015 में जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे, तब अमिताभ की पत्नी डॉ. नूतन ठाकुर ने सरकार के खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के खिलाफ लोकायुक्त में अवैध खनन की शिकायत दर्ज कराई। इससे नाराज होकर मुलायम सिंह यादव ने अमिताभ ठाकुर को फोन पर सीधे अंजाम भुगतने की धमकी दी थी।

अमिताभ ने इस फोन कॉल का ऑडियो लीक कर दिया और हजरत गंज थाने में शिकायत दर्ज कराने पहुंच गए। ठीक उसी रात पुलिस ने उनके खिलाफ एक पुराना रेप केस दर्ज कर लिया और दो दिन बाद उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। बाद में जांच में रेप का केस पूरी तरह फर्जी पाया गया और पुलिस ने शिकायतकर्ता महिला पर ही केस दर्ज किया।

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जब मायावती सरकार से कोर्ट में छीनी अपनी सैलरी

अमिताभ ठाकुर का टकराव केवल समाजवादी पार्टी तक सीमित नहीं था। साल 2008-09 में जब उत्तर प्रदेश में मायावती मुख्यमंत्री थीं, तब अमिताभ ठाकुर का चयन देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान आईआईएम (IIM) लखनऊ के फेलो प्रोग्राम (FPM) के लिए हुआ। उन्होंने पढ़ाई के लिए विभाग से स्टडी लीव (अध्ययन अवकाश) मांगी।

लेकिन सरकार ने उन्हें परेशान करने के इरादे से छुट्टी देने से साफ मना कर दिया। अमिताभ हार मानने वाले नहीं थे। वे कैट (CAT) की लखनऊ बेंच पहुंचे और बिना सैलरी के असाधारण अवकाश मंजूर कराकर दो साल तक पढ़ाई की। बाद में उन्होंने हाई कोर्ट और ट्रिब्यूनल में कानूनी लड़ाई जीती और साल 2012 में सरकार को उन्हें इस पूरी अवधि की सैलरी ब्याज समेत वापस देनी पड़ी थी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से क्या हुआ था पंगा

अमिताभ ठाकुर का सबसे लंबा और सीधा विवाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ रहा है। जब योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से सांसद थे और वहां हिंदू युवा वाहिनी का दबदबा था, तब अमिताभ ठाकुर देवरिया, बस्ती और महाराजगंज जैसे जिलों में एसपी के पद पर तैनात थे। साल 2007 में जब योगी आदित्यनाथ को कानून-व्यवस्था बिगाड़ने और भड़काऊ भाषण के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, तब भड़के दंगों पर काबू पाने के लिए एसपी अमिताभ ठाकुर ने बेहद सख्त कार्रवाई की थी।

इसके अलावा साल 1999 के एक चर्चित मर्डर केस में भी योगी आदित्यनाथ का नाम शामिल था। जब यह केस सीआईडी से महाराजगंज ट्रांसफर हुआ, तो एसपी रहते हुए अमिताभ ठाकुर ने इसकी जांच तेज कर दी थी। हालांकि राजनीतिक दबाव के चलते उनका तबादला बीच में ही कर दिया गया था।

अनिवार्य सेवानिवृत्ति और साल 2026 का सुप्रीम कोर्ट का आदेश

इसी वजह से आखिरकार मार्च 2021 में केंद्र और राज्य सरकार ने मिलकर आईपीएस अमिताभ ठाकुर को उनकी सेवा समाप्त होने से 7 साल पहले ही 'अनिवार्य सेवानिवृत्ति' (Compulsory Retirement) दे दी। सरकार ने उन्हें लोकहित में 'अनफिट' करार दिया। अमिताभ ने इस फैसले को सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में चुनौती दी है।

इसी साल जून 2026 में देश की सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय और यूपी सरकार को निर्देश दिया है कि अमिताभ ठाकुर के खिलाफ पिछले 10 साल से लंबित पड़ी चार विभागीय जांचों को अगले 6 महीने के भीतर निपटाया जाए। अमिताभ ने कोर्ट में दलील दी थी कि उन्हें जानबूझकर परेशान करने के लिए इन जांचों को लटका कर रखा गया है।

सेवानिवृत्ति के बाद अमिताभ ठाकुर ने अपनी पत्नी नूतन ठाकुर के साथ मिलकर 'आजाद अधिकार सेना' नाम से एक राजनीतिक दल का गठन किया है और वे इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर लगातार सक्रिय हैं।

राम मंदिर में अचानक क्यों पड़ी CEO की जरूरत?

राम मंदिर ट्रस्ट में हाल ही में चढ़ावे को लेकर कुछ गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आई थीं। इसके बाद ट्रस्ट के कामकाज को पूरी तरह पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने की कोशिशें तेज हो गईं।

ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय समेत कई पदाधिकारियों के इस्तीफे के बाद अब नए प्रशासनिक चेहरों को शामिल किया जा रहा है। इसी कड़ी में ट्रस्ट ने एक बड़े फैसले के तहत सीईओ के पद के लिए देशभर के योग्य और सेवानिवृत्त अधिकारियों से आवेदन मांगे हैं।

ट्रस्ट ने आवेदन के लिए कुछ शर्ते रखी हैं।

  • आवेदक की उम्र 50 से 70 साल के बीच होनी चाहिए।
  • किसी बड़े सरकारी विभाग, संस्थान या बड़ी कंपनी में कम से कम 20 साल का प्रशासनिक और प्रबंधकीय अनुभव होना जरूरी है।
  • शैक्षणिक योग्यता के तौर पर किसी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होना अनिवार्य है।
  • सबसे खास बात यह है कि उम्मीदवार का 'सनातनी हिंदू' होना और नियमित रूप से पूजा-पाठ करने वाला होना जरूरी है। वैष्णव परंपरा को मानने वाले भक्तों को इस चयन में वरीयता दी जाएगी।
  • इसके अलावा हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए।

कौन लेगा आखिरी फैसला?

अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या राम मंदिर ट्रस्ट की सर्च कमेटी अमिताभ ठाकुर के इस आवेदन पर विचार करेगी? मंदिर के प्रशासनिक कामों को संभालने के लिए बनाई गई इस तीन सदस्यीय कमेटी में जस्टिस (रिटायर्ड) प्रदीप कोहली, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) विष्णुकान्त चतुर्वेदी और सुरेश हावड़े (शिरडी साईबाबा संस्थान ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष) शामिल हैं। यह कमेटी 18 जुलाई को शाम 4 बजे योग्य उम्मीदवारों का इंटरव्यू लेगी।

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