मायावती से बगावत के पीछे कौन ? कहीं सतीश चंद्र मिश्रा की वजह से तो नहीं बिगड़ रहा बसपा का खेल
लखनऊ, 16 जून: उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी से पिछले दो वर्षों के अंदर 11 विधायक बाहर हो चुके हैं। इनमें से 9 को अनुशासनहीनता के आरोपों में निलंबित किया गया है और 2 पार्टी से 6 वर्षों के लिए निकाले जा चुके हैं। दल-विरोधी कानून के लफड़े से बचने के लिए इन विधायकों को अब सिर्फ 1 एमएलए की दरकार है और ऐसा हो गया तो पार्टी के बागी विधायकों की संख्या 12 हो जाएगी और वह अलग गुट के रूप में मान्यता लेने के लिए संवैधानिक तौर पर स्वतंत्र हो जाएंगे। सवाल है कि इतने सारे विधायक एक-एक करके 'बहनजी' से दूर क्यों होते चले गए? बागी विधायकों का दावा है कि बसपा के इस राजनीतिक संकट के लिए पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा एमपी सतीश चंद्र मिश्रा बहुत बड़े कारण हैं।

बसपा में बगावत के पीछे सतीश चंद्र मिश्रा हैं वजह ?
बसपा के संस्थापक कांशीराम के बाद पार्टी सुप्रीमो मायावती ने अगर किसी पर सबसे ज्यादा भरोसा किया है तो वह पार्टी के कद्दावर नेता सतीश चंद्र मिश्रा हैं। लेकिन, पार्टी के बागी एमएलए आज 'बहनजी' के उसी भरोसेमंद अगड़ी जाति के ब्राह्मण नेता को पार्टी संकट के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। पार्टी से दूर किए गए ज्यादातर विधायकों का आरोप है कि उनकी वजह से ही 'बहनजी' को विधायकों के बारे में गलतफहमी हुई है। दरअसल, मंगलवार को बीएसपी के 5 बागी विधायकों ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से सनसनीखेज मुलाकात करके पार्टी में औपचारिक विभाजन की हवा बुलंद कर दी है। माना जा रहा है कि उनसे कहा गया है कि वह विभाजन के लिए संख्या पूरी होने तक इंतजार करें।

पार्टी को बर्बाद कर रहे हैं सतीश चंद्र मिश्रा- बसपा के बागी एमएलए
सपा सुप्रीमो से मिलने वाले बसपा के 5 बागी विधायकों में से कम से कम तीन ने न्यूज18 को जो कुछ बताया है, उससे जाहिर होता है कि उनकी नाराजगी मायावती से नहीं, बल्कि मिश्रा से है। क्योंकि, उनका कहना है कि उन्होंने ही बहनजी और उनके बीच मतभेद पैदा कर दिए हैं। श्रावस्ती के भिनवा से बीएसपी के निलंबित एमएलए असलम अली रायनी ने कहा है, 'मायावती वही करती हैं, जो मिश्रा उनसे करने के लिए कहते हैं। वह पार्टी को बर्बाद कर रहे हैं। अगर यही व्यवस्था बरकरार रही तो मुस्लिम बीएसपी को छोड़ देंगे।' जौनपुर के मुंगरा बादशाहपुर से विधायक सुषमा पटेल और प्रयागराज के हांडिया से पार्टी विधायक हाकिम लाल बिंद ने भी इस संकट का ठीकरा मिश्रा पर ही फोड़ा है।
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सतीश चंद्र मिश्रा ने 2007 में बसपा की जीत में अहम भूमिका निभाई
2007 में जब उत्तर प्रदेश में मायावती की अगुवाई में बसपा की अंतिम सरकार बनी थी, तब एक नारा बहुत ही प्रचलित हुआ था- ब्राह्मण शंख बजाएगा और हाथी बढ़ता जाएगा। कहते हैं कि ब्राह्मणों को बहनजी से जोड़ने की इस रणनीति के पीछे सतीश चंद्र मिश्रा का ही दिमाग था, जिसने उन्हें पार्टी अध्यक्ष का सबसे बड़ा विश्वासपात्र बना दिया। यही वजह है कि पिछले हफ्ते पार्टी ने पंजाब में शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के साथ गठबंधन किया है तो इसकी जिम्मेदारी भी उन्हें ही दी गई थी। जानकारी के मुताबिक जब बीएसपी के 7 निलंबित विधायकों ने राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन किया था तो उन्होंने ही मायावती को सचेत किया था। यही नहीं उनपर पंचायत चुनावों को लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेता लालजी वर्मा और राम अचल राजभर के संबंध में भी बसपा अध्यक्ष से शिकायत करने के आरोप हैं।

मायावती के बाद बसपा में सबसे कद्दावर नेता हैं मिश्रा
लालजी वर्मा और राम अचल राजभर को हाल ही में मायावती ने पार्टी-विरोधी गतिविधियों के लिए निकाला है। ये दोनों ही पार्टी के बड़े नेता थे। नसीमुद्दीन सिद्दीकी, ब्रजेश पाठक और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे कद्दावर चेहरे बसपा से पहले ही दूर हो चुके हैं। इसके बाद मायावती के बाद मिश्रा ही पार्टी के एकमात्र सबसे कद्दावर चेहरा रह गए हैं। बागियों का यह भी कहना है कि उन्होंने खुद कभी भी चुनाव लड़ने में पसीना नहीं बनाया, लेकिन बीएसपी में सबसे शक्तिशाली बन बैठे हैं। वैसे जमीनी हालात बताते हैं कि बसपा के बागियों का अलग गुट बना पाना इतना आसान भी नहीं है। क्योंकि, राजभर अभी भी इंतजार में हैं कि बहनजी उनके साथ थोड़ा नरमी दिखाएंगी। कुछ बागियों का भाजपा के साथ भी बातचीत चलने की अटकलें हैं। लालजी वर्मा भी इस मसले पर खुलकर बोलने के लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं।
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